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प्रतिबिम्ब


हिमाचल प्रदेश में कहानी का सफर

प्रकाश चंद धीमान

गुलेरी एवं यशपाल के बाद जिन कहानीकारों ने हिमाचल की हिंदी कहानी परपंरा को आगे बढ़ाया, उनमें सन् 1968 में प्रकाशित रमेश चंद्र शर्मा कृत ‘पगध्वनियां’ व कुलभूषण ‘कायस्थ’ कृत ‘घिराव’ कहानी संग्रहोें का नाम उल्लेखनीय है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सन् 1972 में किशोरी लाल वैद्य ने ‘एक कथा परिवेश’ संपादित व सन् 1975 में स्वरचित कहानी संग्रह ‘सफेद प्रतिमा काले साये’ प्रकाशित करवा करके जनमानस तक पहुंचाने का स्तुत्य प्रयास किया है। सन् 1978 में केशव ने ‘फासला’ व तारापाल ने ‘दूसरा मोड़’ तथा हिमाचल प्रदेश के एक प्रमुख प्रतिबद्ध व समर्पित कहानीकार-समीक्षक डा. सुशील कुमा फुल्ल ने ‘पगडंडियां’ व ‘सहज कहानियां’ कहानी संग्रह का संपादन किया। सन् 1979 में प्रेम शर्मा का ‘चक्कर नंबरों का’, सुदर्शन वरिष्ठ कृत ‘अंतरालों में घटता समय’ व श्रीकांत प्रत्यूष गुलेरी कृत ‘स्मृति’ कहानी संग्रह प्रकाश में आए। सन् 1981 में सुशील कुमार फुल्ल ने ‘खंड खंड मानसिकता’, दिनेश धर्मपाल ने ‘क्षितिज’ तथा हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सुपरिचित साहित्यकार शांता कुमार व उनकी धर्मपत्नी संतोष शैलजा ने ‘ज्योतिर्मयी’ कहानी संग्रह आम पाठक के पठनार्थ लोकार्पित किए। सन् 1983 में दिनेश धर्मपाल कृत ‘सौरभ’, सुदर्शन वशिष्ठ संपादित ‘खुलते अमलतास’, राजकुमार राकेश कृत ‘खुले हाथ’ सुरेंद्रनाथ वर्मा कृत ‘अंबरों की चिंगम’ तुलसी रमण संपादित ‘पहाड़ से समुद्र तक’, श्रीनिवास जोशी संपादित ‘कथांतर’, सुदर्शन वशिष्ठ कृत ‘घाटियों की गंध’, बीआर मुसाफिर कृत ‘रूपा’ संतराम वत्स्य कृत ‘भीष्म पितामह’, राजकुमार राकेश कृत ‘समय का प्रवाह’, शंकर लाल शर्मा कृत ‘बिके हुए लोग’ राजेश भाटिया कृत ‘खिलौना’ व सदानंद कृत ‘समर्पिता’ अनेक मौलिक व संपादित कहानी संग्रह हिमाचली हिंदी कहानी साहित्य को बराबर समृद्ध-संपन्न करते गए।सन् 1985 में संसार चंद प्रभाकर कृत ‘मानव मन’, कमला ठाकुर कृत ‘हादसा’, डा. राजेश कृत ‘व्यंग्यधारा’, डा. रामेदव मूर्ति ‘प्रशांत’ -कृत ‘चटखी हुई जिंदगी’, डा. सुशील कुमार फुल्ल कृत ‘मेमना’, जगदीश शर्मा कृत ‘जमा हुआ जल’, सुदर्शन वरिष्ठ कृत ‘सेमल के फूल’, श्रीनिवास जोशी संपादित ‘पांच सपने’, बद्री सिंह भाटिया कृत ‘छोटा पड़ता आसमान’ व ‘ठिठके हुए पल’, प्रभा गुप्ता कृत ‘बारादरी’ तथा केशव कृत ‘अलाव’ आदि कहानी संकलनों ने हिमाचल के हिंदी कहानी साहित्य में अहम भूमिका निभाई है। सन् 1986 में कहानी विधा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित करते हुए डा. सुशील कुमार फुल्ल ने ‘मेरी आंचलिक कहानियां’ व ‘मेरी प्रिय कहानियां’ कहानी संग्रह प्रकाशित करवाए तो सुदर्शन वशिष्ठ ‘पिंजरा’, डा. गौतम व्यथित ‘उसके लौटने तक’, स्नेहलता भारद्वाज ‘टुकड़े-टुकड़े कहानी’, सुदर्शन सुनेजा ‘सूरज नहीं उगेगा’ तथा एसआर हरनोट ‘पंजा’ नामक कहानी संग्रह प्रकाशित करवाकर हिमाचली हिंदी कहानी को नए आयाम देते रहे। सन् 1987 में प्रकाश चंद धीमान कृत ‘और वह भाग गई’ सुदर्शन वशिष्ठ  ‘गेट संस्कृति’ और मुरारी शर्मा कृत ‘पत्थर पिघलते नहीं’ आदि कहानी संग्रह प्रमुख हैं। निःसंदेह हिमाचल प्रदेश के चंद कहानीकार ही हिमाचल के हिंदी कहानी साहित्य को शिखर तक ले जाने में अपनी प्रतिबद्धता दिखाते रहे हैं।

