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विचार


जन अधिकारों में अदूरदर्शी कटौती

( कुलभूषण उपमन्यु लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं )

यदि कोई पंचायत या ग्रामसभा दूरदर्शी है और परियोजना निर्माण से भविष्य में पैदा होने वाली समस्याओं को देख सकती है, तो अनापत्ति प्रमाण पत्र में शर्तें जोड़ कर वह अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकती है। इस सारी प्रक्रिया को कमजोर करके जनता के हिस्से का अधिकार प्रशासन के हवाले करने का निर्णय निंदनीय है…

जलविद्युत परियोजनाएं बनाने के लिए निर्माता कंपनियों या निगमों को, सामान्य क्षेत्रों में पंचायतों से और जनजातीय क्षेत्रों में ग्राम सभाओं से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना जरूरी था। अब इस प्रावधान को हटा कर जिलाधीशों को ही अनापत्ति प्रमाण पत्र देने का अधिकार दे दिया गया है। असल में यह शक्ति ग्राम सभाओं या पंचायतों को देने के पीछे मंशा थी कि इससे जमीनी स्तर पर प्रजातंत्र मजबूत होगा और परियोजना निर्माण से प्रभावित लोगों को अपनी समस्याएं सामने लाने और उनके समाधान के लिए दबाव बना सकने का अवसर प्रदान किया जा सकेगा। जिलाधीश तो प्रभावित नहीं है, वह तो सरकारी आदेश ही मानेगा। उसे तो अपना करियर और नौकरी सुरक्षित रखनी है, जिसमें कुछ गलत भी नहीं है। 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज के माध्यम से जमीनी स्तर पर प्रजातंत्र को मजबूत करने के प्रयास आरंभ हुए। बहुत से विभागों की कुछ जिम्मेदारियां और अनापत्ति जैसे अधिकार देने का क्रम शुरू हुआ। इस दिशा में अभी तक बहुत कुछ करना बाकी है, परंतु उत्तरोत्तर धीरे-धीरे पंचायतों को सशक्त करते जाने के बजाय इस नए प्रावधान से पंचायत की शक्तियों के क्षरण की दिशा में बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। वैसे तो अनापत्ति प्रमाण पत्र देने का अधिकार सब जगह ग्राम सभाओं को ही होना चाहिए, क्योंकि असली प्रभावित तो वही होते हैं। निर्माता कंपनियां या निगम तो लाभ कमाने की दृष्टि से ही सारी व्यवस्था चलाते हैं। प्रभावितों के अधिकार और हित उनकी ओर से हमेशा हाशिए पर ही रहे हैं। हिमाचल प्रदेश ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। निर्माण कार्य में बताए गए प्रावधानों का बड़े पैमाने पर उलंघन होता है, डंपिंग कभी निर्धारित स्थानों पर नहीं होती। ऐसे नुकसान जिनका पहले से कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, उनकी भरपाई की कोई व्यवस्थाएं नहीं होतीं। जनसुनवाई जैसे प्रावधान भी रस्म अदायगी मात्र ही साबित होते हैं। लोगों को रास्तों, कूहलों, पनचक्कियों आदि की बर्बादी से होने वाले नुकसानों की भरपाई की जरूरत ही नहीं समझी जाती। लोग सालों तक छोटे-छोटे मामलों में राहत प्राप्त करने के लिए आंदोलनों के माध्यम से कभी सफल, तो कभी असफल प्रयास करते देखे जा सकते हैं। चमेरा-3 परियोजना जिला चंबा, की सुरंग से भारी मात्रा में पानी का रिसाव हो रहा है, जिससे मौखरी गांव बर्बाद हो गया है। वे लोग आज तक पुनर्वास को भटक रहे हैं।

चमेरा-2 परियोजना जिला चंबा में अधिकांश डंपिंग अवैध स्थलों पर की गई। श्मशान के रास्ते तक के लिए लोगों को आंदोलन की नौबत आई। लैंको प्रोजेक्ट काथला, जिला चंबा में गांव के नीचे से सुरंग बनाने के कारण भारी ब्लास्टिंग की गई। इससे ऊपर बसे गांव के अधिकांश घरों में दरारें आ गईं। जिन परिवारों ने जीवन भर की कमाई इन मकानों के निर्माण में लगा दी, वे इस दृश्य को देखकर चकित रह गए। हैरानी की बात यह कि इसे पहले तो परियोजना निर्माता मानने को ही तैयार नहीं थे और बाद में आंदोलन के जोर पर कुछ राहत प्राप्त की जा सकी। पार्वती प्रोजेक्ट के निर्माण के दौरान ब्लास्टिंग से टूटे मकानों या मलबे से दबी जमीनों के नुकसान की भरपाई के हालात लोगों की तकलीफ के उदाहरण हैं। ये सब आसानी से हल हो सकने वाले मामलों की हालत है। एक फीसदी बिजली स्थानीय विकास के लिए देने का प्रावधान लोगों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के दृष्टिगत आया है। अगर यह राशि दी जा रही है, तो अच्छी बात है। समावेशी विकास के लिए लोगों को साथ ले कर आगे बढ़ना सरकार की जिम्मेदारी होती है। हजारों हजार करोड़ रुपए कमा कर यदि 100 करोड़ रुपए एनएचपीसी ने स्थानीय विकास के लिए दे दिया, तो इसका अर्थ यह तो नहीं कि लोगों को उनके प्रजातांत्रिक अधिकार से वंचित कर दिया जाए। यदि प्रशासनिक लोग इतने ही दूरदर्शी और जनाभिमुख होते, तो भाखड़ा और पौंग बांध विस्थापित आज तक पुनर्वास और भूमि आबंटन की  हारी हुई लड़ाइयां न लड़ रहे होते। असल जरूरत तो विस्थापितों और प्रभावितों के बुनियादी हकों की रक्षा को सुनिश्चित करने की है। यदि कोई पंचायत या ग्रामसभा दूरदर्शी है और परियोजना निर्माण से भविष्य में पैदा होने वाली समस्याओं को देख सकती है तो अनापत्ति प्रमाण पत्र में शर्तें जोड़ कर वह अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकती है। अनावश्यक देरी को रोकने के लिए प्रमाण पत्र देने के काम को समय सीमाबद्ध किया जा सकता है, परंतु इसके साथ ही परियोजना के पूरे प्रारूप और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव की सूचना अनापत्ति प्रमाण पत्र देने वालों तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि लोग संभावित समस्याओं को समझ कर उनके समाधान की शर्तें अनापत्ति प्रमाण पत्र में जोड़ सकें। इस सारी प्रक्रिया को कमजोर करके जनता के हिस्से का अधिकार प्रशासन के हवाले करने का निर्णय निंदनीय है और विकास में जन भागीदारी को कम करने वाला है। इसको रद्द किया जाना चाहिए।

ई-मेल : kbupmanyu@gmail.com

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