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प्रतिबिम्ब


मानसिक और चारित्रक विकास में सहायक

जब मैं बचपन में अपनी नानी के घर जाया करता था तो उस समय वहां गीता प्रेस की पुस्तकों के साथ मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ आया करती थी। तभी से मैं गीता प्रेस के प्रकाशन से जुड़ा। गीता प्रेस की पुस्तकों ने हमारी पीढ़ी के बच्चों में चारित्रिक विकास करने के साथ-साथ हमारा मानसिक विकास भी किया है। उनकी ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’, ‘वीर बालक’ जैसी पुस्तकें बच्चोें को तराशने के लिए बेहद मददगार रही हैं। गीता प्रेस का सांस्कृतिक अभियान स्वैच्छिक रूप से चलने वाला बहुत बड़ा अभियान है। इसके संस्थापक हनुमान प्रसाद ने इसके प्रकाशन को भारत तक सीमित रखा बल्कि बाहरी देशों में भी जहां-जहां भारतवासी बसे हैं,हिंदू धर्म का प्रचार- प्रसार किया। गीता प्रेस के बहुत पुराने प्रकाशनों की कुछ बातें आधुनिक संदर्भों में प्रसंगिक नहीं रह गई हैं। महिलाओं की शिक्षा इसका एक उदाहरण है। इसके साथ-साथ ही अनुसूचित जाति को लेकर भी गीता प्रेस से प्रकाशित पुस्तकों में पुराने संदर्भों को ही पेश किया गया है। हिमाचल में जिन भी परिवारों से मैं जुड़ा हूं, उनमें गीता प्रेस को लेकर चर्चा न तो मैंने सुनी है और न ही इनकी पुस्तकों और पत्रिकाओं का प्रचलन मुझे इन परिवारों में देखने को मिला है। मेरा मानना है कि पिछले 20-25 सालों से हिमाचल में गीता प्रकाशन की पुस्तकें न तो घरों में देखने को मिलती हैं और न ही बुक स्टालों पर।

—अजय श्रीवास्तव, शिमला

October 11th, 2015

 
 

गीता प्रेस के शिल्पी ‘भाई जी’

आज गीता प्रेस गोरखपुर का नाम किसी भी भारतीय के लिए अनजाना नहीं है। सनातन हिंदू संस्कृति में आस्था रखने वाला दुनिया में शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जो गीता प्रेस गोरखपुर के नाम से परिचित नहीं होगा। इस देश में और दुनिया के […] विस्तृत....

October 11th, 2015

 

बंद हो अंग्रेजी का थोपना

भारत में शिक्षा के अधःपतन की आज एक नई खबर आई है। एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश करनेवाले छात्रों की संख्या दोगुनी हो गई है जबकि हिंदी माध्यम की पाठशालाओं में भर्ती सिर्फ एक-चौथाई बढ़ी है। यानी […] विस्तृत....

October 4th, 2015

 

दादाजी की व्यवस्था

बच्चे अच्छे पढ़ जाएं तो भी मां-बाप दुखी और न पढ़ें तो भी। अच्छे पढं़े तो घर से पलायन। न पढ़ें तो मां-बाप पर बोझ-दादाजी के साथ भी यही हुआ। बच्चे पढ़े और अच्छे जीवन की तलाश में बाहर निकल गए। मास्टर के बच्चे उच्च […] विस्तृत....

October 4th, 2015

 

वीरेन डंगवाल का निधन

जाने-माने हिंदी कवि और वरिष्ठ पत्रकार वीरेन डंगवाल का 28 सितंबर, सोमवार को सुबह निधन हो गया। वह 68 साल के थे। वीरेन दा के नाम से लोकप्रिय वीरेन डंगवाल काफी समय से बीमार चल रहे थे। कैंसर की चपेट में आने के बाद भी […] विस्तृत....

October 4th, 2015

 

मैं हिंदी हूं

मैं हिंदी हूं! आवाम की जिंदगी हूं, भारत का कतरा-कतरा खून हूं , यहीं की धूल,यहीं की माटी हूं हर माथे के पसीने की चमक हूं दुनिया की पूरी आबादी के छठवें हिस्से का वजूद हूं हर भूख की गवाह हूं हर ईमान की जमानत […] विस्तृत....

October 4th, 2015

 

जीवनानुभवों को काव्यात्मक तरलता में ढालता कवि

काव्य संग्रह : समय के साथ (2014),  मूल्य : 395 रुपए लेखक : डा. गौतम शर्मा व्यथित प्रकाशक : विद्या वाणी प्रकाशन, मकान नं. 32, भार्गव लेन, वुडवर्ड रोड, सिविल लाइन, दिल्ली 110054 समय के साथ वरिष्ठ लेखक डा. गौतम शर्मा व्यथित का नवीनतम काव्य […] विस्तृत....

October 4th, 2015

 

शोध से होगा प्रतिष्ठा का बोध

जब भी हिंदी की स्थिति का आकलन किया जाता है तो दो निर्विवाद तथ्य उभरकर हमारे सामने आते हैं। पहला यह कि हिंदी का विस्तार उसके परंपरागत क्षेत्र से बाहर हो रहा है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे कुछ प्रदेशों को छोड़कर, जहां कि त्रिभाषा […] विस्तृत....

September 27th, 2015

 

पुस्तक समीक्षा

उम्र के साथ परिपक्व होते अनुभवों की रागात्मक यात्रा ‘परिंदों के परों पर’ छू लो आसमान’ काव्य संग्रहों की कड़ी में ‘कहां ढूंढूं अपना घर’ तीसरा काव्य पुष्प है। व्यवसाय से कृषि वैज्ञानिक कवि प्रदीप शर्मा सरस, सरल भावाभिव्यक्तियों के शब्द शिल्पी हैं। इनके पूर्व […] विस्तृत....

September 27th, 2015

 

भाषायी संवाद का पहाड़ी पक्ष

विमर्श अस्मिता के नाम पर हिमाचल प्रदेश के भाषायी विमर्श को ‘पहाड़ी बनाम हिंदी’ की तरफ मोड़ने की कोशिश की जा रही है। क्या वास्तव में हिंदी और पहाड़ी के बीच ‘बनाम’ जैसी कोई स्थिति है? क्या दोनों भाषाएं एक ही सांस्कृतिक गर्भनाल से नहीं […] विस्तृत....

September 27th, 2015

 
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