Divya Himachal Logo Aug 20th, 2017

प्रतिबिम्ब


लाउड व्हिस्पर्ज में लाउड कुछ भी नहीं

हिंदी एवं अंग्रेजी के सुपरिचित कवि ललित मोहन शर्मा का चौथा कविता संग्रह ‘लाउड व्हिस्पर्ज’ जीवन के झंझावातों को सहर्ष लांघते हुए चुपचाप पेड़ की छाया के नीचे बैठकर विचारों की जुगाली और विगत को कल्पना में जीने का सार्थक,रोचक एवं महत्त्वपूर्ण प्रयास है। वास्तव में जीवन की अनुभूतियों को सहेजते-सहेजते कवि अंतरधाराओं की व्यंजना को कुछ इस प्रकार पकड़ता है कि हर कविता में एक अदृश्य भाव कविता छिपी मिलती है। कवि की भावनाएं उद्दाम ज्वार-भाटे के रूप में शब्दों में छलकती-झलकती, इठलाती-गाती पाठक को मोह लेती हैं।  ललित की कविताएं सहज सपाट नहीं अपितु एक कुशल चितेरे की तूलिका से निकली भाव विह्वल करने वाली स्मृतियां हैं। विगत का विश्लेषण, व्यक्तियों, स्थानों, घटनाओं और शाब्दिक चित्रों के माध्यम से साकार हो उठता है।कविता लय एवं आनंद का स्वच्छंद अलंकार है। जब भाव के भीतर भाव पिघलने लगता है, तो कविता कलात्मक हो उठती है। कवि की कविता ‘डाउन दी माइंड ऑफ ए स्पाइन’ एक ऐसी भावभीनी कविता है, जो पाठक को झकझोर देती है। आधुनिकता के इस युग में नारी की अस्मिता, पुरुष की कामुकता, समाज के कुकृत्य की अनदेखी पर कविता का एक-एक शब्द चिल्ला उठता है और मनुष्य के बर्बर व्यवहार को कोसता है। भावानुवाद में कविता की प्रारंभिक पंक्तियां देखें-

यह देश? युवा एवं वृद्ध औरतों का

जहां लंपट निगाहें केवल औरतों को नहीं

अपितु किशोरियों को भी उसी कामुक दृष्टि से भेदती है।

ललित की छोटी-छोटी कविताओं में विस्फोटक भाव अंतर्निहित हैं। ‘हार्ट बीट’ एक विलक्षण कविता है, जिसे पढ़ते ही मुझे हेमिंग्वे की कहानी ‘नाउ आई ले मी’ स्मरण हो आई, जिससे एक किशोरी के प्रथम संभोग या संभोग में दीक्षित होने की कहानी है। ‘हार्ट बीट’ ठीक वैसी ही शृंगारपरक परंतु शब्दों की मितव्ययिता के कारण घुटी हुई स्वरलहरी बन गई है। अनेक कविताओं में रोमांस की छटा अपने संयमित नियंत्रित रूप में व्याप्त है। ‘एमोडेस्ट टच’ ऐसी ही कविता है। ‘सांग फार एव वोमैन’ भी रस भीनी कविता है। कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कर देना ललित मोहन की अदा है। वैसे भी अनकहा कहे हुए में से निकले तो ज्यादा प्रभावशाली लगता है।

पुस्तक में 37 कविताएं संकलित हैं, एक से बढ़ कर एक रसोद्रेक से  छलकती हुईं यथा ‘नाट ए ब्लाइंड एली’, ‘ब्रीदिंग इन फ्लैश’, ‘आइज ब्लू दी व्हाट टेंड्रिल’, ए पैराबल आदि। लाउड व्हिस्पर्ज में जीवन का संगीत साकार हो उठा है। कविताएं  लाउड नहीं बल्कि मुझे तो लगता है कि ललित मोहन शर्मा की हर कविता में मौन मुखर हो उठता है और आप बार-बार पढ़ने पर अनेक अर्थों का आनंद ले सकते हैं। यह संग्रह भी उनके पूर्व काव्य संग्रह ‘पर्ल्ज एंड पेबल्स’ की परंपरा का कीट्सियन संग्रह है, जो उनके उत्कृष्ट शब्द-चयन, श्रेष्ठ भाव व्यंजना तथा उर्वर कल्पना के कारण किसी भी पाठक को सम्मोहित करने या उसे ‘लोटस-इटर्ज’ की तरह खुमारी में भेजने में सक्षम है। एक परिपक्व काव्य कृति के सृजन के लिए कवि साधुवाद का पात्र है।

-डा. सुशील कुमा फुल्ल, पुष्पांजलि, राजपुर, पालमपुर,

May 29th, 2016

 
 

कविताएं

सच में एक परी हो तुम गुलाब सी कोमल हो तुम। हवा सी चंचल हो तुम। कोयल सी मीठी हो तुम। संगीत सी मधुर हो तुम। कोई हूर या अप्सरा हो तुम। सच में एक परी हो तुम। दादा-दादी की जान हो तुम। मम्मी-पापा की […] विस्तृत....

