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प्रतिबिम्ब


विस्थापितों के हक पर गैर विस्थापितों का कब्जा

विस्थापित शब्द आजकल प्रायः हर रोज पढ़ने और सुनने को मिलता है। इसका सरलार्थ है कि सरकार द्वारा किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह की संपत्ति (भवन-भूमि आदि) का सार्वजनिक हित में मुआवजा राशि देकर अधिग्रहण करना। कल्याणकारी राज्य होने के नाते विस्थापितों के उचित पुनर्वास की जिम्मेदारी भी सरकार की ही बनती है। भाखड़ा बांध विस्थापितों की यह व्यथा-गाथा कमावेश सब जगह के विस्थापितों की समस्याओं को दर्शाती है। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा देश के विकास के लिए अति आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण बहु-उद्देश्यीय जल विद्युत परियोजनाओं का प्राथमिकता के आधार निर्माण कार्य आरंभ किया गया। पं. नेहरू के इसी सुनहरे सपने को मूर्त रूप देने के लिए बिलासपुर जिला के भाखड़ा में सतलुज नदी पर विश्व के सबसे ऊंचे बांध का निर्माण किया गया। इसके फलस्वरूप भाखड़ा से लेकर बरमाणा (सलापड़ पुल) तक 1700 फुट जलस्तर वाला लगभग 70 किलोमीटर लंबा जलाशय अस्तित्व में आया। यह विश्वस्तरीय मानव निर्मित जलाशयों में एक है। बिलासपुर के करीब 250 गांवों और ऐतिहासिक बिलासपुर नगर को अपनी प्रकृति प्रदत्त सुख-सुविधाओं तथा अमूल्य धरोहरों समेत जल समाधि दे दी गई। विस्थापितों के बारे बनाई गई तथाकथित नीतियां पूर्णतया त्रुटिपूर्ण और विसंगतियों से भरी होने के कारण विस्थापितों के हितों की रक्षा करने में पूर्णतया असफल साबित हुए हैं। बिलासपुर नगर के लोगों की अधिगृहीत की गई संपत्ति की पैमाइश और मूल्य निर्धारण राजस्व विभाग द्वारा मुगलकालीन नियमों कार्य प्रणाली के अनुसार किया गया। इसी आधार पर अवार्ड तय किए गए। संयुक्त परिवार प्रणाली के अधिकतर घर के मुखिया का केवल एक ही अवार्ड बना। अधिगृहीत संपत्ति की वन टाइम पेमेंट की गई। यह उसकी उपयोगिता के समय के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए थी। कुछ मकान दुकान के किराएदारों को विस्थापित मानकर प्लाट के हकदार तथा गुडविल राशि दी गई। विस्थापितों को प्रकृति प्रदत्त अनेकों सुविधाओं तथा प्राचीन धरोहरों को हमेशा के खो देने के एवज न तो वित्तीय सहायता दी और न ही उन्हें पुनर्स्थापित किया गया। ‘पुनर्वास’ के नाम पर विस्थापितों के साथ धोखा किया गया। नगर विस्थापितों से यह कहा गया कि उनके बसाव के लिए छह सेक्टरों वाला एक नया नियोजित शहर निर्माण किया जाएगा। इसमें जनता सेक्टर-1, 2 और 3, सेक्टर-6 मेन मार्किट तथा सेक्टर-4 गवर्नमेंट सेक्टर। विस्थापितों को मकान बदले मकान, दुकान के बदले दुकान का प्लाट तथा जमीन के बदले जमीन की घोषणा की गई। यह घोषणा विस्थापितों के हितों के सर्वथा विपरीत थी। एक से ज्यादा मकानों-दुकानों के मालिकों को केवल ही प्लाट का प्रावधान। दूसरे मकान-दुकान चाहे जितनी ज्यादा भूमि पर थे, इनके लिए क्रमशः 1800 व फुट और 450 वर्ग फुट के प्लाट उपलब्ध करवाए जाने की व्यवस्था भी अन्यायपूर्ण थी। जमीन के बदले जमीन देने की घोषणा भी झूठ साबित हुई। नगर के कई विस्थापितों के पास 10 से 40 बीघा तक कृषि सिंचित भूमि तथा बाग-बागीचे थे। जिन्हें इस घोषणा के तहत भूमि मिली है, उनकी संख्या न के बराबर है। आज हालात ये है कि मूल विस्थापितों की पहचान ही खत्म कर दी गई है। जलमग्न बिलासपुर के विस्थापितों के बसाव के लिए वर्तमान ‘न्यू बिलासपुर टाउनशिप’ का निर्माण एक मास्टर प्लान तथा बाई लॉज के मुताबिक एचपी पीडब्ल्यूडी के नए एनबीटी डिवीजन की देखरेख में पासशुदा नक्शों के मुताबिक हुआ। नए नगर में तमाम नागरिक सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई थीं। हर घर तक मोटरेबल पक्की सड़क, स्ट्रीट लाइट, ड्रेनेज सिस्टम, सीवरेज और वाटर-सप्लाई लाइन, पब्लिक टैक्स, सार्वजनिक शौचालय।’ सभी निजी और सरकारी भवन दोमंजिला ही बनाए गए। नेताओं और नौकरशाहों की जुगलबंदी के कारण आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि उपरोक्त सारी नागरिक सुविधाएं प्रायः लुप्त हो गई हैं। नियोजित शहर में एक अनियोजित अवैध शहर बनने का सिलसिला आज की तारीख तक जारी है। गैर विस्थापितों को विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत नगर में भूमि आबंटित की जा रही है। मूल विस्थापितों की दूसरी पीढ़ी को विस्थापित नहीं माना जा रहा है। जब अवैध कब्जाधारी गैर विस्थापितों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी को सरकार नगर क्षेत्र में बसा रही है।  1980 के दशक में राजस्व विभाग द्वारा शहर का बंदोबस्त किए जाने के तो विस्थापितों की समस्याओं को और ज्यादा उलझा दिया गया। इस मायने में जंगल (कंकरीट का) और जंगलराज का साक्षात यदि किसी को करना है, तो बिलासपुर में उनका स्वागत है।

