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प्रतिबिम्ब


बहुत गहरे तक टीस दे गया कांता शर्मा का जाना

अतिशालीन, सौम्य डा. कांता शर्मा का परलोक गमन पूरे साहित्यिक समाज को एक  गहरी टीस एवं वेदना दे गया है। 30 दिसंबर, 1966 को जन्मीं जिला मंडी की इस होनहार एवं हरदिल अजीज लेखिका का व्यक्तित्व एवं कृतित्व ही कुछ ऐसा था कि वह सभी को अभिभूत कर देती थीं। साहित्यिक आयोजनों तथा मंचीय प्रस्तुतियों की वह शान होती थीं। कविता पाठ एवं भाषण के साथ उसकी जिह्वा पर साक्षात सरस्वती देवी का निवास नजर आता था। अनेकों साहित्यिक संस्थाओं की सक्रिय सदस्यता के साथ-साथ ‘ऑथर्ज गिल्ड ऑफ हिमाचल’ की मंडी इकाई की प्रमुख के रूप में आपकी सहभागिता हमेशा प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय रही। ऑथर्ज गिल्ड  के प्रत्येक आयोजन से पहुंचना और गिल्ड की योजनाओं के क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना, इनका हमेशा उद्देश्य रहा। एक शिक्षिका एवं शिक्षाविद होने के साथ-साथ आपकी लेखनी का ही कमाल था कि ‘अचानक नहीं सूखी नदी’ तथा ‘जिंदगी अंतर्मन’ जैसे काव्य संग्रहों और दो-दो  शोध प्रबंधों के अतिरिक्त अनेकों कविताएं, लेख, कहानियां प्रदेश तथा राष्ट्रीय स्तर की पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहे। शारदा एवं टांकरी लिपि पर अध्ययन और पांडुलिपियों की खोज में भी आपने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। दूरदर्शन एवं आकाशवाणी पर आपकी कविताओं एवं वार्ताओं का सिलसिला मनमोह लेता था। डा. कांता शर्मा ने हमेशा अपने सरल और सहज व्यक्तित्व से सभी को स्नेह, लाड़-प्यार, सत्कार बांटने का प्रयास किया। उन्होंने  नवोदित व प्रतिष्ठित लेखकों तथा नवीन व प्राचीन पीढ़ी के बीच एक सेतु स्थापित करने का सफल प्रयास किया। भावों एवं संस्कारों की तो वह एक खान थीं और स्वयं सुसंस्कृत होते हुए सब में संस्कार पैदा करने की उन्होंने सदा कोशिश की। आज उनके आकस्मिक निधन से जहां उनका घर-परिवार सूना-सूना व अचंभित है, वहां पूरा साहित्यिक समाज खुद को गहरे सदमे में पा रहा है। सभी एक-दूसरे से दुख साझा तो कर रहे हैं, पर जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी भरपाई किसी के वश की बात नहीं है।

रमेश चंद मस्ताना, महासचिव ऑथर्ज गिल्ड, मस्त कुटीर, नरेटी, कांगड़ा (हि प्र)

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December 20th, 2015

 
 

अनिश्चय पर अडिग थे दुष्यंत कुमार

गजल की नफासत के साथ कविता लिखने और कविता में जनता का स्वर देने का दुरुह कार्य दुष्यंत कुमार के लेखन में बहुत सहजता के साथ हुआ है। उनकी कविता ने पारंपरिक शैलियों को ध्वस्त करने के साथ-साथ सभी के बीच समन्वय भी स्थापित किया। […] विस्तृत....

December 20th, 2015

 

संजीदगी की ‘सरोज’ थीं वह

सरोज की आंखे हमेशा समाज के लिए कुछ नया करने के सपने बुनती थी। अपनी बेबाक अंदाज और बात-बात पर ढहाका मार कर हंस देने की उनकी आदत किसी भी गंभीर माहौल को हल्का बना देती हैं। सरोज एक अनुवादक के तौर पर अपना परिचय […] विस्तृत....

December 13th, 2015

 

इतिहास के आईने में सिरमौर

सिरमौर का आरंभिक इतिहास दंत कथाओं से भरपूर है। संवत् 1139 यानी कि 1082 ई. में मदन सिंह, जो कि सूर्यवंशी राजपूत थे,  सिरमौर के राजा हुआ करते थे। यह रियासत सिरमौर या सिलमोर के नाम से प्रसिद्ध थी और सिरमौर इसकी राजधानी थी। कहते […] विस्तृत....

December 13th, 2015

 

एक कलमकार की व्यथा-कथा

अंधी मां और कलियुगी पुत्र मिलकर घर की  सत्ता का संचालन कर रहे हैं। इससे उनकी हालत और भी दयनीय हो गई है। शर्मा जी कहते हैं काश! धन संचय किया होता तब यह दिन न देखना पड़ता। पुत्र को ही धन मान लिया! अब […] विस्तृत....

December 13th, 2015

 

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक : फिर मिलेंगे (लघु उपन्यास) प्रथम संस्करण ः 2015 पृष्ठ 64 मूल्य 150 लेखिका : प्रिय आनंद प्रकाशक : राजा पब्लिशिंग हाउस, सीलमपुर (पूर्व) दिल्ली-110031 प्रेम की नित्यता-अनित्यता को चित्रांकित करता रोचक उपन्यास कथा साहित्य में पे्रम शाश्वत विषय रहा है। यह अनेक रूपों […] विस्तृत....

December 13th, 2015

 

असहिष्णुता महानगरीय फेनोमिना है… अशोक भगत

जब पूरे देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता की बहस चल रही हो, ऐसे समय में झारखंड के वनवासी सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री अशोक भगत द्वारा पुरस्कार लौटाने वालों को संयम बरतने की सलाह महत्वपूर्ण हो जाती है। पद्श्री अशोक भगत के बयान की चर्चा करने से […] विस्तृत....

December 13th, 2015

 

बाल कविता

वर्षा रानी वर्षा रानी वर्षा रानी, वर्षा रानी, तुम्हें सुनाऊं एक कहानी। एक था श्याम, बदन का राजा, सुरमई सांवला बड़ा सलोना। जिसने झटपट चला दिया था, रानी पर ही जादू टोना।। गुर्राया जब बादल राजा, छम-छम बरसी वर्षा रानी, वर्षा रानी, वर्षा रानी, तुम्हें […] विस्तृत....

December 13th, 2015

 

असहिष्णुता पर संवाद

आयोजन में उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, विष्णु नागर, ज्ञानेंद्र बरतरिया और प्रियदर्शन शामिल हुए। जैसा कि अनुमान था कि मंच पर बैठे बुद्धिजीवियों के साथ साथ उन्हें सुनने आए श्रोता भी दो पक्ष में बंट जाएंगे। वही हुआ। बहस हुई, टकराव हुआ और फिर बीच-बचाव […] विस्तृत....

December 6th, 2015

 

लघुकथा

देशभक्ति मोहन की पत्नी अपने तीन बच्चों के साथ शहर में रहती है और बाकी परिवार गांव में। तीनों बच्चे अभी प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ रहे थे। पति सेना में थे और उनकी ड्यूटी श्रीनगर में थी। रात के नौ बजे सेना के हैडक्वार्टर से […] विस्तृत....

December 6th, 2015

 
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