Divya Himachal Logo Aug 20th, 2017

प्रतिबिम्ब


गेयटी थियेटर में खिले इंद्रधनुषी रंग

पिछले दिनों  गेयटी थियेटर माल रोड शिमला में पुस्तक मेला लगा। साथ ही साथ विभिन्न विभागों के सहयोग से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसका यहां के स्थानीय लोगों के साथ स्कूलों के बच्चों, बाहर से आए पर्यटकों ने भी भरपूर आनंद उठाया और फायदा लिया। अकादमी और विभाग की तरफ से करवाए गए साहित्यिक कार्यक्रमों से समकालीन हिंदी साहित्य के विविध आयामों का पता चला। देश प्रदेश और बाहरी देशों में साहित्य के विविध रंगों का रंगीन समावेश लिए हमारे साहित्यकार, बुद्धिजीवी, वरिष्ठ कविगण, कहानीकार, आलोचक, समालोचक, लेखकों ने संस्कृति लोक संस्कृति के इंद्रधनुषी रंग बिखेरे। कितना अच्छा साहित्य का मौसम शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में खिला रहा। पुस्तक मेले में हमने देखा बढ़-चढ़कर जनता ने हिस्सा लिया, जो भी पुस्तक मेला देखने गया, वह खाली हाथ नहीं लौटा। हमारा युवा वर्ग हो, बाल वर्ग हो या प्रौढ़ वर्ग सभी ने अपनी-अपनी पसंद और योग्यता के हिसाब से पुस्तकें खरीदीं। बच्चों का उत्साह देखते बनता था। इस मेले में बच्चों की रुचि की सब तरह की सामग्री थी, जिसे बच्चों ने खूब पसंद किया। बच्चों को खुश देखकर उनके माता-पिता भी खुश थे। आजकल इंटरनेट का युग है। बच्चे अपने मोबाइल, कम्प्यूटर और इंटरनेट में चिपके रहते हैं। लाख कहने पर भी सुनते नहीं, ऐसे माहौल में ऐसे पुस्तक मेले बच्चों के अंदर स्फूर्ति, जागरूकता, रुचि, पसंद और दिलचस्पी पैदा करते हैं। बच्चों का इस तरह पुस्तकों को देखकर उत्साहित और खुश देखकर मेरे मन को भी सुखद अनुभव हुआ। किताबों  को छूकर उन्हें उलट-पलट कर देखते रहना अच्छा लग रहा था, और भीतर मन आशावान भी हो रहा था कि बच्चों को किताबों के प्रति रुचि है और यही रुचि उन्हें आगे चलकर साहित्य से जोड़ेगी।

हमारे देश-प्रदेश में मेले, त्योहार मनाने का उद्देश्य   संस्कृति-लोक संस्कृति की परंपरा को जीवंत बनाए रखना है। हम बाजारवाद से हटकर जब मेले देखने जाते हैं तो लोक संस्कृति देखने को मिलती है। कहना अतिशयोक्ति न होगी कि मेलों में हमें लोक संस्कृति का असली रंग देखने को मिलता है, जिसमें बाहरी आवरण नहीं होता। हाथों से बनी चीजें, जिसे हस्तशिल्प भी कहा जाता है लोगों द्वारा बहुत पसंद की जाती हैं। ये हस्तशिल्प उत्पाद बहुत किफायती और उपयोगी होते हैं। मेलों का रंग इंद्रधनुषी रंगों की तरह होता है, जो बहुत दुर्लभ होता है। हम जैसे-जैसे आधुनिकता की तरफ बढ़ते जा रहे हैं ये इंद्रधनुषी रंग मिटते जा रहे हैं। आने वाले समय में लगता है दुर्लभ शब्द का उपयोग बढ़ता जाएगा, क्योंकि  बहुत सारी चीजें खोने के कगार पर खड़ी हैं। ऐसी स्थिति में बड़ी मुश्किल से ढूंढने से भी कभी-कभार तलाश पूरी नहीं होती। चाहे आप अपनी कुदरत को ही देख लीजिए। कुदरत के सुंदर पक्षी, कहां देखने को मिलते हैं, पशु, चीता, बाघ भी गिनती तक ही हैं। नदियां सूख गई-झरने मंद पड़ गए, रास्ते-पंगडंडियां, यादगारें सब मिट गईं। खो गई सारी सुंदर वादियां कंकरीट के जंगलों में। आधुनिकता का रंग ऐसे चढ़ा कि सुंदर इंद्रधुनषी रंग ही फीके हो गए, आसमान धुंधला हो गया, तारे खो गए, धरती धंस रहीं, प्रदूषित हवाओं, फिजाओं में दम घुटने लगा है। ऐसे में साहित्य-संस्कृति के रंग मेले, त्योहारों में जब देखने को मिलते हैं तो सकून मिलता है। हमारी विरासतें खो गई हैं, इन्हें बचाने की हमारी अकादमियां और विभाग प्रयासरत हैं।  गेयटी थियेटर में पुस्तक मेले के दौरान कई सांस्कृतिक व साहित्यक कार्यक्रम करवाने का यही उद्देश्य है कि हमारी संस्कृति, हमारा लोक साहित्य बचा रहे। बच्चों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, उनके अंतर्मन में साहित्य के पुष्प खिल जाएं। उन्हें विभिन्न गतिविधियों में आमंत्रित कर उन्हें शामिल किया जा रहा है। आशा है इस जमीन पर साहित्य के अंकुरित बीज सुंदर फूल बनकर खिलेंगे।

