Divya Himachal Logo Apr 25th, 2017

प्रतिबिम्ब


सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के व्यक्तित्व में साहित्य और पत्रकारिता का मणिकांचन संयोग देखने को मिलता है। अज्ञेय को प्रतिभा सम्पन्न कवि, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबंधकार, संपादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म 7 मार्च, 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ। अंग्रेजी में एमए करते समय क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़कर बम बनाते हुए पकड़े गए और वहां से फरार भी हो गए। बहुआयामी व्यक्तित्व के अंतर्मुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वह एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे…

March 13th, 2017

 
 

दर्पण बनाम वाहक साहित्य और मीडिया

अजय पराशर अतिथि संपादक शब्द को ब्रह्म मानने वाली भारतीय परंपरा अभिव्यक्ति के माध्यमों को लेकर भी बहुत सजग रही है। इस परंपरा में शब्दों का अपव्यय एक अक्षम्य अपराध था और असामयिक उपयोग एक हिंसा। इतनी सजग विरासत का वारिस होने के बावजूद आधुनिक […] विस्तृत....

March 13th, 2017

 

अनुपम मिश्र

अनुपम मिश्र को पर्यावरणविद के रूप में ही प्रसिद्धि मिली, लेकिन ‘आज भी खरे हैं तालाब’, ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ और ‘साफ माथे का समाज’ जैसी पुस्तकें उन्हें उत्कृष्ट साहित्यकार और चिंतक के रूप में भी स्थापित करती हैं। वह लोक जीवन और लोक ज्ञान […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

संघर्षों से उपजता है देर तक जिंदा रहने वाला साहित्य

सुरेश सेन निशांत हमेशा जन के लिए लिखा जाता है और ऐसा साहित्य संघर्षों से उपजता है। इसलिए ऐसे साहित्य को किसी प्रोमोशन की जरूरत नहीं। भला कबीर का साहित्य किसी अकादमी विभाग या संस्था के कारण जिंदा रहा …? कदापि नहीं। वह जिंदा रहा […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

जरूरी है साहित्य-संस्कृति और समाज के अंतर्संबंधों की पड़ताल

मुरारी शर्मा अतिथि संपादक सही नब्ज पकड़ना, भले ही वह व्यक्ति की हो अथवा समाज की, भारत में विशेषज्ञता का एक पैमाना रहा है। एक वैद्य सही नब्ज पकड़ ले तो रोगी का स्वस्थ होना तय है। ठीक इसी तरह समाज की सही नब्ज पकड़ते […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

समकालीन साहित्य से वास्ता रखने वाले शिक्षक साहित्य में कम ही हैं

निरंजन देव साहित्य के अध्ययन-अध्यापन तथा साहित्य से पाठक की दूरी जैसे सवाल तब और भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, जब हम उन्हें साहित्य शिक्षण की शीर्ष संस्था हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से जोड़ कर देखते हैं । पाठ्यक्रम में हिंदी साहित्य से हमारा पहला परिचय […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

सृजन और शोध के नाम पर पिछड़ रहे हैं विश्वविद्यालय

डा. विजय विशाल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थान साहित्य सृजन या साहित्यिक माहौल बनाने में क्या भूमिका निभा रहे हैं? सीधे-सीधे इस प्रश्न का उत्तर न देकर मैं इस बारे में अपनी टिप्पणी कुछ उक्तियों से शुरू कर रहा हूं- ‘कबीरदास ने काशी विश्वविद्यालय […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

छपे हुए शब्द की सत्ता सदैव रहेगी…

दीनू कश्यप साहित्य कभी भी राज्यों के नाम पर नहीं होता है। साहित्य तो सीधे -सीधे भाषाओं, बोलियों और उप-बोलियों की धाराओं से जन्म लेता है। भाषा भी सामूहिक समाजों के भीतर से सृजित होती है। अगर माना जाए तो साहित्यकार एक आईना बनाने वाला […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

सोहन लाल द्विवेदी

सोहन लाल द्विवेदी हिंदी के प्रसिद्ध कवि हैं। सोहन लाल द्विवेदी हिंदी के राष्ट्रीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। सोहनलाल द्विवेदी स्वतंत्रता आंदोलन युग के विराट कवि थे। जनता में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने, उनमें देशभक्ति की भावना भरने और नवयुवकों को देश के […] विस्तृत....

February 27th, 2017

 

जटिल सवालों से ही निकलेगा उम्मीदों का कारवां…

अनुभूति ही साहित्य को सिरजती है और यह नितांत व्यक्तिगत होती है। जिसने महसूस किया है, उसकी जुबां से, उसकी कलम से,  अनुभव को सुनने-पढ़ने की संतुष्टि ही अलग होती है। साहित्यकार यदि साहित्य के प्रश्न उठाएं, समाधान सुझाएं, तो वे अधिक वास्तविक बन पड़ते […] विस्तृत....

February 27th, 2017

 
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