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विचार


बजट खींचे व्यवस्थित शिमला की रूपरेखा

( सतपाल  लेखक, एचपीयू में शोधार्थी हैं )

राजधानी छोटी-छोटी आपदाओं से निपटने में भी सक्षम नहीं है, क्योंकि बर्फबारी, बरसात तो ऐसी आपदाएं है जो निश्चित रूप से आनी ही हैं। शहर के लिए योजना तैयार करने में हमसे कहीं न कहीं चूक हुई है। शिमला में भवनों का निर्माण ऐसी जगहों पर भी हो रहा है, जहां कभी आपदा आ जाए तो लाखों लोगों का जीवन दांव पर लग सकता हैं…

पहाड़ों की रानी कहा जाने वाला शिमला शहर हिमाचल प्रदेश की कोख में बसा एक सुंदर स्थल है। इसकी प्राकृतिक सुंदरता व भौगोलिक अनुकूलता के चर्चे पूरे विश्व में हैं। इसी विशिष्ट भौगोलिक विशेषता को ध्यान में रखते हुए ही 1864 में ब्रिटिश हुकूमत ने शिमला को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया था। तत्पश्चात एक छोटे से पहाड़ी क्षेत्र को ब्रिटिश हुकूमत ने हकीकत में पहाड़ों की रानी बना दिया। विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित शिमला-कालका रेल मार्ग, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का विशालकाय भवन, गार्टन कैसल, रेलवे बिल्डिंग, गेयटी थियेटर व टाउन हॉल जैसे अनेकों भवनों का निर्माण किया। इसके अलावा कालका से शिमला तक रेल मार्ग को बिछाने में भी सफलता प्राप्त की। वर्तमान में आजादी के छह दशक बीत जाने के बाद हम शिमला से अन्य क्षेत्रों तक रेल मार्ग पहुंचाने में विफल रहे हैं। रही इन ऐतिहासिक इमारतों की बात, तो इनको संरक्षित करने में भी हमारे पसीने छूट गए हैं। गार्टन कैसल का पिछले वर्ष जल जाना इस बात की पुष्टि करता है। इन इमारतों का ऐतिहासिक महत्त्व इसलिए नहीं है, क्योंकि इनको अंग्रेजी हुकूमत ने बनाया है, परंतु हमारे पूर्वजों ने बंधुआ मजदूरी करके अपने खून-पसीने से इनको बनाया है। पहाड़ों की रानी शिमला हिमाचल प्रदेश का सबसे पुराना नगर निगम है तथा पिछले वर्ष तक इसको प्रदेश का एक मात्र नगर निगम होने का गौरव भी प्राप्त था। धर्मशाला को नगर निगम का दर्जा मिलने से यह ताज भी छिन गया। साथ ही साथ स्मार्ट सिटी परियोजना में नामांकित होने से भी इसे वंचित रहना पड़ा। स्मार्ट सिटी परियोजना में भी धर्मशाला ने बाजी मार ली, क्योंकि धर्मशाला भारत सरकार द्वारा तय किए गए मानकों व मानदंडों पर उत्तीर्ण हुआ, परंतु पहाड़ों की रानी शिमला फिसड्डी साबित हुई। वर्तमान समय की अगर बात करें तो शिमला शहर में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। आज प्रदेश के इस ऐतिहासिक शहर में आधारभूत सुविधाओं का अभाव देखने को मिल रहा है। पूरा शहर पानी की किल्लत से जूझ रहा है।

