Divya Himachal Logo May 24th, 2017

विचार


हिमाचली आंचल में प्रवासी बस्तियां

काम की तलाश में बाहरी राज्यों से आए प्रवासी कामगारों ने हिमाचली शहरों में झुग्गियां जमा लीं। शहर के बीचोंबीच या सड़क किनारे बसी इनकी बस्तियां पहाड़ी राज्य की प्राकृतिक सुंदरता पर ग्रहण लगा रही है। प्रवासियों की हिमाचल आमद श्रम के नजरिए से तो महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसने कई दिक्कतें भी पैदा कर दी हैं…

हिमाचल में 2003 के बाद विशेष औद्योगिक पैकेज के जरिए जिस औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ, वह अपने साथ ऐसी दिक्कतें भी लेकर आई, जिसका खामियाजा हिमाचल आज तक भुगत रहा है। प्रदेश में सस्ती लेबर व कुशल कारीगरों की कमी थी। अनुभव की कसौटी पर पहाड़ी प्रदेश के युवा बिहार व यूपी के कामगार वर्ग से कहीं पीछे थे। कारखाना मालिक सस्ती लेबर बाहरी प्रदेशों से लाए। इनके लिए आधारभूत ढांचा किसी भी औद्योगिक क्षेत्र में था ही नहीं। सस्ती लेबर एक-एक कमरे में 12-12 की संख्या में रहने को अभ्यस्त  है। नालागढ़-बद्दी-बरोटीवाला, कालाअंब, टाहलीवाल, यहां तक कि ग्वालथाई के साथ-साथ निर्माण क्षेत्र में जुटे प्रवासी मजदूर खुले में शौचमुक्त प्रदेश के उन दावों की पोल खोलते मिलते हैं, जिसके लिए प्रदेश को पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

नदियों, खड्डों व नालों के किनारे प्रवासी मजदूर रोजाना निवृत्त होते देखे जा सकते हैं। इसी वजह से जल प्रदूषण व वायु प्रदूषण की दिक्कतें प्रदेश में बढ़ रही हैं। किसी भी औद्यौगिक क्षेत्र में अभी तक भी टॉयलट्स का समुचित प्रावधान नहीं हो सका है। यह ऐसा वर्ग है, जो खुले में शौच करने से जरा भी संकोच नहीं करता।  प्रदेश के 12 जिलों में अत्याधुनिक कालोनियां बस रही हैं। निजी क्षेत्र यह निर्माण कर रहा है। अधिकांश कार्य प्रवासी मजदूरों के हाथों में है। हालांकि यह दायित्व बिल्डरों का ही है कि इनके लिए अस्थायी टायलट्स का निर्माण करें। मगर न तो बिल्डर इस बारे में गंभीर हैं, न ही संबंधित सरकारी एजेंसियां। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों तक में इन प्रवासी मजदूरों ने इस तरह का कहर बरपाना शुरू कर रखा है, जिससे गर्मियों व बरसात के दौरान महामारी फैलने की आशंका बनी रहती है।  प्रदेश में सिरसा, यमुना, अश्वनी खड्ड के साथ-साथ सतलुज व ब्यास किनारे प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा बड़ा कारक यही वर्ग बन रहा है।

जानकारों के मुताबिक यदि इस वर्ग को जागरूक नहीं किया गया, जो लोग इन्हें काम पर लगाते हैं, उनके खिलाफ नए कानून व नियम खुले में शौच के संदर्भ में नहीं बनाए गए, तो निर्मल व स्वच्छ प्रदेश जो अपने बेहतरीन पर्यावरण के लिए देश ही नहीं विदेशों में भी जाना जाता है, बदनाम होकर रह जाएगा।

ठिकाना जहां बना वहीं के हो गए

हिमाचल प्रदेश में बाहर से आने वाले प्रवासी एक बार यहां आए तो यहीं के होकर रह गए। धर्मशाला शहर के साथ सटी झुग्गी बस्ती ही एकमात्र उदाहरण नहीं है बल्कि हिमाचल के कई शहरों में ऐसी झुग्गियां बस चुकी हैं जहां से प्रवासी मजदूर वापस नहीं लौटे। शिमला में भी बड़ी संख्या में ऐसे प्रवासी हैं,जो कि हिमाचल में ही रह रहे हैं। पहले इन्होंने ढारों में अपनी गुजर बसर की और अब यहां पक्के मकान तक बना लिए हैं। शिमला में ईदगाह कालोनी भी इसका एक बड़ा उदाहरण हैं जहां पर प्रवासी कामगार रहते हैं,लेकिन उनके यहां पर पक्के मकान भी हैं।

