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विचार


संवैधानिक आड़ में राजनीति

कर्नाटक अचानक कुरुक्षेत्र बन गया है। सड़कों पर हंगामा है। बसें फूंकी जा रही हैं। राजनीतिक जुलूस और जुमलेबाजी का दौर है। मानो एक पक्ष दूसरे को ललकार रहा है। सुरक्षा के तौर पर स्कूल-कालेज की छुट्टी करनी पड़ी है। ऐसा नहीं है कि अचानक कर्नाटक पर कोई संकट आसन्न है या कोई आंदोलन छेड़ दिया गया है। यह कांग्रेस और भाजपा के बीच खुन्नस की राजनीति की परिणति है। राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के खिलाफ महाभियोग की अनुमति दी है, जो कि संवैधानिक और कानूनन है। यद्यपि लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ऐसा नहीं मानते। भूमि घोटालों, भ्रष्टाचार और बेटा-बेटीवाद के आरोपों के प्रथम दृष्ट्या साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर राज्यपाल ऐसा कर सकते हैं। मुख्यमंत्री उस फैसले को ऊंची अदालतों में चुनौती दे सकते हैं। अभी तो मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की याचिका जिस अदालत के सामने है, उसे निर्णय करना है कि केस चलेगा या जांच के आदेश दिए जाएंगे, लेकिन ये कारण सही हैं और उनके निहितार्थ भी अलग हैं। बेशक हंसराज भारद्वाज 10 जनपथ के घोर वफादारों में रहे हैं। वह यूपीए की पहली सरकार में कानून मंत्री भी रह चुके हैं। उन्हें कर्नाटक एक विशेष मकसद के साथ भेजा गया होगा। दक्षिण में कर्नाटक सरकार के साथ ही भाजपा ने अपने विस्तार के पांव पसारे थे। येदियुरप्पा कर्नाटक की ताकतवर जाति लिंगायत के बड़े नेता हैं। उनके उभार के बाद कांग्रेस हाशिए पर है और देवेगौड़ा का जद (एस) भी कोई क्रांति नहीं कर पा रहा है। हंसराज भारद्वाज कर्नाटक में कांग्रेस के एजेंट हैं या नहीं, एक संवैधानिक शख्स के प्रति कोई भी मर्यादा इसकी अनुमति नहीं देती है, लेकिन भाजपा ने राज्यपाल को कांग्रेस-यूपीए का एजेंट करार दिया है और उन्हें वापस बुलाने के लिए राष्ट्रपति तक से आग्रह किया है। कांग्रेसी राज्यपाल और भाजपाई मुख्यमंत्री के बीच खटास और खुन्नस तब बढ़ी, जब कुछ विधायकों ने येदियुरप्पा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। मुख्यमंत्री ने स्पीकर के जरिए असंतुष्ट विधायकों की सदस्यता रद्द करवा दी और सदन की शेष संख्या के आधार पर बहुमत का दावा किया, लेकिन अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत राज्यपाल ने कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा केंद्र को भेजी। हालांकि केंद्र ने राज्यपाल की उस जल्दबाजी को खारिज कर दिया। नतीजतन दोनों संवैधानिक शिखरों के बीच तनाव गहराता चला गया। शायद ऐसी टिप्पणियां सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए थीं कि येदियुरप्पा कैबिनेट के मंत्री भ्रष्ट हैं और राज्यपाल के पास बाकायदा कोई सूची है। ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ जैसे फिकरे भी बाहर नहीं आने चाहिए थे। बेशक राज्यपाल राज्य कैबिनेट की सलाह के मुताबिक काम करते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने को मंजूरी देना असंवैधानिक तो नहीं है। हालांकि राज्यपाल न्यायिक आयोग की जांच और लोकायुक्त के फैसले की भी प्रतीक्षा कर सकते थे। नए सिरे से कोई जांच भी बिठा सकते थे, लेकिन हमारा मानना है कि यह संवैधानिक आड़ में राजनीति खेली जा रही है। दरअसल केंद्र के स्तर पर भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर भाजपा ने जो राजनीतिक दबाव बना रखा है, संसद का पूरा शीतकालीन सत्र स्पेक्ट्रम घोटाले की जेपीसी मांग के कारण ही स्वाह हो गया, बजट सत्र पर भी आशंकाएं मंडरा रही हैं, तो कांग्रेस ने पलटवार के तौर पर कर्नाटक का पत्ता खेला है। येदियुरप्पा और उनके रेड्डी बंधु आदि मंत्री भ्रष्ट नहीं हैं, यह तो भाजपा भी अनौपचारिक तौर पर नहीं मानती। भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी के कर्नाटक के कुछ विधायकों और नेताओं से बातचीत की थी। उस अनुभव पर भाजपा नेता की त्वरित टिप्पणी भी कि कर्नाटक तो काली कोठरी है। वहां पर कोई काला है और दूसरे के कालेपन की पर्याप्त जानकारी भी रखता है। नेताजी ने कर्नाटक से तौबा कर ली, लेकिन येदियुरप्पा ऐसे क्षत्रप हैं, जो भाजपा नेतृत्व को आंखें भी दिखा सकते हैं। उनके इस्तीफे का मतलब है कि कर्नाटक में भाजपा सरकार का पतन! लिहाजा मजबूरी में भाजपा को येदियुरप्पा के साथ खड़ा होना पड़ रहा है और वह इस मुद्दे को कांग्रेस की झोली में भी नहीं डालना चाहती। कारण, भ्रष्टाचार पर पार्टी और राजग के राष्ट्रीय अभियान की हवा निकल सकती है। लिहाजा राज्यपाल के निर्णय पर तुरंत भाजपा आक्रामक हुई और सड़कों पर उतर आई है। हालांकि कांग्रेस की पुरानी आदत रही है कि जिस राज्य में विपक्षी दल की सरकार रही है, वह कांग्रेसी राज्यपाल के जरिए उसे अस्थिर करती रही है। मौजूदा प्रकरण के जरिए एक बार फिर राज्यपाल के पद पर बहस शुरू हो सकती है कि वह घोर राजनीतिक हो या कोई खास शख्सियत अथवा राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों की भी समीक्षा होनी चाहिए। कमोबेश राज्यपाल को पार्टी की राजनीति से अछूता रखा जाना चाहिए। कर्नाटक के संदर्भ में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को अब अदालत का सामना करते हुए खुद को पाक-साफ साबित करना चाहिए।

