Divya Himachal Logo Mar 27th, 2017

विचार


शिवसेना सांसद या मवाली !

शिवसेना के लोकसभा सांसद रवींद्र गायकवाड़ ने जिस तरह एयर इंडिया के एक अधेड़ अधिकारी के साथ बदसलूकी की, मारपीट की, उनका चश्मा तोड़ दिया और सार्वजनिक तौर पर गालियां देकर अपमानित किया है, बेशक वह हरकत निंदनीय, दंडनीय और घोर शर्मनाक है। सांसद को इस हरकत पर न तो कोई पछतावा है और न ही वह माफी मांगने को तैयार हैं, सिर्फ अपनी धौंस पर कायम हैं। सांसद की यह कौन-सी जमात और संस्कृति है? सांसद या किसी भी जनप्रतिनिधि के पास ऐसे हिंसक व्यवहार का लाइसेंस नहीं है। यह किसी भी सांसद के काम करने का तरीका नहीं हो सकता। सांसद ने अपने पद की हेकड़ी दिखाते हुए उस अधिकारी को थप्पड़ मारा और फिर चप्पल से धुनाई की। यह खुद सांसद की स्वीकारोक्ति है। लिहाजा कानूनन दंडनीय है। सांसद ने एक सरकारी अधिकारी के काम में दखल दिया, यह एक अपराध है। फिर कार्यरत अधिकारी पर चप्पल से हिंसक मारपीट की, यह भी अपराध है। चूंकि सभी प्रमुख एयर लाइंस ने सांसद को ब्लैक लिस्ट करने और उनकी उड़ान पर पाबंदी लगाने का फैसला लिया है, क्योंकि सांसद की हरकत आपराधिक थी। लिहाजा प्रथमद्रष्टया यह अपराध का केस बनता है, लेकिन हैरानी है कि न तो शिवसेना ने कोई कार्रवाई की, न लोकसभा में मुद्दा उठा या सांसद के व्यवहार को लेकर कार्रवाई की मांग की गई और न ही सदन ने सांसद के मवालीपन की निंदा की! शिवसेना भी जांच के इंतजार में है। स्पीकर सुमित्रा महाजन का कहना था कि नागरिक उड्डयन की ओर से कोई शिकायत नहीं आई, लिहाजा कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी, लेकिन ऐसी बदसलूकी का हक किसी भी सांसद को नहीं है। सवाल है कि जब एक सांसद के जरिए हमारा गणतंत्र लज्जित हो रहा था, क्या तब भी अपने स्तर पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता था? पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने के आदेश नहीं दिए जा सकते थे? बहरहाल देर आयद, दुरुस्त आयद। पुलिस ने देर-सवेर एफआईआर तो दर्ज कर ली, लेकिन गिरफ्तारी कौन करेगा? किससे आदेश लेने पड़ेंगे? जांच की दलीलें देने का मतलब है कि मामले को दबाने या रफा-दफा करने की कोशिश करना! चूंकि मामला लोकसभा सांसद का है, लिहाजा स्पीकर कोई कमेटी गठित कर सकती थीं या खुद रवींद्र गायकवाड़ की सदस्यता को निलंबित करके जांच समिति का गठन किया जा सकता था। दरअसल सब कुछ आईने की तरह पारदर्शी और प्रथमद्रष्ट्या था, लेकिन ऐसा लगता है मानो कानून और संविधान भी ‘हेकड़ीबाज’ सांसद की गुंडई तले दबा दिए गए हों! औसत सांसद 10 लाख लोगों का निर्वाचित लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि होता है। लोकतंत्र की परिभाषा में उसे ‘जनसेवक’ कहते हैं। तो वही सांसद आम नागरिक के लिए गुंडा, बदमाश कैसे हो सकता है? लाखों लोगों के लिए जो शख्स प्रेरणास्रोत हो सकता है, उससे एक ‘मवाली’ के व्यवहार की अपेक्षा कैसे संभव है? यह कोई सामान्य विषय नहीं है। जब सांसद को जानकारी दी गई थी कि एयर इंडिया की उस उड़ान में सिर्फ ‘इकोनॉमी क्लास’ की ही व्यवस्था है, तो सांसद ने ‘बिजनेस क्लास’ की जिद ही क्यों की? सरकारी संस्था की तय व्यवस्था को कैसे भंग किया जा सकता था? सांसद ने न केवल सरकारी अधिकारी की पिटाई की, बल्कि दिल्ली उड़ान के उतरने के बाद विमान में करीब एक घंटे तक जिद करके बैठे रहे कि एयर लाइंस वाले उनसे माफी मांगें। यह सांसद का दोहरा अपराध है, जिसके तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। दरअसल शिवसेना के संस्कार ही हिंसक हैं। कभी पार्टी के कार्यकर्ता किसी अधिकारी के दफ्तर में घुसकर उत्पात मचाते हैं, तोड़फोड़ करते हैं, तो कभी फिल्मों के प्रदर्शन पर फतवे जारी किए जाते हैं। सांसद की हेकड़ी देखिए कि वह लगातार कहते रहे कि वह तो उस अधिकारी को और भी मारते-पीटते। बल्कि उसे उठाकर जहाज के बाहर फेंकने ही वाले थे। इतना गुस्सा, इतना दंभ, अहंकार…! इसी सांसद ने दिल्ली के ‘महाराष्ट्र सदन’ में एक मुस्लिम वेटर के मुंह में रोटी का टुकड़ा जबरन ठूंस दिया था, जबकि वह उस वेटर ने रोजा रखा था। उस घटना पर सांसद के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, हम सब भूल गए हैं। क्या मौजूदा घटना को भूला जा सकता है? क्या सांसद के बयानों के आधार पर ही शिवसेना उन्हें निलंबित नहीं कर सकती थी? जांच-कार्य तो चलता रहता। यदि ऐसा नहीं किया गया है, तो क्या शिवसेना गुंडे और मवालियों की पार्टी है? यह सवाल भाजपा को भी चुभता होगा, क्योंकि शिवसेना के साथ उसका पुराना गठबंधन है! इससे भाजपा के चाल, चेहरा, चरित्र पर भी आंच आती है। बहरहाल सांसदों,विधायकों के कई किस्से हमने सुने हैं, कई नापाक देखे भी हैं, लेकिन शिवसेना के इस सांसद का मामला बेहद बदतमीज और बदरूप था। उन्हें हर हाल में सजा मिलनी ही चाहिए।