इसके साथ सड़कों के किनारे प्रदेश में कहीं पर भी ऐसी छोटी-छोटी झुग्गियां देखी जा सकती हैं जिनमें ये लोग रह रहे हैं और इनके बच्चे भी यहां पढ़ाई कर रहे हैं। बता दें कि हिमाचल प्रदेश में ऐसी कई स्वयंसेवी संस्थाएं हैं,जो कि सामाजिक उत्थान के नाम पर प्रवासी मजदूरों के बच्चों को बेहतर शिक्षा देने को प्रयासरत हैं।  कई जगहों पर अग्रणी स्कूलों में इनकी एडमिशन हैं और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है। हालांकि सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के लिए ऐसा होना भी चाहिए, लेकिन इनके लिए नियम भी निर्धारित होने चाहिएं।

इस तरह से नियमों के खिलाफ झुग्गियां बनाकर रहना भी सही नहीं है। अपने सामाजिक दायित्वों की आड़ में ऐसी स्वयंसेवी संस्थाएं खुद के हित को साध रही हैं क्योंकि इसकी एवज में उनका नाम भी चमकता है परंतु हिमाचल के स्थानीय लोगों को होने वाली परेशानियों के बारे में वे समझ नहीं पा रहीं।

कारीगरी के चलते बस गए

शिमला में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के लोग रहते हैं जिनकी कारीगरी के चलते उनकी डिमांड भी काफी ज्यादा है। जो कोई काम करने के लिए यहां पर आता है वह अपने साथ और कई लोगों को भी ले आता है। ऐसे-ऐसे जहां इनकी कारीगरी की डिमांड यहां पर बढ़ी है,वहीं झुग्गियों में इनकी संख्या में भी इजाफा हुआ है।

80 फीसदी बस्तियों में टायलट नहीं

प्रवासी मजदूरों की बस्तियां सरकार, प्रशासन व स्थानीय समुदाय के स्वच्छता के तमाम दावों को हवा कर रही हैं। यहां पर सेनिटेशन कंडीशन अत्यंत दयनीय बनी हुई है। प्रशासन के तमाम प्रयासों के बावजूद अभी भी इन बस्तियों में 80 प्रतिशत से अधिक में शौचालय नहीं हैं। खुले में शौच के चलते कई बीमारियों को खुला न्योता मिल रहा है। वहीं,खड़पोश से बनी झोंपडि़यां आए दिन आग की घटनाओं को खुला बुलावा देती हैं।

यूपी, बिहार व राजस्थान से बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में जिला ऊना में आए हैं।  मौजूदा समय में जिला में करीब दस हजार प्रवासी मजदूर अलग-अलग जगहों पर रह रहे हैं। बेशक प्रवासी मजदूर जिला में जहां विकास कार्यों विशेषकर निर्माण क्षेत्र में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही यह वर्ग कई समस्याओं व चिंताओं को भी अपने साथ लाया है। प्रवासी मजदूरों के चलते ऊना मुख्यालय के साथ लगते लालसिंगी, रामपुर, मलाहत, घालूवाल, बसाल, मवा सिंधिया, बाथू पक्का परोह, शिववाड़ी, गगरेट, टाहलीवाल व अन्य स्थानों पर स्लम एरिया विकसित हो गए हैं,

अवैध तरीके से डटे

प्रवासी मजदूरों में  से अधिकतर बिना पुलिस बैरिफिकेशन  के ही यहां पर रहते हैं।  इनकी आड़ में कई आपराधिक  तत्त्व भी यहां पर सक्रिय हैं। जिला में बढ़ती चोरियों में भी इस प्रकार के आपराधिक तत्त्वों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता।