January 24th, 2011

 
 

गर्भ में ही खुलेगी बीमारियों की पोल

(दिनेश नेगी, अपर घनाला, संधोल) अब शिशु के जन्म लेने से पहले ही उसे भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता लगाया जा सकेगा। ब्रिटेन स्थित ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट हास्पिटल के स्री रोग विशेषज्ञ प्रेगनेंट महिलाओं के लिए एक ऐसा ब्लड टेस्ट ईजाद किया है, […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

फोरीनेहरू

फोरी का जन्म 1908 में 5 दिसंबर को वुडापेस्ट में हुआ उनके पिता का खिलौनों और फर्नीचर का करोबार था। नेहरू परिवार के, बीके नेहरू  उनके क्लासमेट थे । जिस समय उनका परिचय बीके नेहरू से हुआ तब उनके मन में भारत को ले कर […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

अब सोचता है क्या…

(अतुल ‘अंशुमाली’, हमीरपुर) शाम के साहिल पे खड़े होकर, अब सोचता है क्या। उस ढलते सूरज को देखकर, अब सोचता है क्या॥  उनको भी टाफियां बांट आते तो, खिल उठते उन बच्चों के चेहरे भी। चले आए जो महफिलों में हम, नए साल के तोहफे […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

सूक्त विवेचन

(डा. मनोहर लाल आर्य, कांगड़ा) हमारे ऋषियों के माध्यम से जो अमूल्य ज्ञान-विज्ञान हमें उपलब्ध हुआ, उसे ‘वेद’ के नाम से जाना जाता है। ऋग्वेद विश्व भर के पुस्तकालयों मंे सर्वप्राचीन ग्रंथ है। इस तथ्य से सभी देशी-विदेशी विद्वान प्रायः सहमत हैं। इसमें कोई संदेह […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

मसरूर मंदिर की असली परिभाषा क्या है

(डा. विनोद कुमार, हरिपुर, सुंदरनगर) होटल धौलाधार में पर्यटन निगम द्वारा आयोजित सेमिनार में विख्यात लेखक प्रो. एनके सिंह द्वारा ‘मसरूर रॉक कट टेंपल’ को शिव मंदिर कहना बिल्कुल गलत है व तथ्यों से परे है। एक ऐसा व्यक्ति जो इतिहास व धरोहरों की जानकारी […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

ताकि प्रदेश की हस्ती बची रहे

पड्डल मैदान को अतिक्रमण से बचाने की मुहिम के निष्कर्ष प्रशासन को शाबाशी देते हैं और यकीनन ऐसे फैसलों की इबारत से प्रदेश की हस्ती बचती है। हैरानी यह है कि पड्डल मैदान के साथ अतिक्रमण की बाजी क्यों जीतती रही। यह मंडी का ही […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

स्वामी चिन्मयानंद

स्वामी चिन्मयानंद का नाम देश के महान आध्यात्मिक संत के तौर पर प्रसिद्ध है। उन्होंने चिन्मय मिशन की स्थापना की । लगभग 30 किताबें उन्होंने लिखी हैं।  सभी किताबों में हर धर्म के पीछे जो  दार्शनिक विश्वास है उसके बारे में लिखा गया है।  उनका […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

बहुत अफसोस

(कृष्णचंद्र महादेविया) जान से प्यारा बहुत भोला स्मार्ट और हंसमुख था मैं तब अब के गिरगिटों के लिए उनके गिरगिटपने का कतई अफसोस नहीं है मुझे.. प्रेरणा पुंज मस्तक और बड़ा भाई था मैं तब अब के आस्तीन के सांपों का उनके सांप हो जाने […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

हर नागरिक का दायित्व है पर्यावरण संरक्षण

(हरि सिंह ठाकुर,लेखक, हरिपुर, सुंदरनगर, जिला मंडी से सेवानिवृत्त डीएफओ हैं) हिमाचल में भी पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को समझते हुए पहल की है। पौधारोपण योजनाओं पर भी सरकार का विशेष ध्यान है, जल्दी ही हिमाचल, भारत का प्रथम कार्बन-न्यूट्रल प्रदेश बन सकता है… पर्यावरण […] विस्तृत....

January 24th, 2011

 

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