May 29th, 2016

 

पत्रकारिता में गुंथा हुआ है साहित्य

सत्य और तथ्य को बेलाग और सृजनात्मक तरीके से अभिव्यक्त करना ही रचनाधर्मिता है। साहित्यकार और पत्रकार की रचनाधर्मिता के क्षेत्र अलग-अलग होते हुए भी दोनों में चोली-दामन का साथ है। दोनों ही समसामयिक समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी लेखनी के माध्यम से समाज […] विस्तृत....

May 29th, 2016

 

महिला लेखन की हिमाचली यात्रा

सरोज वशिष्ठ , रेखा वशिष्ठ , चंद्ररेखा डढवाल , सरोज परमार , नालिनी विवा , डा. उषा वंदे , हरिप्रिया                  आज जब हम भिन्न-भिन्न पत्र-पत्रिकाओं के कॉलम देखते हैं तो उसमें ‘स्त्री-विमर्श’, ‘स्त्री-स्वर’ या ‘स्त्री लेखन’ का संदर्भ मिलता है। ‘स्त्री लेखन’ होता क्या है? […] विस्तृत....

May 22nd, 2016

 

शाकाहारी संवेदना को बुकर

सोल इंस्टीच्यूट ऑफ आर्ट्स में रचनात्मक लेखन पढ़ाने वालीं 45 वर्षीय कांग दक्षिण कोरिया में पहले ही मशहूर हैं और वह यी सांग लिटरेरी प्राइज, टुडेज यंग आर्टिस्ट अवार्ड और कोरियन लिटरेचर अवार्ड जीत चुकी हैं। ‘द वेजिटेरियन’ उनका पहला उपन्यास है, जिसे 28 वर्षीय […] विस्तृत....

May 22nd, 2016

 

इनां सयाणयां जो लेआं समझाई…

घुमारवीं में ग्रीष्मोत्सव के उद्घाटन का मौका था। इस अवसर पर बतौर मुख्यातिथि पधारे थे नागालैंड-मिजोरम के पूर्व राज्यपाल व सीबीआई के पूर्व निदेशक तथा हिमाचल प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक डाक्टर अश्वनी कुमार। ग्रीष्मोत्सव में गैर राजनीतिक शख्सियत को मेले के उद्घाटन के लिए […] विस्तृत....

May 22nd, 2016

 

कविताएं

सड़कें कुछ आती कुछ जाती सड़कें, चुप रहतीं बतियाती सड़कें। किसी को लेकर जाती हैं तो, वापस भी हैं लाती सड़कें।। नहीं है चलती पर रुकती कब, सब पूछें, कहां जाती सड़कें। खड़े-खड़े ही इक दूजे से, देर-सवेर मिलाती सड़कें।। कहीं पे मीलों सीधी-लंबी, और […] विस्तृत....

May 22nd, 2016

 

तालाब का सहस्रनाम

महाराष्ट्र के महाड़ इलाके में एक तालाब का पानी इतना स्वादिष्ट था कि उसका नाम चवदार ताल यानी जायकेदार तालाब हो गया। समाज के पतन के दौर में इस तालाब पर कुछ जातियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लग गया था। सन् 1927 में चवदार ताल […] विस्तृत....

May 15th, 2016

 

जाते-जाते भी चौंका गया लेखकों का मसीहा

– डा. सुशील कुमार फुल्ल, पुष्पांजलि, रामपुर (पालमपुर) चौंकाना उनकी अदा थी। दैनिक ट्रिब्यून ने रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशनार्थ उपन्यास मांगा था। मैंने नागफांस उपन्यास विचारार्थ भेज रखा था। सन् 1980 का वर्ष रहा होगा। विजय सहगल का फोन आया…फुल्ल साहब! नागफांस नहीं छपेगा। कहकर […] विस्तृत....

May 15th, 2016

 

अरे साहब दारूवाला चौक कहिए…!

 किसी  शहर की  प्रोफाइल उसके किसी खास लैंडमार्क से होती है। अगर उसे शहर से निकाल दें तो शहर का वजूद ही शून्य हो जाता है। शहर का ऐसा लैंड मार्क साल-दो साल में नहीं, सदियों में बनता है… सोलन के प्यारे दोस्तों बात तो […] विस्तृत....

May 15th, 2016

 
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