-एसआर आजाद

10, डियारा सेक्टर, न्यू बिलासपुर-174001

July 3rd, 2017

 
 

एक शहर पुराना सा

मंदिरों, शिवालयों, कुओं, स्नानागारों और बाग- बागीचों वाला बड़ा अद्भुत था वह एक शहर पुराना सा। पंछी थे कलरव करते बूढ़े पेड़ों पर, बांसों के बीहड़ों पर बच्चे थे खेला करते गोहर, पोखर, गलियां-गलियां बड़ा अद्भुत था, वह एक शहर पुराना सा। खाखी शाह था […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

लाभांश में मिले हिस्सा

जनहित तथा विकास के लिए सरकार सड़कें, फोरलेन फ्लाईओवर तथा हाइड्रो प्रोजेक्ट बनाती-लगाती है। इसके लिए सरकार लोगों की मिलकीयत भूमि, घर, दुकानें क्षतिपूर्ति की रकम या मुआवजा देकर हासिल कर लेती है। इसका परिणाम यह होता है कि सैकड़ों की संख्या में परिवारों के […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

नदी में अठखेलियां

ब्यास नदी में उतरा मन ऊपर आकाश में डोलता पैराग्लाइडर। पहाड़ की चोटियां झाड़ती बर्फ जिस ओर देखें सब बुलाती अपनी तरफ। स्वच्छ धारा और मचलती लहरें उछल-उछल कर कहती हम से हैं बहारें। बाहें पसार स्वागतरत डोलता, तैरता राफ्ट अभिमंत्रित करती अठखेलियां धार में […] विस्तृत....

June 19th, 2017

 

एक बेहतर दुनिया बनाएं

आओ पेड़ों के साथ कुछ सुख-दुख सांझे करें हवाओं से एक रिश्ता बनाएं बादलों से प्यार करें बारिश में भीगें धूप से शिकायत करें पर्वतों से गूढ़ बातें करें नदियों से दोस्ती गांठें जंगलों से भाईचारा निभाएं पंछियों के साथ-साथ चहकें, उड़ें फूलों सा खिलें, […] विस्तृत....

June 19th, 2017

 

लोक संपृक्ति के कथाकार अरुण भारती का जाना

‘भेडि़ए’ शीर्षक से ही वर्ष 1990 में अरुण भारती का पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ। उस संग्रह की कहानियों-कब्र, टावर, स्वांग और शून्य से शून्य तक के अख्तर, नत्थू, चैतिया और ज्ञानी जैसे पात्र आज भी याद आते हैं। अरुण भारती का दूसरा कहानी संग्रह […] विस्तृत....

June 19th, 2017

 

जीवंत परंपराओं का प्रतीक ‘शांत महायज्ञ’

‘शांत महायज्ञ’ तीन दिनों तक मनाया जाने वाला महायज्ञ है। पहले दिन मेजबान देवता द्वारा आमंत्रित देवता अपने-अपने क्षेत्रों से पालकी में अपने-अपने खूंदो एवं ग्रामवासियों के साथ अस्त्र-शस्त्रों (तलवारें, दराट, लाठियां, भाले, खुरपी एवं बंदूकों) से सुसज्जित होकर मेजबान देवता के गांव पहुंचते हैं […] विस्तृत....

June 19th, 2017

 

ओंकारनाथ ठाकुर

ओंकारनाथ ठाकुर  भारत के प्रसिद्ध संगीतज्ञ एवं हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक थे। ओंकारनाथ के दादा महाशंकर जी और पिता गौरीशंकर जी नाना साहब पेशवा की सेना के वीर योद्धा थे। एक बार उनके पिता का संपर्क अलोनीबाबा के नाम से विख्यात एक योगी से हुआ। इन […] विस्तृत....

June 19th, 2017

 

अरुण भारती जी का यूं चले जाना

प्रदेश के प्रतिष्ठित कहानीकार और साहित्यकार अरुण भारती जी का यूं अचानक चले जाना साहित्य जगत के लिए अपूर्णीय क्षति है। मुझे वह दिन याद आता है जब पुस्तक मेले के दौरान साहित्यक कार्यक्रमों के अंतर्गत, साहित्य अकादमी और भाषा संस्कृति विभाग के द्वारा कहानीकार […] विस्तृत....

June 19th, 2017

 

इतिहास के झरोखे में नर्मदा

सन् 1857 की क्रांति के बाद नर्मदा की धारा मानो स्वाधीनता की चेतना को सिंचित और पल्लवित करने वाली प्रेरणा रेखा बन गई। नर्मदा किनारे के आश्रम ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों के शरणस्थल ही नहीं बनें, बल्कि योजनाओं और उन्हें क्रियान्वित करने की रूप रेखा तैयार करने […] विस्तृत....

June 12th, 2017

 
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