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बहू-बेटी को न सताएं

( रवि कुमार सांख्यान, मैहरी काथला, बिलासपुर ) कन्या भ्रूण हत्या है जघन्य पाप, नहीं हो सकता यह अपराध माफ। अगर यूं ही घटती रही कन्याएं, तो कैसे होगा समुचित विकास। यह यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा आज, जागो विश्व गुरुवैदिक संस्कृति के सरताज। एक…

खलती हैं आकाशवाणी की खामियां

कश्मीरी लाल नोते लेखक, शिमला से हैं आकाशवाणी, खासकर आकाशवाणी शिमला, भारत सरकार के प्रसार भारती विभाग के अधीन एक पुराना और अत्यंत लोकप्रिय केंद्र है। यह सरकारी अदारा सुबह 5ः55 बजे से शुरू होकर रात के 11ः10 बजे तक मीडियम, शॉर्ट और एफएम बेतार…

ढांचागत सुविधाओं की बाट जोहता पर्यटन

विजय शर्मा लेखक, हिम्मर, हमीरपुर से हैं सरकार सुविधाओं के मापदंड के अनुरूप होटलों की श्रेणी निर्धारित कर उनके लिए रेट निर्धारण करती है, लेकिन पर्याप्त संख्या में होटल उपलब्ध न होने के कारण होटल वाले मनमानी करते हैं। हिमाचल में बढ़ते…

सरसंघचालक की अर्थनीति

सरसंघचालक मोहन भागवत देश की कार्यकारी शक्ति नहीं हैं और न ही उन्हें जनादेश हासिल है, लेकिन संघ और भाजपा के आपसी रिश्ते को दुनिया जानती है, लिहाजा सरसंघचालक की ओर से कोई बयान या परामर्श आए, तो उसकी अनसुनी, अनदेखी नहीं की जा सकती। संघ प्रमुख…

सरकारी फैसलों की तफतीश

इस बहस के मायने भले ही लोकतांत्रिक हैं, लेकिन इनसे किसी सरकार की नैतिकता का सांचा स्पष्ट नहीं होता। चुनाव के दो पाटों के बीच सरकार और विपक्ष को समझें, तो हिमाचली जनापेक्षाएं नजर आएंगी। विपक्ष के सभी कारतूस चल रहे हैं और चुनावी इबारत में…

रोहिंग्या मसले पर सांप्रदायिक रंग

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं रोहिंग्या के पलायन के मामले ने सरकार को शरणार्थियों के मसले पर फिर विचार के लिए विवश किया है तथा एक मानवीय मसले को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। चिंताजनक बात यह है कि यह मसला सांप्रदायिक रंग ले रहा है तथा…

हां…मैं खत्री हूं

हिमाचल के विकास में खत्री समुदाय का योगदान अभूतपूर्व रहा है। सियासत से लेकर हर क्षेत्र में इस वर्ग ने प्रदेश को अलहदा पहचान दिलाई है।  इस बार दखल के जरिए खत्री समुदाय का सुनहरा योगदान बता रहे हैं... मस्तराम डलैल... खत्री समुदाय का इतिहास…

मांग-मांग कर मिलीं भवारना को सिर्फ अधूरी सुविधाएं

‘‘उम्मीदों की नींव पर ही सही, इक पुल चाहिए। गांव-शहर से जुड़ें, डग भरने का हमें भी हक चाहिए।’’ मगर विडंबना यही रही कि लगातार उम्मीदों के कई पुल ढह गए और कई सोचे भी न जा सके। भौगोलिक परिस्थितियां सियासत के दृष्टिकोण पर इतनी भारी पड़ेंगी यही…

गांधी को भूलते विश्वविद्यालय !

आज एक बार फिर गांधी जयंती है। इस बार तो देश स्वच्छता को लेकर राष्ट्रीय अभियान के मूड में है। प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान का असर लोगों पर दिखाई दे रहा है। कमोबेश सफाई पर एक मानस तो बन रहा है। हालांकि सौ फीसदी बदलाव कब तक होगा, फिलहाल कहना…

घर के साथ आस-पड़ोस भी रखें साफ

अनुज कुमार आचार्य लेखक, बैजनाथ से हैं आज महात्मा गांधी जी की जयंती है और साफ-सफाई के सरोकार काफी हद तक राष्ट्रपिता से जुड़ते हैं। ऐसे में दो अक्तूबर का दिन हमें साफ-सफाई के संस्कारों को अंगीकार करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान कर रहा है।…

नीति में बदलाव का वक्त

(गुरमीत राणा, खुंडियां, कांगड़ा ) यह जानकर बड़ा अचरज हुआ कि जिस जगह बड़ा भंगाल में एसडीएम व बीडीओ महोदय 76 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय कर पहुंच गए, वहां पर एक अध्यापक को छोड़ बाकी अध्यापक अनुपस्थित मिले। आयुर्वेदिक औषधालय तो चपरासी की रहमत…

संवेदनाओं का सूखा

(स्वास्तिक ठाकुर, पांगी, चंबा) क्या मानवीय संवेदनाएं इस कद्र भी सूख सकती हैं कि हम किसी त्रासदी में मृत लोगों को लूटने पर उतारू हो जाएं। मुंबई के एलफिंस्टन रोड स्टेशन पर शुक्रवार को मची भगदड़ के दौरान एक पीडि़त से आभूषणों की कथित चोरी का…

गांधी तेरे देश में

(सुरेश कुमार, योल, कांगड़ा ) आजादी के 70 बरस बाद कितना बदल गया है गांधी का देश। आजादी के लिए लड़े, आजाद भी हुए, पर आजादी का एहसास नहीं कर पाए। काश! महात्मा गांधी आज का भारत देख पाते, तो शायद यही कहते कि देश आजाद न होता तो अच्छा था।…

शब्द वृत्ति

रावण लीला जारी है... (डा. सत्येंद्र शर्मा, चिंबलहार, पालमपुर ) दस-दस तेरे शीश हैं और सहस्त्र सौ हाथ, अगणित सेना असुर की, देती तेरा साथ। एक काटते सौ बने, सौ के बने हजार, प्रतिपल बढ़ता सौ गुना, तेरा अत्याचार। सदियों से करते दहन, नहीं बनी कुछ…

मूल से जुड़ना स्व से जुड़ना है

लिखना, अक्षर-अक्षर जुगनू बटोरना और सूरज के समकक्ष खड़े होने का हौसला पा लेना, इस हौसले की जरूरत औरत को इसलिए ज्यादा है क्योंकि उसे निरंतर सभ्यता, संस्कृति, समाज और घर-परिवार के मनोनीत खांचों में समाने की चेष्टा करनी होती है। कुम्हार के चाक…
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