प्रकाश चंद्र धीमान ने ‘बागर’ पत्रिका का संपादन कर हिमाचली का पथ प्रशस्त किया है और हिंदी कहानी में भी नाम कमाया है।   अतिथि संपादक

 

April 17th, 2017

 
 

हिमाचल की हिंदी कहानी के पद चिह्न

डा. हेमराज कौशिक चन्द्रधर शर्मा गुलेरी,यशपाल,योगेश्वर गुलेरी,कृष्न कुमार नूतन के बाद सुशील कुमार अवस्थी का नाम आता है, जिनका राखी शीर्षक संग्रह सन् 1957 में प्रकाशित हुआ। अवस्थी की कहानियां सपाट शैली की रचनांए हैं। इसके बाद सत्येन शर्मा का ‘संपादित  संग्रह ‘बर्फ  के हीरे’ […] विस्तृत....

April 17th, 2017

 

हिंदी कहानी का वर्तमान

अरुण भारती कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने मुझे हिमाचल प्रदेश के एक चर्चित कहानीकार की एक कहानी को पढ़ने का आग्रह किया। वह कहानी प्रदेश से बाहर छपने वाली एक पत्रिका में छपी थी और उस पत्रिका में नामी गिरामी तथा कथित आलोचकों […] विस्तृत....

April 17th, 2017

 

हिमाचल में हिंदी कहानी की प्रकृति

त्रिलोक नाथ कहानी के क्षेत्र में हिमाचल की समृद्ध देन है। कहानी लेखन के इतिहास की जांच परख करते समय दिवंगत और वरिष्ठ कहानीकारों के योगदान का वर्णन अधिकतर होता रहता है। मेरे लिए वरिष्ठ वे हैं जो सत्तर वर्ष पार कर चुके हैं। उनमें […] विस्तृत....

April 10th, 2017

 

‘कुछ तो है जो रह-रह कर दिल में खटकता है’

हंसराज भारती मैं वर्ष 1987 में ही हिमाचल प्रदेश से सीधे संबद्ध हुआ। मेरी जन्मभूमि तो थी, पर उस वक्त तक कर्मभूमि नहीं। यहां के साहित्यिक परिवेश से उस समय अधिक परिचित नहीं था। अपनी बिखरी जिंदगी को जैसे-जैसे व्यवस्थित करने के बाद यहां के […] विस्तृत....

April 10th, 2017

 

कहानी की फसल सूखी जाए रे

आजकल हिमाचल में कवि तो बड़ी उछलकूद मचा रहे हैं, परंतु कथाकारों की चाल धीमी हो गई है। क्या कथा की जमीन इतनी पथरीली है, इतनी खुश्क है कि तोड़ने में बहुत ताकत लगती है और सब्र और समय चाहिए। क्या ज्यादा कागज काले करने […] विस्तृत....

April 10th, 2017

 

सूर्य सेन

सूर्य सेन भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले प्रसिद्ध क्रांतिकारियों और अमर शहीदों में गिने जाते हैं।  सूर्य सेन ‘नेशनल हाई स्कूल’ में उच्च स्नातक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे, जिस कारण लोग उन्हें प्यार से ‘मास्टर दा’ कहते थे।‘चटगांव आर्मरी रेड’ […] विस्तृत....

April 10th, 2017

 

आंचलिकता ने दी है अलग पहचान

किसी एक कहानी के साथ समय कई नई कहानियां जोड़ देता है। इसी कारण कालांतर में कहानी के उत्स को पहचानना और उसके पड़ावों को चिन्हित करना मुश्किल हो जाता है। यह प्रक्रिया हमें इस बात के लिए सजग करती है कि हम अपनी कहानी […] विस्तृत....

April 10th, 2017

 

हावी हो गई है रेवड़ी बांटने की मानसिकता

हाल ही में संसद में हिमाचल प्रदेश की शिमला संसदीय क्षेत्र से सांसद वीरेंद्र कश्यप के प्रदेश के जातीय तथा निचले भूभागों में बोली जाने वाली बोलियों के लुप्त हो जाने पर चिंता जताई। इन बोलियों में किन्नौरी जनजातीय क्षेत्रों, लाहुल-स्पीति आदि अनेक स्थानों की […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

कुछ दायित्व साझे हैं…

चंबा जनपद की हिमाच्छादित पर्वत शृृंखलाएं व मनमोहक घाटियां जिस तरह जनमानस को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, उसी तरह लोक साहित्य में ढली लोक संवेदनाएं भी इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। जीवन के विविध आयाम चंबियाली लोक साहित्य में यत्र- तत्र बिखरे […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 
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