Divya Himachal Logo Jun 28th, 2017

प्रतिबिम्ब


गज़ल

पूरा-पूरा तोल रे बाबा।

सच की खिड़की खोल रे बाबा।

भेद घरों के खुल न जाएं,

बंद मुट्ठी न खोल रे बाबा।

पत्थर मार उड़ा न देना,

पंछी करत किलोल रे बाबा।

गुमसुम-गुमसुम क्यों बैठा है,

कुछ तो मंुह से बोल रे बाबा।

उस ने दुनिया को लूटा है,

जो बनता अमनोल रे बाबा।

अंबर को फिर छू जाएगा,

पंछी के पर खोल रे बाबा।

यादों की सूखी शाखों पर,

बूर पड़ा अनमोल रे बाबा।

तू सूरज है, तू धरती है,

कौन तेरे रामतोल रे बाबा।

गलियों में मत मांगा कर अब,

करते लोग ठिठोल रे बाबा।

इज्जत, शोहरत, जिस्म, मोहब्बत,

क्या नहीं बिकता मोल रे बाबा।

तू भी नाच जमाना नाचे,

झूठ का बाजे ढोल रे बाबा।

दुनिया क्या है यह बतलाए,

मकड़ी का है झोल रे बाबा।

रिश्वत, भ्रष्टाचार, ईर्ष्या,

बिगड़ गया भूगोल रे बाबा।

उजड़ी मांग सुहागन कर दे,

रंग उलफत के घोल रे बाबा।

फिर अंधेरे की अर्थी पर,

जुगनूं कोई टटोल रे बाबा।

‘बालम’ को तो लूट रहे हैं,

चिकने चुपड़े बोल रे बाबा।

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May 1st, 2017

 
 

गज़ल

छोड़ो भी तकरार कि जीवन छोटा है, यारो बांटो प्यार कि जीवन छोटा है। निज-स्वार्थ के लिए रिश्ते से कटना मत, म्यान में रख तलवार कि जीवन छोटा है। घमंड की गठरी क्यों उठाए फिरता है, जल्दी कर, उतार कि जीवन छोटा है। तेरे सारे […] विस्तृत....

May 1st, 2017

 

स्मृतियों के हाशिए पर जोरावर सिंह

जोरावर सिंह के प्रारंभिक जीवन के संबंध में दो मत विद्यमान हैं। पहले विचार के अनुसार कि जब जोरावर सिंह 16 वर्ष के थे, तो भूमि विवाद को लेकर उनके हाथों चचेरे भाई की हत्या हो गई। वह पश्चाताप के लिए हरिद्वार चले गए। 1803 […] विस्तृत....

April 24th, 2017

 

कूड़ा उठाने वाली वह लड़की

कूड़ा उठाने वाली वह नटखट सी लड़की, मुंह अंधेरे ही निकल पड़ती है काम पर…। वह बजाती है सीटी घर-घर से उठाती है कूड़ा और घसीट कर ले जाती है कूड़े से भरा बोरा…। पीछे से उसे पुकारती है उनींदी आंखें लिए बड़े घरों की […] विस्तृत....

April 24th, 2017

 

सपने अगर हों अपने

सपने अगर हों अपने और आंखें उधार की। करना नहीं ए दर्दे दिल उम्मीदें बहार की।। खुद चलानी सीख ले अपनी कश्तियां। वरना न पार होगी यह नदिया संसार की।। पालकी में बैठकर जो घूमते रहे। बयान क्या करेंगे वो पीड़ा कहार की।। जिनकी हरेक […] विस्तृत....

April 24th, 2017

 

‘युग-यथार्थ और हम-तुम’

निर्धनता के अंगारों पर गुजरते झुलसते कदम बेबस-लाचार-व्याकुल देखती-परखती आंखें भूख से सिसकती गोद देखती रही है बरसों से लहराते बैनर कदमताल करते आश्वासन झूठ की जमीन पे खड़े वादे अट्टालिकाओं के ऊंचे-ऊंचे दरवाजे बाहर बैठे रखवाली में पहरेदार सड़क पर हाथ पसारे लोगों का […] विस्तृत....

April 24th, 2017

 

महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा  हिंदी भाषा की प्रख्यात कवयित्री हैं। महादेवी वर्मा की गिनती हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानदन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के साथ की जाती है। आधुनिक हिंदी कविता में महादेवी वर्मा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप […] विस्तृत....

April 24th, 2017

 

अस्मिता पर संकट है मातृभाषाओं का विलोपन

किसी भाषा की मौत एक जाति, समुदाय उसके इतिहास, सास्कृतिक मूल्य और सौंदर्य चेतना का अंत है, जिसके निर्माण में सदियां बीत जाती हैं, उसे बचाएं रखना हमारा कर्त्तव्य है।  आज अंतरराष्ट्रीय बाजारवाद और भूमंडलीय करण के प्रभाव से छोटी भाषाओं के लुप्त होने की […] विस्तृत....

April 24th, 2017

 

महात्मा हंसराज

महात्मा हंसराज का जन्म 19 अप्रैल,  1864 ई. को होशियारपुर जिला, पंजाब के बजवाड़ा नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता चुन्नीलाल जी साधारण परिवार से संबंध रखते थे। हंसराज जी का बचपन अभावों में व्यतीत हुआ था। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के […] विस्तृत....

April 17th, 2017

 

कहानियों में प्रतिपादित विषय

वही कहानी सफल मानी जाती है, जो पाठक को शुरू से लेकर अंत तक बांधे रखती है। पाठक को कहानी से बांधने का गुर हर किसी के पास नहीं होता। एक सफल कहानीकार कहानी के संदर्भ को हकीकत के धरातल पर उतारकर उसमें रंग भरता […] विस्तृत....

April 17th, 2017

 
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