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प्रतिबिम्ब


संस्कृति को सहेजने की राह दिखा गए लाल चंद प्रार्थी

हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू में साहित्यिक, राजनीतिक और सामाजिक उन्नति में स्व. श्री लाल चंद प्रार्थी जी का नाम कुल्लू जनपद में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण हिमाचल प्रदेश में गर्व की बात मानी जाती है। लाल चंद प्रार्थी जी को हिमाचल प्रदेश में ‘शेर-ए-कुल्लू’ के नाम से संबोधित किया जाता रहा है। मैंने स्वयं अपने बचपन से ही ‘प्रार्थी’ साहिब को बहुत सारे साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर बोलते-कहते, सुना और देखा है। एक आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे स्व. ‘प्रार्थी’ साहब। नए साहित्यकारों और युवाओं से उनका व्यवहार अत्यंत विनम्र और सौहार्दपूर्ण तो था ही। वह उनका सही दिशा निर्देशन करके भी उन्हें सहयोग पहुंचाते थे। कुल्लू सहित पूरे प्रदेश की संस्कृति को सहेजने और इसे विश्व स्तर तक ख्याति और गौरव दिलवाने का श्रेय भी लाल चंद जी प्रार्थी को ही दिया जाता है। तीन अप्रैल सन् 1916 को जिला कुल्लू में ‘नग्गर’ में जन्म लेने वाले प्रार्थी जी की प्रारंभिक शिक्षा यहीं पर हुई। बाद में उन्होंने लाहौर (पाकिस्तान) से आयुर्वेदाचार्य की उपाधि प्राप्त करके ‘डोगरा संदेश’ और ‘कांगड़ा समाचार’ के लिए साहित्य लिखा। इसके साथ ही 1940 में इनकी लिखी पुस्तक का ही एक गीत है ‘हे भगवान दो वरदान, काम देश के आएं हम’ आम जनमानस की जुबान पर होने के साथ ही 1990 के दशक में प्राथमिक पाठ्य पुस्तकों को भी पढ़ाया जाता रहा। उसी जमाने में कुल्लू से छप रहे एक समाचार पत्र के दो स्तंभों ‘लूहरी से लिफ्टी तक’ और ‘प्रार्थी के खड़प्क्के’ उस समय के पाठकों में अत्यंत लोकप्रिय हुए। प्रार्थी जी का साहित्य ही नहीं, उनका व्यक्तित्व भी बेदह आकर्षक था।

अंग्रेजी, फारसी, हिंदी, संस्कृत और उर्दू जुबान पर उनकी अच्छी खासी पकड़ थी। अपने धारा प्रवाह भाषणों से वह अपने श्रोताओं को लंबे समय तक बांधे रखने में भी सक्षम थे। यही कारण रहा कि हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री  स्व. डा. यशवंत सिंह परमार भी उनके व्यक्तित्व और साहित्य शृंखला के कायल थे। मुझे व्यक्तिगत तौर पर याद है कि वर्ष 1952, 1962,1967 से राजनीति में आकर वह विधायक होने के साथ मंत्री पद पर भी आसीन रहे। राजनीति और साहित्य के साथ ही प्रार्थी साहब की छाप आज भी बड़े-बुजुर्गों और साहित्यकारों के साथ-साथ आम लोगों में देखी जा सकती है, क्योंकि उन्हें अभिव्यक्ति कला की  विविध विधाओं और बारीकियों का पूर्ण ज्ञान था। लाहौर (पाकिस्तान) में निर्मित एक फिल्म ‘कारवां’ में उन्होंने अपने अभिनय की छाप भी दर्शकों पर छोड़ी। ‘देवप्रस्थ साहित्य संगम, कुल्लू’ से प्रकाशित पुस्तक ‘प्रार्थी के बिखरे फूल’ में उनके व्यक्तित्व के विविध पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। लाल चंद प्रार्थी ने हिमाचल प्रदेश की संस्कृति के उत्थान में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों की संस्कृति पर बढ़ते ब्रिटिश प्रभाव को देखकर  प्रार्थी जी ने तो उस समय  अपनी भाषा, बोली, कला और संस्कृति की सुरक्षा को जीवंत रखने का महत्त्वपूर्ण उपक्रम किया। प्रदेश के युवाओं को वे अन्य किसी संस्कृति से परिचित कराने में वह काफी हद तक सफल भी रहे। उनके प्रयासों के फलस्वरूप आम लोग भी अपनी कला और संस्कृति के प्रति सजग हुए सचेत हुए।

लाल चंद प्रार्थी जी ने ही हिमाचल प्रदेश कला एवं संस्कृति विभाग और अकादमी की स्थापना की थी। कुल्लू के दशहरा मेले को अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी स्थापित करके उन्होंने हिमाचली संस्कृति में संरक्षण में अविस्मरणीय योगदान दिया। यही नहीं, कुल्लू ढालपुर के दशहरा मैदान में वर्ष 1966-67 में ही स्वतंत्र आसमान के खुले दामन में ‘कला केंद्र’ की स्थापना कर चार चांद लगाए। यह कला केंद्र उनके देहांत के बाद आज लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र के नाम से जाना जाता है। प्रार्थी साहब उर्दू अदब में अपना खास मुकाम रखते हैं। इनका ‘वजूद-ओ-अदम’ किताब को भाषा कला और संस्कृति विभाग ने वर्ष 1983 में प्रकाशित किया। इन्हीं की लिखी ‘कुल्लू देश की कहानी’ एक अहम चर्चित किताब है, जो प्रदेश की लगभग हर पाठशाला में उपलब्ध है। जिला कुल्लू के पुरातन नृत्य ‘लालड़ी’ का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज होना भी प्रार्थी जी को दिल से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करना मानता हूं। 31 अक्तूबर को पहाड़ी दिवस के रूप में मनाए जाने की परंपरा का आगाज भी स्व. श्री लाल चंद प्रार्थी की कोशिशों उनके प्रयत्नों की ही देन है,जिससे हमें अपने प्रदेश की बोलियों अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता को सहेजने की प्रेरणा मिलती है। शायरी में हुस्न ओ इश्क, मादर-ए-वतन, शराब-ओ-शबाब, फर्ज-ए-वतन और …. और भी  दूसरे मौजू (विषय) पर ‘चांद कुल्लवी’ साहब की बेहद और मजबूत पकड़ थी, जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। इनकी एक नज्म के  चंद अश आर यहां प्रस्तुत हैं…

