Divya Himachal Logo Feb 24th, 2017

प्रतिबिम्ब


गजलें

हजारों दीप मैंने बुझते जलाए हैं, गिला किसका।

मैंने वंदे तो क्या पत्थर हंसाए हैं ,गिला किसका।

गगन जब था मुसीबत में तो टूटा इस तरह सारा,

मैंने सूरज सितारे चांद बचाए हैं ,गिला किसका।

मेरे आंसू ने कीमत इस तरह अदा की है,

जरूरत पड़ने पर पर्वत उठाए हैं, गिला किसका।

नदी के छलकते पानी में खड़ कर देखा है हमने,

हमेशा दुश्मनों के डूबे साए हैं, गिला किसका।

मैंने जीवन की सारी धूप में छायों में उत्कंठा में,

कभी आंसू कभी नगमे चुराए हैं गिला किसका,

चढ़े तूफान के भीतर घटा घनघोर बन-बनकर,

कि हमने लहर ऊपर गीत गाए हैं गिला किसका,

तेरे पैरों की नाजुकता तू इक बारी तो आ कर देख,

मुलायम मखमली बिस्तर बिछाए हैं गिला किसका।

मोहब्बत को वो पुल बन कर तो देखे, सुमन हमने भी,

किनारे से किनारे तक सजाए हैं गिला किसका,

मोहब्बत आजमा बेशक, कि हमने भी तो यह आंसू,

पलक पर आने से पहले छुपाए हैं गिला किसका,

धनुष से तीर निकले फिर कभी वापिस नहीं आते,

मैंने वो तीर सब वापिस बुलाए हैं गिला किसका।

बढ़ा कर हाथ हमने दोस्ती की मुहर लगा दी है,

उन्होंने ने भी कदम आगे बढ़ाए हैं गिला किसका,

यह जीवन है मेरे बालम, यह सारा खेल किस्मत का,

कभी अपने भी हो जाते पराए हैं गिला किसका।

 

नेताओं की खेल सियासत समझ गया है चाचा,

बिन तकड़ी के करते तिजारत समझ गया है चाचा।

रंग-बिरंगे भेस बनाकर खाकर रिश्वतखोरी,

लूट लिया है सारा भारत समझ गया है चाचा।

अपना आप बचाकर चल आशा न रख दूजे पर,

रखवाले करते न हिफाजत समझ गया है चाचा।

मतलब की दुनिया सारी, मतलब की मर्यादा,

कहने को है यार मोहब्बत समझ गया है चाचा।

आया मौसम वोटों का, मदिरा नेता से पीकर,

किसने की है यार शरारत समझ गया है चाचा।

वोटें लेकर गांव में नेता पांच वर्ष नहीं आते,

नेताओं की खचरी आदत समझ गया है चाचा।

गुलशन में तो अकसर होती तीखे कांटों वाली,

सुंदर फूलों से नजाकत समझ गया है चाचा।

लोगों में तो बुद्धि आती जाती रहती है,

आंदोलन की आए आफत समझ गया है चाचा।

नकल सिफारिश बेरोजगारी रिश्वत कैसे छूटे,

ठगी महंगाई और गुरबत समझ गया है चाचा।

रिश्ते नाते सूली टंग कर अनुशासनहीन बने,

कुरसी के लिए बगावत समझ गया है चाचा।

देश लिए न सोचे कोई, सोचे घर की खातिर,

लेकर उल्फत देते नफरत समझ गया है चाचा।

‘बालम’ के कहने पर अब तो वोटर नहीं है बिकता,

हक अनुशासन साथ शराफत समझ गया है चाचा।

—बलविंदर ‘बालम’ गुरदासपुर ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब)

January 16th, 2017

 
 

