Divya Himachal Logo Mar 27th, 2017

प्रतिबिम्ब


सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है

तेरी लट से ही तो रात चुराई है।

सूरत तेरे मुखड़े का अनुयायी है।

मौसम तेरे सांसों से बनते हैं।

दिन और रात तेरे नयनों से चलते हैं।

फूल खिले हैं पत्तों की शहनाई है।

सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है।

जब तू शबनम ऊपर रुक-रुक

चलती है।

धूप सुनहरी जैसे-जैसे ढलती है।

शांत समंदर में जितनी गहराई है।

सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है।

मीठी वाणी तेरे लब की उल्फत है।

चांद सितारों की जग में शोहरत है।

कृतज्ञता में अंबर की ऊंचाई है।

सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है।

झील किनारे किरणों वाला मेला है।

खेवनहार किश्ती साथ अकेला है।

हुसन तेरे की ऐसी रहनुमाई है।

सूरज तेरे मुखड़े का अनुयाई है।

लेकर भव्य अलौकिक शृंगार खुदाने,

उसमें डाला अंतरंग मनुहार खुदा ने।

तेरी चाहत से ही प्रीत बनाई है।

सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है।

चौरासी लाख जून में ऐसा होता है।

कोई हंसता है, तो कोई रोता है।

बालम तेरी उल्फत का शौदाई है।

सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है।

— बलविंदर बालम गुरदासपुर

ओंकार नगर, गुरदासपुर

February 13th, 2017

 
 

आहट

रात जाने को है सुबह आने को है। जिंदगी कोई आहट सुनाने को है।। देखी दरियादिली तेरे दीदार की। दिल पे छुरियां हजारों चलाने को है।। मरघटों के हैं सन्नाटे मेरे लिए। बैंड-बाजा-बाराती सताने को हैं।। दिल जला मुझको कहते हैं,कहते रहें। कोई मेरे कहां […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

अठारह-बीस की उम्र

अठारह-बीस की उम्र किसी को मारने की नहीं खुद किसी पर मरने की उम्र होती है इस उम्र में तो होते हैं हर तरफ मेले ही मेले सजी होती है बहारें दूर तक नजर आती है जिंदगी की खूबसूरती दिन-दोपहर को भी सपने दिखाई देते […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

चौथे स्तंभ का राजनीतिक पक्ष

भारतीय राजनीति में डकैत, लठैत, सामंत, आलाकमान जैसे शब्दों का राजनीतिक विमर्श में बाहुल्य बेहद चिंताजनक है। चाहे हम एटम बम का निर्माण कर लें या राकेट छोडें, लेकिन राजनीतिक-सामाजिक रूप से अभी भी आधुनिकता की मंजिल से काफी दूर खड़े नजर आते हैं। हमारा […] विस्तृत....

February 6th, 2017

 

वसंत में वह

वसंत में वह हरियाली सा बिछ जाता है चहुं ओर महक सा बिखर जाता है दूर-दूर तक फूलों सा हंसता, मुस्कराता है जी भर कर मोहक धूप सा खिलता है हर बस्ती, हर गांव हवाओं सा बहता है धीरे-धीरे सबको अपना बनाता हुआ भंवरों जैसा […] विस्तृत....

February 6th, 2017

 

धुंधलके के बीच उत्सवी वसंत

देश और समाज की उत्सवप्रियता उसकी रचनात्मकता को विकसित करती है, उससे सकारात्मक नजरियों में इजाफा होता है। भारत की यही विशेषता सदियों से रही है… इस देश के उत्सव खतरे में क्यों हैं, जीवन से उत्सव क्यों गायब हो रहे हैं, जो उत्सव हमारी […] विस्तृत....

February 6th, 2017

 

जिंदगी

जिंदगी से हर बात शुरू होती है जिंदगी पर ही हर बात खत्म हो जाती है। क्यों न करें हम बात जिंदगी की जिंदगी ही जिंदगी की हमराज हो जाती है। मिलता है तोहफा नसीब से जिंदगी का हर इन्सां के लिए जिंदगी सौगात हो […] विस्तृत....

February 6th, 2017

 

लोक गाथाओं में सतलुज का राग

लोक गाथा में भगवान वामन दो पग में पूरी पृथ्वी लांघ जाते हैं। परिणामतः आधा पद बलि अपने सिर पर धारण करता है। पृथ्वी के राज्य को खोने के बाद बलि भगवान से प्रार्थना करता है कि उसे धरती पर बारह संक्रांतियों और बारह अमावस […] विस्तृत....

February 6th, 2017

 

मन्मथनाथ गुप्त

मन्मथनाथ गुप्त भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी तथा सिद्धहस्त लेखक थे। इन्होंने हिंदी, अंग्रेजी तथा बांग्ला में आत्मकथात्मक, ऐतिहासिक एवं गल्प साहित्य की रचना की है। यह मात्र 13 वर्ष की आयु में ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए और जेल गए। बाद […] विस्तृत....

February 6th, 2017

 

विनोद-परिहास के आदिम प्रसंग

‘कुमारसंभव’ में कालिदास ने अपने आराध्य शिव को ही हास्य का आलंबन बनाया है। ब्रह्मचारी बटु शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या करने वाली पार्वती का मजाक उड़ाते हुए कहता है-हे पार्वती! जरा सोचो तो कि गजराज पर बैठने योग्य तुम जब […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 
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