देवभूमि की साख को लगा रहे बट्टा

हिमाचल में प्रवासियों की जब से गतिविधियां बढ़ी हैं, तब से यहां भी अपराध बढ़ने लगा है। प्रवासी अपराधों को अंजाम देकर  हिमाचल की देवभूमि को दागदार बना रहे हैं। अन्य राज्यों की तर्ज पर यहां अब अपराध होने लगा है और इसमें अच्छी खासी भूमिका इन प्रवासी मजदूरों की है। जगह-जगह बन रही झुग्गियां अपराधों की बस्तियां साबित हो रही हैं।  चोरी, डकैती और लूटपाट व अन्य गंभीर अपराधों में प्रवासियों की संलिप्तता बढ़ी है और ओवरआल इससे हिमाचल में अपराधों का ग्राफ भी बढ़ा है, जो कि बेहद चिंताजनक है। आंकड़ों पर गौर करें तो बीते तीन साल में ही राज्य में 1248 प्रवासी आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त पाए गए हैं। यही नहीं,अपराधों में इनकी संलिप्तता हर साल बढ़ती जा रही है।  आंकड़ों के अनुसार राज्य में बीते तीन सालों में जो  अपराध हुए हैं, उनमें साल 2014 में 371 प्रवासी शामिल पाए गए। वहीं 2015 में अपराधों में संलिप्ता वाले प्रवासियों की संख्या बढ़कर 424 और साल 2016 में 453 प्रवासी लोग अपराधों में संलिप्त पाए गए। देखा गया है कि ज्यादातर प्रवासी लोग  हिमाचल में काम के लिए आते हैं ,लेकिन यहां वे काम के साथ-साथ  अपराधों में शामिल हो रहे हैं। राज्य में प्रवासियों में एक बड़ी तादाद नेपाली मजदूरों की है। शिमला जिला के अलावा कुल्लू व अन्य सेब बहुल इलाकों में नेपाली मजदूर काम के लिए आ रहे हैं। वहीं यहां पर हत्या जैसे गंभीर अपराधों को भी अंजाम दे रहे हैं। अन्य अपराधों में भी इनकी भूमिका देखी गई है।

झुग्गियों के शहर में बदलता बीबीएन 

उद्योगों की रीढ़ कहे जाने वाले प्रवासी कामगार बीबीएन में परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं। क्षेत्र में झुग्गियों की बढ़ती तादाद, अपराधों में इस तबके की बढ़ती संलिप्तता सरीखे कई कारण हैं, जो माहौल को अशांत कर रहे हैं। आलम यह है कि हिमाचल की आर्थिक राजधानी के तौर पर उबरा बीबीएन क्षेत्र प्रवासियों की भरमार के चलते झुग्गियों के शहर में तबदील होता जा रहा है। हालात ये  हैं कि जहां  खाली जमीन मिलती है, वहां पर झुग्गियों का शहर बसने में देर नहीं लगती। अकेले बीबीएन में ही 20 हजार से अधिक झुग्गी-झोपडि़यां स्थापित हैं। इनमें हजारों की तादाद में लोग अन्य राज्यों से आकर अपना जीवनयापन कर रहे हैं। उद्योगों के पास रिहायशी सुविधाएं नाममात्र हैं। ऐसे में इनके   पास झोंपडि़यों में जान जोखिम में डाल कर गुजर-बसर करने का ही विकल्प बाकी रह गया है।

इन बस्तियों के फैलाव ने जहां बीबीएन में सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाया है, वहीं साफ-सफाई और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हालात बद से बदतर हुए हैं। इन झुग्गियों में न शौचालयों की व्यवस्था है, न सुचारू पेयजल आपूर्ति और न ही   अन्य मूलभूत सुविधाएं। झुग्गियों में लगे कचरे के ढेर बीमारियों को खुला न्योता देते दिखते हैं।

बेबसी में कर रहे जीवनयापन

यही नहीं आगजनी की सूरत में भी क्षेत्र की झुग्गी-झोंपडि़यों की स्थिति संवेदनशील बनी रहती है, बीबीएनडीए ने लो कास्ट हाउसिंग का विकल्प झुग्गियों के मेकओवर के लिए दिया है, लेकिन अभी भी यह हकीकत से कोसों दूर है। दरअसल बीबीएन के उद्योगों की रीढ़ माने जाने वाले प्रवासी श्रमिक आशियानों के लिए सही जगह न होने के कारण बेबसी का जीवन जीने को मजबूर हैं।

दो लाख प्रवासी कामगार

एक दशक में बीबीएन की आबादी करीब पांच लाख तक जा पहुंची है। साल 2002 में बीबीएन की जनसंख्या करीब डेढ़ लाख के करीब थी। औद्योगिकीकरण के दौरान बीबीएन में उद्योगों की स्थापना के साथ-साथ इनमें काम करने के लिए बाहरी राज्यों के लोगों ने भी खासी तादाद में हिमाचल के इस सीमांत क्षेत्र का रुख किया। बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ में स्थापित उद्योगों में देश के तकरीबन हर राज्य के लोग कार्यरत हैं। यहां प्रवासी कामगारों की तादाद दो लाख के करीब है।