हिमाचली पहचान की यात्रा

हिमाचल की स्थापना 1948 में हुई। देश की आजादी की घोषणा के आठ महीनों बाद इस कार्य में तत्कालीन केंद्रीय नेताओं, प्रशासकों और स्थानीय नेताओं के योगदान को भुला नहीं सकते। उन्होंने पर्वतीय लोगों की अक्षुण्ण स्वायत्तता को तरजीह दी और इसे भारतीय परिसंघ का […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 

लोक देवता ख्वाजा पीर

इसी प्रकार यदि कोई आप पर झूठा आरोप लगाता है, जिससे मन को कष्ट तो होता ही है, साथ में बदनामी भी होती है…तब भी इसी प्रकार लोक देवता ख्वाजा पीर के आगे फरियाद करने से आपको कुछ समय के बाद न्याय अवश्य मिलेगा। उपरोक्त […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 

मां! मेरा बचपन लौटा दो!

मां! सुन लो करुण पुकार मेरी क्यों नहीं चुभती पीड़ा मेरी? नन्हीं परियों की कथा सुना दो मां! मेरा बचपन मुझे लौटा दो।। मां! दूध मिले, न आंचल तेरा अंधकार छाया, मुझमें घनेरा। माता कुमाता, कभी भी न होती होते उसके संतान, कभी न रोती।। […] विस्तृत....

January 16th, 2017

 

कविताएं

आहुति अंतर्मन की तुम तह खोलो, बिन सोचे बिन समझे बोलो। सोच समझ है होती छोटी, केंद्र-बिंदु तुम जरा टटोलो।। शांत-चित्त होकर हे मानव!, देखो अंदर कितने दानव। करते क्रीड़ा देते पीड़ा, काटे कैसे कामी कीड़ा। कर्णप्रिय गुंजार बहुत हैं, आकर्षण शृंगार बहुत हैं। तुझे […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

मजबूरी

कालेज पूरा हो गया था। राखी की शादी कुछ दिनों बाद थी। सभी दोस्तों को निमंत्रण पत्र मिल गए, सभी जाने की तैयारी के लिए खरीददारी करने लगे, लेकिन उसकी सहेली गुडि़या थोड़ी चुप सी थी। साथ तो होती पर, सबमें अकेली। घूमकर शाम को […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

लोक देवता ख्वाजा पीर

यही तो इन लोक-देवताओं की वास्तविकता का प्रमाण है। फिर इनसे क्षमा-याचना करके और दूध, दही, रोट, चूरमां, खीर तथा बलेई आदि देवता से संबंधित पकवान भेंट किया जाता है। तब दूध में खून आना अपने आप ही बंद हो जाता है। यदि इन लोक […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

सृजन की जमीन पर उम्मीदों का नववर्ष

हिमाचल में सृजन की उर्वरा जमीन पर उम्मीदों की नई कोंपलें फूटंेगी ऐसी संभावना है। साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ अपने समय का प्रामाणिक दस्तावेज भी होता है। जो अपने समय, समाज, संस्कृति और इतिहास को भी रेखांकित करता है। हिमाचली रचनाकारों में […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

हिमाचली भाषा की संभावनाएं

हिमाचल प्रदेश भाषा विभाग की पहाड़ी दिवस पर आयोजित संगोष्ठियों में भी इस विषय पर बहस हुई। ‘दिव्य हिमाचल’ के प्रतिबिंब स्तंभ में इस विषय पर लेखकों के विचार पाठकों को पढ़ने-सोचने को मिले, जो इस भाषा के प्रति सामयिक चिंतन को रेखांकित करते हैं। […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 

आशापूर्णा देवी

आशापूर्णा देवी बांग्ला भाषा की प्रख्यात उपन्यासकार हैं, जिन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में लिखना प्रारंभ कर दिया था और तब से ही उनकी लेखनी निरंतर सक्रिय बनी रही। अपनी प्रतिभा के कारण उन्हें समकालीन बांग्ला उपन्यासकारों की प्रथम पंक्ति में गौरवपूर्ण स्थान मिला। […] विस्तृत....

January 9th, 2017

 
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