Divya Himachal Logo Mar 27th, 2017

प्रतिबिम्ब


हिमाचली साहित्य हिंदी जगत का ध्यान आकर्षित कर रहा है

साहित्य पाठक के लिए ही लिखा जाता रहा है और हिमाचल में लिखा जा रहा गंभीर साहित्य भी निश्चित तौर पर पाठकों के लिए ही लिखा जा रहा है, किसी संस्था के लिए नहीं। मुझे ऐसा कतई नहीं लगता कि ऐसा नहीं हो रहा है। इधर कविता में भी और कहानी में भी बराबर ऐसा लेखन हो रहा है, जो पूरे हिंदी जगत का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इसकी वजह भी यही है कि वह अपने परिवेश से जुड़ कर अपने समय के तमाम बड़े प्रश्नों और चिंताओं से मुठभेड़ कर रहा है। पूरा हिंदी जगत इन रचनाओं की मार्फत हिमाचल को देख रहा है। कविता कहानी पर आ रहे अनेक आलेख इसका प्रमाण हैं। साहित्य अध्यापन के क्षेत्र में सेंसिबिलिटी का प्रायःअभाव खलता है। साहित्य का अध्यापन-अध्ययन निश्चित तौर पर अन्य विषयों की अपेक्षा अधिक संवेदनशीलता की मांग करता है । जेएनयू, बनारस या इलाहाबाद विश्वविद्यालयों की तरह हमारे विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सृजनात्मक गतिविधियों का प्रायः अभाव रहा है। इस तरह की योजनाओं की जरूर अपेक्षाएं हैं ताकि विद्यार्थियों में पढ़ने- लिखने के संस्कार विकसित हो पाएं । हिमाचल भाषा अकादमी और सरकारी संस्थाओं को दशकों पहले एमके काव के समय को याद करना चाहिए। वैसी बड़ी भूमिका फिर कोई क्यों नहीं निभा पाया। यहां जेनुइन लेखन को अपने एजेंडे के केंद्र में रखना पड़ेगा। उसकी समझ और शिनाख्त अकादमी के पास होनी चाहिए। इससे जेनुइन लेखन को ही नहीं इन संस्थाओं और  माहौल को भी लाभ होगा । बेहतर रचना तो पूरे हिंदी जगत में भी अपना स्पेस बना ही लेगी । जेनुइन रचना या रचनाशीलता की उपेक्षा से ये संस्थाएं अपनी ही भूमिका का इतिहास लिखती हैं कि अपने समय की महत्त्वपूर्ण रचना या रचनाशीलता के प्रति इनका कैसा रवैया रहा। यह बात आज के ही नहीं व्यापक संदर्भ में है। गरज यह कि इन संस्थाओं से बड़ी और अधिक संवेदनशील भूमिका की अपेक्षा है ।

-आत्मा रंजन हिमाचल के चर्चित कवि हैं।

इनके पहले ही काव्य संग्रह ‘पगडंडियां ’ को

राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है, वह कविता

का नया मुहावरा गढ़ रहे हैं।

February 27th, 2017

 
 

विद्यानिवास मिश्र

विद्यानिवास मिश्र हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार, सफल संपादक, संस्कृत के प्रकांड विद्वान और जाने-माने भाषाविद थे। हिंदी साहित्य को अपने ललित निबंधों और लोक जीवन की सुगंध से सुवासित करने वाले विद्यानिवास मिश्र ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने आधुनिक विचारों को पारंपरिक सोच में खपाया था। […] विस्तृत....

February 20th, 2017

 

घने नीम तरु तले

ललित निबंधों में प्रकृति सर्वाधिक जीवंत रूप में उपस्थित होती है। इनमें प्रकृति के अंग-उपांग इतनी सजीवता के साथ स्थान पाते हैं कि लगता है वे हमारे अस्तित्व का अहम हिस्सा हैं। सच यह भी है कि पहाड़ी क्षेत्र में प्रकृति अपने शीर्षस्थ रूप में […] विस्तृत....

February 20th, 2017

 

लोक गाथाओं में देवाख्यान

सतलुज घाटी देवभूमि है। यहां क्षेत्र अधिष्ठात्री भीमाकाली, अंबिका देवी, परशुराम, कोटेश्वर महादेव, मानणेश्वर महादेव, पंदोई देव, देव कुरगण, ममलेश्वर महादेव, शमशरी महादेव, माहूंनाग और चिखड़ेश्वर महादेव जैसे देवी-देव मंदिर पुरातन काल से संस्कृति व परंपराओं के संरक्षक रहे हैं। देवाख्यान वस्तुतः गोपनीय होता है। […] विस्तृत....

February 20th, 2017

 

कविताएं

बीता साल गुजारा हमने बीता साल गुजारा हमने पत्नी को मनाने में चप्पल-जूते घिस गए हमारे ससुराल आने-जाने में। बीता साल गुजारा हमने स्कूल से फरलो लगाने में रजिस्टर में ऑन ड्यूटी भरकर पहुंच जाते मयखाने में छात्रों को साल भर कुछ न पढ़ाया हमको […] विस्तृत....

February 20th, 2017

 

मेलों में बना रहे ‘लोक’

मेले हमारी संस्कृति का एक दर्पण हैं, प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक हैं। यहां तो साल भर लगभग हर रोज ही कहीं न कहीं ढोल- नगाड़ों के स्वर गूंजते रहते हैं, पूरा साल मेलों का दौर चलता है और इससे ही हमारी समृद्ध […] विस्तृत....

February 20th, 2017

 

सभ्यता का संदेश देते खंडहर

शिक्षा के मामले में भारत के पास एक स्वर्णिम थाती है और नालंदा विश्वविद्यालय उस थाती का उत्कृष्ट प्रतीक। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना करीब 2500 साल पहले बौद्ध धर्मावलंबियों ने की थी। यह विश्वविद्यालय न केवल कला, बल्कि शिक्षा के तमाम पहलुओं का अभिनव केंद्र […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

लोक गाथाओं में सतलुज का राग

लोक गाथा में भगवान वामन दो पग में पूरी पृथ्वी लांघ जाते हैं। परिणामतः आधा पद बलि अपने सिर पर धारण करता है। पृथ्वी के राज्य को खोने के बाद बलि भगवान से प्रार्थना करता है कि उसे धरती पर बारह संक्रांतियों और बारह अमावस […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

लोकार्पण

प्रतिष्ठित साहित्यकार नरेंद्र कोहली को हाल ही में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। व्यवस्थागत उपेक्षाओं के बावजूद साहित्य जगत उनकी सशक्त उपस्थिति महसूस करता रहा है। हिंदी साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यास विधा को प्रारंभ करने का श्रेय नरेंद्र कोहली को ही दिया जाता है। […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

जे. कृष्णमूर्ति

जे.कृष्णमूर्ति का जन्म तमिलनाडु के एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में 12 मई, 1895 को हुआ था। अपने माता पिता की आठवीं संतान के रूप में उनका जन्म हुआ था, इसीलिए उनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया। कृष्ण भी वासुदेव की आठवीं संतान थे। वह एक विश्व […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 
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