खुश्क धरती की दरारों ने किया याद अगर,

उनकी आशाओं का बादल हूं, बरस जाऊंगा।

कौन समझेगा कि फिर शोर में तन्हाई के, अपनी आवाज की सुनने को तरस जाऊंगा।। अंदाजा लगाया जा सकता है कि तीन अप्रैल, 1916 को जिला कुल्लू का ‘कायनात’ में चमकता यह ‘यह चांद कुल्लवी’ 11 दिसंबर, 1982 को हमेशा के लिए कहीं छिप गया।

-राजेंद्र पालमपुरी, शिक्षा विभाग, मनाली, कुल्लू

April 3rd, 2016

 
 

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे। अज्ञेय को प्रतिभा संपन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबंधकार, संपादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है… विस्तृत....

April 3rd, 2016

 

धरती की जयकार

मैली जिनकी हो रूह, मुख में हो तलवार। भाती उन्हें क्यों नहीं, धरती की जयकार।। कैसा वो है धर्म जो, न सिखाता सलाम। किरपा रखो उनपर प्रभु, भला करो श्रीराम।। नारी रूप पत्थर का, समझे जो फनकार। शरीर वो बिन काम का, जीवन भी बेकार।। […] विस्तृत....

April 3rd, 2016

 

कभी होली का पर्याय था शेखावाटी का चंग लोकनृत्य

घेरे के मध्य में एकत्रित होकर लोग धमाल और होली के गीत गाते हैं। इसमें भाग लेने वाले कलाकार पुरुष ही होते हैं, किंतु उनमें से एक या दो कलाकार महिला वेष धारण कर लेते हैं, जिन्हें ‘महरी’ कहा जाता है। भीड़ में उपस्थित सभी […] विस्तृत....

March 27th, 2016

 

एक प्रेरणापूर्ण आदर्शवादी जीवन की अर्थपूर्ण गाथा

पुस्तकः माई माउंटेन एंड माई वैली लेखक : ज्ञान चंद बैंस प्रकाशक : लाइब्रेरी ऑफ तिब्बतन वर्क्स एंड आरकाइव्ज, धर्मशाला मूल्य : 305 रुपए परमानंद शर्मा जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं। वह बहुभाषाविद लेखक हैं । उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी तथा पहाड़ी […] विस्तृत....

March 27th, 2016

 

प्राकृतिक सौंदर्य का अलाप है ‘ढोलरू परंपरा’

तीन-चार  महीने  की  कड़ी  सर्दी  झेलने  के  बाद  हिमाचलवासी  चैत्र  महीने का  स्वागत  खुले  दिल  और  पूरे  जोश  के  साथ  करते  हैं। चैत्र  अर्थात  मार्च  माह  के  उत्तरार्द्ध  में  हिमाचल  के  लगभग  सभी  पहाड़ी  क्षेत्रों  में  गर्मी  महसूस  होने  लगती  है  और  हिमाचल  के  लोग  […] विस्तृत....

March 27th, 2016

 

सहेजें रिश्तों को

अगर जवानों ओर बजुर्गों मे रिश्ता कायम रखना है तो फिर सिर्फ जवानों को ही नहीं बुजुर्गों को भी समझना पड़ेगा, दोनों को ही गहरी नींद से जागना पड़ेगा, बजुर्गों को भी समय की गति से चलना पड़ेगा, दोनों को ही  रिश्ते सुधारने के संबंध […] विस्तृत....

March 27th, 2016

 

कुछ दोहे

झिलमिल काली ओढ़नी, मुख पर है धूप। जग सारा मोहित हुआ , तेरा रूप अनूप ।। *** कश्मीरी हो सेब ज्यों , हुआ तुम्हारा रूप। छुअन प्रेमिका सी लगे, यह जाड़े की धूप।। ** रामदुलारी रो रही, चूल्हे पर धर नीर। बच्चों से कब तक […] विस्तृत....

March 27th, 2016

 

भवानी प्रसाद मिश्र

भवानी प्रसाद मिश्र हिंदी के प्रसिद्ध कवि तथा गांधीवादी विचारक थे। भवानी प्रसाद मिश्र दूसरे तार-सप्तक के एक प्रमुख कवि हैं। मिश्र जी विचारों, संस्कारों और अपने कार्यों से पूर्णतः गांधीवादी थे। गांधीवाद की स्वच्छता, पावनता और नैतिकता का प्रभाव भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं […] विस्तृत....

March 27th, 2016

 

शिवरात्रि में कलाओं का जलाभिषेक

कुल्लू दशहरा में हुई सामूहिक नाटी ने जहां पिछले साल विश्व कीर्तिमान स्थापित किया, वहीं प्रदेश में मेलों की शुरुआत करने वाले मंडी शिवरात्रि महोत्सव में जो इस बार प्रयास हुए,वे भी अपने आप में नया कीर्तिमान हो सकते हैं या फिर आने वाले सालों […] विस्तृत....

March 20th, 2016

 
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