March 27th, 2017

 
 

स्वीडन में भी है बेरोजगारी भत्ता

(डा. चिरंजीत परमार, फल वैज्ञानिक, मंडी) हिमाचल सरकार ने अभी कुछ दिन पहले ही युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की है। यह निर्णय सही है या गलत, इस बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। यह काफी विवाद का विषय है। हां, […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

अब टेस्ट मैच का गवाह

(स्वास्तिक ठाकुर, पांगी, चंबा) वन डे और टी-ट्वेंटी के बाद धर्मशाला में पहली बार टेस्ट मैच हो रहे हैं। कभी सोचा भी न था कि हिमाचल स्टेडियम की वजह से दुनिया में जाना जाएगा और धर्मशाला विश्व के करोड़ों लोगों की आंखों में छा जाएगा। […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

आत्मविश्लेषण के साथ बढ़े यह काफिला

मां के आंचल की तरह ही, शब्द की छाया भी हमारे विचारों-संस्कारों को गढ़ती है। पहचान को परिभाषित करने का जिम्मा भी इसी शब्द के पास होता है। पर न जाने क्या बात है कि शब्दों का यह कोमल संसार, आधी दुनिया के आकलन के […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

कानून के राज की अपेक्षा

(किशन सिंह गतवाल, सतौन, सिरमौर) उत्तर-प्रदेश अब तक लचर कानून व्यवस्था के लिए भी जाना जाता रहा है। अपराध वहां कई रूपों में व्याप्त है। आजम खान की भैंसे गुम हो जाती हैं, तो पुलिस का एक बड़ा दल उनकी खोज में लगा दिया जाता […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

संपादन से जुड़ें संबंध

चंद्ररेखा डढवाल लेखन को पुरुष या महिला के स्तर पर बांटने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हैं। लेखन का स्तर सोचने व समझने पर निर्भर करता है। आप जीवन को लेकर क्या सोचते हैं और उसकी पेंचीदगियों को कितना समझ पाते हैं। संवेदना व वैचारिक […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

सपना सच करने को मैदान में बहा रहे पसीना

सपना सच करने को मैदान में बहा रहे पसीनाचलो चलें फुटबाल हो जाए। पैरों से खेले जाने वाले दुनिया के शायद एकमात्र खेल फुटबाल के दीवाने एक ढूंढो तो सौ मिलते हैं। ‘दिव्य हिमाचल’ ने अपने मेगा इवेंट ‘दिव्य हिमाचल फुटबाल लीग’ के जरिए युवाओं में ऐसा जोश जगाया कि पुराने खिलाडि़यों को […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

लेखन की दीर्घ परंपराओं से जुड़ें

रेखा वशिष्ट हिमाचल के साहित्यिक परिदृश्ष्य में यहां के महिला लेखन को अलग से रेखांकित करने का प्रयास नहीं के बराबर हुआ है। यह इसलिए भी कि कभी इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई। पिछले लगभग चालीस वर्षों से हिमाचल में जो कुछ भी लिखा […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

सरसता की तरफ भी बढ़ें कदम

आशा शैली हिमाचल में जो आज लिखा जा रहा है और जो पूर्व में लिखा गया है उस सब में हिमाचली लेखिकाएं कहां खड़ी हैं, यह देखना वैसे तो समीक्षकों का काम है, परंतु यदि प्रश्न उठ ही खड़ा होता है तो हमें अपनी सीमाओं […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 

जरूरी है पाठकों का जुड़ाव

प्रतिक्रिया चर्चित कथाकार, रंगकर्मी और पत्रकार मुरारी शर्मा के अतिथि संपादकत्व में ‘दिव्य हिमाचल’ के साहित्यिक पृष्ठ प्रतिबिंब के माध्यम से साहित्य विमर्श के प्रश्नों का जो रोचक और पठनीय विवरण शब्दों में पिरोया गया है, वह काबिलेतारीफ है। हिमाचली साहित्य पाठकों से दूर और […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 
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