हर दूसरे अपराध में शामिल

बीबीएन में रोजगार की तलाश में आने वाले प्रवासी कामगार अब संगीन जुर्मों के पन्ने लिखने लगे हैं। हालात ये हैं कि हर दूसरे अपराध में प्रवासियों की संलिप्तता सामने आने लगी है।  बीबीएन में अढ़ाई हजार से ज्यादा उद्योग स्थापित हैं, इनमें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर दो लाख के करीब प्रवासी कार्यरत हैं, लेकिन पंजीकरण मात्र 60 हजार का ही हुआ है। पंजीकरण की मुहिम आगे नहीं बढ़ पाती।  आरोप ये भी लगते रहे हैं कि सीमा से सटे होने से इस क्षेत्र में प्रवासी लोग घटना को अंजाम देकर भाग जाते हैं। औद्योगिक क्षेत्र बीबीएन में प्रवासी जहां उद्योगों की रीढ़ बने हैं, वहीं वे यहां अपराधों के ग्राफ में उछाल की वजह भी बनते जा रहे हैं।

मैली-कुचैली बस्तियां बीमारियों का अड्डा

प्रवासी मजदूरों की बस्तियां सबसे बड़ी परेशानी का सबब इसलिए बनती जा रही हैं क्योंकि इन बस्तियों में सफाई नहीं होती। इन बस्तियों के अवैध के होने कारण बिजली-पानी की भी व्यवस्था नहीं होती। खुले में शौच और गंदे पानी का इस्तेमाल करना इन मजदूरों की मजबूरी होती है। इसके चलते ये मजदूर कई गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। कैंसर, एचआईवी पॉजिटिव और डेंगू जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियां इन्हीं बस्तियों में अपना ठिकाना बनाती है।

गुटखा-खैनी का प्रचलन बढ़ा…

वर्ष 2003 के बाद से ही प्रदेश के स्कूली बच्चों के साथ-साथ युवकों में गुटखा-खैनी का प्रचलन बढ़ा है। जानकार बताते हैं कि प्रवासी मजदूरों की लगातार बढ़ती आमद से छोटी दुकानों, चाय के ढाबों में गुटखा-खैनी की खपत इसी वर्ग ने बढ़ाई। इन्हीं की देखादेखी प्रदेश के युवा व स्कूली बच्चे भी इस सस्ते व खतरनाक नशे की चपेट में आते रहे हैं। अब यह लत कितनी बढ़ चुकी है, यह सभी के सामने है।

ओरल कैंसर की चपेट में तबका

दंत स्वास्थ्य विभाग हिमाचल प्रदेश प्रोग्राम आफिसर डा. कंवलजीत के मुताबिक उन्होंने एक सर्वे किया। इस सर्वे में पाया गया कि प्रवासी ओरल कैंसर की समस्या से सबसे अधिक पीडि़त हैं। यह सर्वे बद्दी, नालागढ़ समेत अन्य बस्तियों में किया गया।

अब बन रहे होस्टल

हिमाचल में प्रवासी मजदूरों की बड़ी फौज जमा हो गई है। इनमें नेपाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और राजस्थान के मजदूरों की संख्या काफी अधिक है। एक अनुमान के मुताबिक इन प्रवासियों में से 50 फीसदी वर्किंग लेबर है जबकि बाकी के 50 फीसदी या तो बच्चे हैं या बुजुर्ग। इन प्रवासी मजदूरों के लिए स्थायी ठिकानों की व्यवस्था अभी तक नहीं की गई है।  बस्तियों में रहने वाले मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या रहने का सही ठिकाना न होना है। इस समस्या का हल के लिए लेबर होस्टल का निर्माण किया जा रहा है। इसमें से ऊना के बलैहड़ में होस्टल बनकर तैयार हो चुका है, जबकि नालागढ़ में कार्य प्रगति पर है। चंबा के होली और बद्दी में होस्टल का निर्माण प्रस्तावित है। इसके अलावा कुछ छोटे होस्टल निकायों के अधीन हैं।

स्लम एरिया का होगा सर्वे

शहरी विकास विभाग हिमाचल प्रदेश में शहरी क्षेत्रों में स्लम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का अलग डाटा तैयार कर रहा है, ताकि शहरों को स्लम फ्री करने के लिए योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो सके। वर्तमान में प्रदेश के दस जिला मुख्यालयों में यह सर्वे चल रहा है। अभी प्रदेश में स्लम क्षेत्रों में कितने लोग रहते हैं, इसका कोई सटीक डाटा तैयार नहीं हो पाया है। इसलिए अब यह सर्वे होगा। इस सर्वे में स्लम क्षेत्रों की पहचान कर उनमें रहने वाले लोगों का डाटा तैयार किया जाएगा।

सूत्रधार

सुनील शर्मा

जितेंद्र कंवर

विपिन शर्मा

शकील कुरैशी

खुशहाल सिंह

अंजना ठाकुर

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