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प्रतिबिम्ब


इतिहास के आईने में सिरमौर

राजा फतेह प्रकाश 1850 ई. के जेठ माह में 35 साल के शासन के बाद स्वर्ग सिधार गए, जिनमें 23 साल उनके वयस्क होने के बाद के थे, जबकि 12 साल रानी के संरक्षण काल के थे। वह एक योग्य प्रशासक था। उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र रघुबीर प्रकाश नियुक्त हुआ। राजा रघुबीर प्रकाश के तीन पुत्र हुए…

गुलेर रानी बहुत ही चतुर और साहसी स्त्री थी, उसने राजा के कार्यकलापों को संभालने की जिम्मेदारी ले ली और जनरल आक्टरलोनी जो उस समय लुधियाना में अंग्रेज सरकार के पोलिटिकल एजेंट थे, उनको अपील की। यह अपील बिलकुल उसी समय की गई, जब उन्होंने गोरखों के खिलाफ युद्ध घोषित किया और उनसे नाहन वापस लेने के लिए सेना भेजी। गोरखों को दून में कालींजर किले से निकालने के बाद अंग्रेजों ने नाहन में डेरा डाल दिया, जबकि काजी रणजोर थापा ने नाहन से सात मील दूर ऊंची पहाड़ी पर स्थित जैतक किले में अपने आपको बंद कर लिया। 7 दिसंबर, 1814 ई. को अंग्रेजों ने इस किले पर हमला कर दिया। गोरखों ने किला छोड़ दिया, लेकिन चढ़ाई की कठिनाई से थकी हुई और असंगठित अंग्रेज सेना पर उसने अचानक धावा बोल दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को धक्का लगा और काफी नुकसान हुआ। जैतक चार महीनों तक गोरखों के पास रहा और 1815 में अंग्रेजों की नेपाल सरकार के साथ संधि होने के उपरांत ही गोरखों ने इसे खाली किया। उसी साल 1815 ई. में सिरमौर को इसके पुराने शासकों को वापस दे दिया गया, लेकिन कमर प्रकाश को राजा नहीं बनाया गया, बल्कि उसके पुत्र फतेह प्रकाश को राजा बनाने की सनद दे दी गई और उसकी अवयस्कता तक गुलेर रानी को उसका प्रतिशासक और संरक्षक नियुक्त कर दिया गया।

मोरनी और जगतगढ़ के किलों समेत जौनसर का परगना और क्यारदा दून अंग्रेजों ने अपने पास रख लिए। कमर प्रकाश अपनी मृत्यु, 1826ई. तक बुरिया में ही रहा। उसकी चार बेटियां थीं, एक गढ़वाल के सुखदर्शन शाह, दो नालागढ़ के राजा विजय चंद और चौथी लड़की बिलासपुर के राजा खड़क चंद से ब्याही गई। राजा फतेह प्रकाश की गढ़वाल के राजा की बेटी के साथ प्रस्तावित शादी नहीं हो सकी, क्योंकि इसके लिए शादी का खर्च बहुत ज्यादा था और जनरल आक्टरलोनी ने राजा के बच्चों की शादी पर होने वाले खर्चे को जनता पर कर लगाकार (फैंटबियाहलडी) इकट्ठा करने पर रोक लगा दी। गुलेर रानी के प्रतिशासन और संरक्षण के समय राज्य के अधिकारियों के स्वार्थपन और उदासीनता के कारण राज्य का प्रशासन सुव्यवस्थित व सुचारू रूप से नहीं चल सका, परंतु रामगढ़ के मियां खुशहाल सिंह और रामदेव के लड़कों मियां देवी सिंह और दलीप सिंह ने 1823 ई. में सिरमौर में स्वामिभक्ति का इकरारनामा किया, जिससे रामगढ़ पक्के तौर से सिरमौर में मिल गया।

1827 में जनरल आक्टरलोनी की घोषणा के फलस्वरूप फतेह प्रकाश को राजा की पूरी शक्तियां दे दी गईं और 1833 में 50000 रुपए की अदायगी की एवज में कियारदा दून भी उसको वापस लौटा दिया गया।1838 में प्रथम अफगान युद्ध के लिए राजा ने एक सैनिक टुकड़ी पेश की और अंग्रेज सरकार ने इस पेशकश के लिए राजा का धन्यवाद किया।प्रथम सिख युद्ध के समय राजा के धीरज सिंह खवास की कमांड में ब्रिटिश सेनाओं की सहायता के लिए हरिकेपाटन के लिए सेना की टुकड़ी भेजी, जहां उसने सराहनीय कार्य किया। राजा फतेह प्रकाश 1850 ई. के जेठ माह में 35 साल के शासन के बाद स्वर्ग सिधार गए, जिनमें 23 साल उनके व्यस्क होने के बाद के थे, जबकि 12 साल रानी के संरक्षण काल के थे। वह एक योग्य प्रशासक था। उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र रघुबीर प्रकाश नियुक्त हुआ। राजा रघुबीर प्रकाश के तीन पुत्र हुए, जिनमें सबसे छोटा पुत्र कुंवर देवी सिंह जंगलात का विशेष सहायक कंजरवेटर बना, दो पुत्रियां थी, जिनमें से छोटी पुत्री लंबाग्राओं के मेजर राजा जय चंद की माता थी।

महावीर सिंह मान, सेवानिवृत्त असिस्टेंट  डायरेक्टर, आर्काइव्ज विभाग, हरियाणा

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