Divya Himachal Logo May 24th, 2017

प्रतिबिम्ब


अकादमी पर ‘अपनों’ की कुंडली

हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी के तीन विषय हैं-कला संस्कृति और भाषा। नियमानुसार बजट को तीन भागों में बांट कर कला, संस्कृति और भाषा पर व्यय किया जाना चाहिए। खेद की बात है कि कला पर बहुत कम बजट व्यय किया जाता है। पुरस्कारों में भी कला के नाम पर किसी बाहरी कला शिक्षक को पुरस्कृत किया जाता है। डाक्टर विश्वचंद्र हरि और किशोरी लाल वैद्य जैसे कला शिक्षकों को नकार दिया जाता है। अकादमी में सारी अनियमितताएं इसलिए हो रही हैं, क्योंकि सरकार द्वारा नामित उपाध्यक्ष, अकादमी की कार्यकारिणी और सामान्य परिषद के सदस्यों के रूप में कुछ खास लोगों का चुनाव करता है। संभवतः इसी करण, कार्यक्रमों से लेकर पुरस्कार और पुस्तक खरीद तक में मनमानी चल रही है। वर्ष 2012 तक अकादमी का बजट मात्र 75 लाख रुपए के आसपास था। 2012 के बजट में इसे बढ़ाकर 1 करोड़ 35 लाख किया गया। उसके बाद अकादमी के स्टाफ के कई अधिकारी और कर्मचारी सेवानिवृत्त हो गए। अब

बजट का मनमाना दुरुपयोग होता दिखता है। 2012 में मैं भी अकादमी कार्यकारिणी का सदस्य था, उस वक्त अनेक योजनाओं के लिए नियम निर्धारित किए गए थे।  इनमें से कई नियमों को नई व्यवस्था होने पर बदल दिया गया। अकादमी की पुरस्कार और पुस्तक खरीद योजना में पिछले 3 सालों की किताबें लेने का प्रावधान था, जिसे अब बदल कर दो साल कर दिया गया। केंद्रीय ललित कला अकादमी में प्रत्येक राज्य से ललित कला के नामी-गिरामी लोगों को नामित करके राज्य के प्रतिनिधित्व के लिए भेजा जाता है। इस बार सरकार ने अकादमी के उपाध्यक्ष को ललित कला अकादमी के सदस्य के रूप में नामित किया है, जबकि प्रदेश में कई प्रख्यात चित्रकार और मूर्तिकार और कला समीक्षक मौजूद हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश का उचित प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।

धर्मशाला स्थित कांगड़ा कला संग्रहालय में कांगड़ा की चित्रकला को प्रदर्शित करने के लिए राज्य संग्रहालय शिमला से वर्ष 1990 में कुछ चित्र उधार लेकर प्रदर्शित किए गए। यह संग्रहालय कांगड़ा शैली के चित्रों का संग्रह नहीं बना पाया। ऐसी दशा में मैंने तत्कालीन अधिकारियों को एक योजना बताई थी कि किस प्रकार समकालीन चित्रकारों से उच्च कोटि के चित्र बनवाकर कांगड़ा की कला को जीवंत किया जा सकता है। मेरे इस सुझाव पर तत्कालीन निदेशक श्री राकेश कंवर ने इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए मुझे ओएसडी नियुक्त किया था। इस दौरान मैने अपने शिष्यों के साथ मिलकर करीब 37 चित्रों का निर्माण करके उन्हें एक गैलरी में लगाया था। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है की श्री कंवर के स्थानांतरण के बाद सब कुछ खटाई मे पड़ गया। जिन कलाकारों ने कांगड़ा शैली के स्तरीय चित्रों का निर्माण किया, उन्हें अभी तक पारिश्रमिक नहीं मिल सका है।

– विजय शर्मा, चंबा और कांगड़ा कलम के ख्यातिलब्ध कलाकार हैं।  टांकरी भाषा के विद्वान के रूप में आप पहचाने जाते हैं।

April 3rd, 2017

 
 