पिछले दिनों बर्फबारी से तो हालात बद से बदतर होते दिखे। बर्फबारी होने के लगभग तीन सप्ताह बीत जाने के बाद भी आईपीएच महकमा व नगर निगम पानी की सुचारू आपूर्ति में असफल थे। बिजली की आपूर्ति भी कई दिनों तक बाधित रही, जिसके चलते लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इसका मतलब यह हुआ कि अभी हम छोटी-छोटी आपदाओं से निपटने में सक्षम नहीं हैं, क्योंकि बर्फबारी, बरसात तो ऐसी आपदाएं है जो निश्चित रूप से आनी ही हैं। अतः शहर के लिए योजना तैयार करने में हमसे कहीं न कहीं चूक हुई है। वैसे भी शिमला नगर में भवनों का निर्माण ऐसी जगहों पर भी हो रहा है, जहां कभी भी आपदा आ जाए तो लाखों लोगों के जीवन दांव पर लग सकते हैं। वर्तमान में शहर की जनसंख्या लगभग दो लाख के भी ऊपर है। ऐसे में मुसीबतों का होना लाजिमी है। वैसे भी बरसात हो या बर्फबारी, दोनों अवस्थाओं में पानी के स्रोत या तो जाम हो जाते हैं या गंदे हो जाते हैं और गर्मी में तो सूख भी जाते हैं। ऐसे में शहर में पानी की किल्लत का होना आम सी बात है। ऐसे में नगर नियोजन करते समय हमें जितने भी भवन शहर में बन रहे थे, तब सबके लिए वर्षा के जल संरक्षण की शर्त आवश्यक करनी चाहिए थी। जब तक कोई भी भवन निर्माता अपने भवन में वर्षा के जल को संरक्षित करने का प्रावधान नहीं करेगा, तब तक उस भवन का नक्शा पास नहीं किया जाना चाहिए। कहीं न कहीं शिमला शहर में प्रशासन की चूक रही होगी, जिससे कि हम समस्याओं को पहले ही नहीं भांप पाए। इसके चलते आज सरकार शिमला शहर को बेहतर बनाने के लिए लोगों से अखबारों के माध्यम से सुझाव मांगने पर मजबूर है।

अगर हम ब्रिटिश काल में निर्मित भवनों को देखेंगे, तो उन भवनों में वर्षा के जल को संरक्षित करने की व्यवस्था है, परंतु हमने उनसे भी सीख नहीं ली। इसका खामियाजा आज शिमला शहर की जनता भुगत रही है। अभी भी हमारे पास समय है और समय रहते ही हमें शिमला शहर में ही नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश के सभी छोटे-बड़े कस्बों में वर्षा के पानी के संग्रहण व उसकी उपयोगिता के बारे में अवगत करवाना होगा। सबसे गहराई से सोचने वाली बात यह है कि केवल लोगों को जागरूक कराने मात्र से ही क्या वर्षा के जल को संग्रहीत करना शुरू कर देंगे। ऐसा केवल पांच प्रतिशत लोग ही करेंगे और भारत में प्रदर्शनकारी प्रभाव ज्यादा है तो पांच प्रतिशत देखादेखी में कर देंगे, परंतु बाकी के बचे हुए नब्बे प्रतिशत लोग तभी करेंगे, अगर कोई सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाए। वर्षा के जल संरक्षण के लिए हमें कुछ कठोर कदम उठाने ही होंगे। सरकार चाहे तो गरीब तबके के लोगों को इस कार्य के लिए विशेष आर्थिक सहायता प्रदान कर सकती है, जिससे निकट भविष्य में होने वाली जल की तंगी से निपटा जा सके। बरसात में वर्षा का पानी मुसीबत में लाभकारी सिद्ध होगा तथा बर्फबारी के समय बर्फ यह काम पूरा कर देगी। ठीक इसी तरह शिमला शहर व प्रदेश के अन्य शहरों व छोटे-बड़े कस्बों की सारी समस्याएं एक-एक करके खोजनी होंगी और तभी हम एक सशक्त हिमाचल का लक्ष्य हासिल करने में सफल होंगे। इसके लिए सरकार को अब शिमला शहर या प्रदेश के दूसरे बड़े शहरों के नियोजन के लिए एक स्पष्ट नीति तैयार करनी होगी। इसकी शुरुआत इस बजट सत्र में करते हुए सरकार इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए बजट में भी धन का बंदोबस्त करे।

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