वंदना राणा, सैट 3, टाइप 3, कैंडललोज, लौगवुड-171001

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June 12th, 2017

 
 

खुदा मैंने तुझे दिलों में उतरते देखा है

फूलों में हो तुम डालों में तुम। अंधेरों में तुम उजालों में तुम।। भंवरों को मैंने फूलों से लिपटते देखा है। खुदा मैंने तुझे दिलों में उतरते देखा है।। प्रकृति के कण- कण में तू है समाया। अपनी महक से तूने ये संसार है महकाया।। […] विस्तृत....

June 12th, 2017

 

जीवंत परंपराओं का प्रतीक ‘शांत महायज्ञ’

महिषासुर का वध करने के बाद महाशक्ति का रूप इतना विकराल हो गया कि उनके उस रूप के आगे मानव तो क्या देवगण भी ठहर नहीं पा रहे थे। मां की रक्त पिपासा इतनी अधिक बढ़ गई थी कि उन्होंने सृष्टि का नाश करना आरंभ […] विस्तृत....

June 12th, 2017

 

सुंदरता किसने उजाड़ी?

हैं कितने मूर्ख लोग अपने कश्मीर को उजाड़ रहे हैं, कुछ सिक्कों के लालच में अपनी तकदीर को फाड़ रहे हैं। लगता है सभी अंधे हो गए हैं पराये धन से स्कूल जला रहे हैं, ताकि यहां का कोई बच्चा पढ़ न सके स्वर्ग को […] विस्तृत....

June 12th, 2017

 

चित्तरंजन दास

चित्तरंजन दास एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में युगांतकारी था। चितरंजन दास को प्यार से देशबंधु(देश के मित्र) कहा जाता था। वह महान राष्ट्रवादी तथा प्रसिद्ध विधि-शास्त्री थे। चित्तरंजन दास अलीपुर षड्यंत्र कांड (1908 ई.) के अभियुक्त अरविंद घोष के […] विस्तृत....

June 12th, 2017

 

परदे पर भाषायी द्वंद्व

‘हिंदी मीडियम’ ने यह साबित कर दिया है कि हिंदी मात्र भाषा नही है। यह एक जीवन-पद्धति है। इसमें एक-दूसरे के प्रति  सुख-दुख बांटने और सहानुभूति दिखाने की ही बात नहीं है, अपितु   एक-दूसरे के लिए जान तक दांव पर लगाने की प्रबलतम भावना विद्यमान […] विस्तृत....

June 5th, 2017

 

नए मीडियम में हिंदी का प्रवेश

‘हिंदी मीडियम’ ने भाषा से जुड़ी मानसिकता को बखूबी चित्रित किया है और इस दृष्टि से लेखक की सृजन क्षमता अपने जमीर पर टिकी है। भाषा अपने भीतर के भाव में किसे, कहां तक समेट सकती है, इसका जिक्र कोई फिल्म कितना करेगी, लेकिन जिस […] विस्तृत....

June 5th, 2017

 

अंग्रेजी की पढ़ाई : बच्चों की तबाही

जाब के सरकारी स्कूलों में सबसे ज्यादा बच्चे अंग्रेजी में फेल होते हैं। हर विषय में 60-65 प्रतिशत नंबर लानेवाले बच्चे अंग्रेजी में 15-20 नंबर भी नहीं ला पाते। अंग्रेजी का रट्टा लगाने में अन्य विषयों की पढ़ाई भी ठीक से नहीं हो पाती। अंग्रेजी […] विस्तृत....

June 5th, 2017

 

बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे। वह 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए। ये मुंडा जाति से संबंधित थे। बिरसा मुंडा का जन्म 1875 ई. में झारखंड राज्य के रांची में हुआ था। उन्होंने […] विस्तृत....

June 5th, 2017

 

अहिल्याबाई होल्कर

अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, सन् 1725 में हुआ था। अहिल्याबाई के पिता मानकोजी शिंदे एक मामूली किंतु संस्कारवान आदमी थे। इन्होंने घाट बनवाए,कुओं और बावडि़यों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, भूखों के लिए सदाव्रत (अन्नक्षेत्र ) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ लगाया, मंदिरों में […] विस्तृत....

May 29th, 2017

 
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