खटकती है मूल उद्देश्यों के प्रति उदासीनता

मर्म संवेदनशील होता है, मर्म तक पहुंचते भी संवेदनशील लोग ही हैं। इसी कारण यह अपेक्षा की जाती है कि शब्दों के जरिए जीवन और संसार के मर्म को उद्घाटित करने वाले शिल्पियों को भी कुछ ऐसी सुविधाएं प्रदान की जाएं, जो उनकी संवेदनशीलता को […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

अब नहीं दिखता साहित्यिक ‘विजन’

एक नवंबर 1966 को भाषा एवं संस्कृति के आधार पर हिमाचल का वर्तमान स्वरूप उभरा था। डा. यशवंत सिंह परमार मुख्यमंत्री और लाल चंद प्रार्थी, भाषा एवं संस्कृति विभाग के मंत्री बने। इसी दौरान भाषा एवं संस्कृति अकादमी का गठन हुआ। प्रार्थी जी ने इसके […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

माखन लाल चतुर्वेदी

कवि, लेखक, पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 ई. में बावई, मध्य प्रदेश में हुआ था। यह बचपन में काफी रुग्ण और बीमार रहा करते थे। इनका परिवार राधावल्लभ संप्रदाय का अनुयायी था, इसलिए स्वभावतर् उनके व्यक्तित्त्व पर इसका गहरा असर पड़ा।  […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

विस्तृत हो रहा है फलक

डा. नलिनी विभा नाजली साहित्य और कलाएं सूक्ष्म भावाभिव्यक्ति के सशक्त एवं खूबसूरत माध्यम हैं। हाल ही में साहित्य अकादमी नई दिल्ली का वर्ष 2016 का पुरस्कार नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास ‘पारिजात’ पर मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि साहित्य-क्षेत्र में महिलाओं […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

आत्मविश्लेषण के साथ बढ़े यह काफिला

मां के आंचल की तरह ही, शब्द की छाया भी हमारे विचारों-संस्कारों को गढ़ती है। पहचान को परिभाषित करने का जिम्मा भी इसी शब्द के पास होता है। पर न जाने क्या बात है कि शब्दों का यह कोमल संसार, आधी दुनिया के आकलन के […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

संपादन से जुड़ें संबंध

चंद्ररेखा डढवाल लेखन को पुरुष या महिला के स्तर पर बांटने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हैं। लेखन का स्तर सोचने व समझने पर निर्भर करता है। आप जीवन को लेकर क्या सोचते हैं और उसकी पेंचीदगियों को कितना समझ पाते हैं। संवेदना व वैचारिक […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

लेखन की दीर्घ परंपराओं से जुड़ें

रेखा वशिष्ट हिमाचल के साहित्यिक परिदृश्ष्य में यहां के महिला लेखन को अलग से रेखांकित करने का प्रयास नहीं के बराबर हुआ है। यह इसलिए भी कि कभी इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई। पिछले लगभग चालीस वर्षों से हिमाचल में जो कुछ भी लिखा […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

सरसता की तरफ भी बढ़ें कदम

आशा शैली हिमाचल में जो आज लिखा जा रहा है और जो पूर्व में लिखा गया है उस सब में हिमाचली लेखिकाएं कहां खड़ी हैं, यह देखना वैसे तो समीक्षकों का काम है, परंतु यदि प्रश्न उठ ही खड़ा होता है तो हमें अपनी सीमाओं […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

जरूरी है पाठकों का जुड़ाव

प्रतिक्रिया चर्चित कथाकार, रंगकर्मी और पत्रकार मुरारी शर्मा के अतिथि संपादकत्व में ‘दिव्य हिमाचल’ के साहित्यिक पृष्ठ प्रतिबिंब के माध्यम से साहित्य विमर्श के प्रश्नों का जो रोचक और पठनीय विवरण शब्दों में पिरोया गया है, वह काबिलेतारीफ है। हिमाचली साहित्य पाठकों से दूर और […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 
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