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विचार


व्याख्या की विकृतियों तले हम

महर्षि दयानंद सरस्वती जी  शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण देते हएु कहते हैं ‘राष्ट्र वा अश्वमेधः’ (13-1-6-3) इस आधार पर वह आगे लिखते हैं-‘राष्ट्र पालनमेव क्षत्रियाणाम् अश्वमेधाख्यो यज्ञो भवति, नार्श्व हत्वा तदड्ंगान होमकरणं चेतिः।’ अर्थात राष्ट्र का पालन करना ही क्षत्रियों का अश्वमेध यज्ञ है, घोड़े को मारकर उसके अंगों को होम करना नहीं। महर्षि जी सत्यार्थप्रकाश में अश्वमेध, गोमेध और नरमेध आदि के बारे में लिखते हैं ‘राष्ट्र वा अश्वमेधः।’ (शत. 13-6-3), अन्नं हि गौः। (शत. 4-3-1-25), अग्निर्वा अश्वः। (शत. 3-2-5), आज्यं मेधः। (शत. 13-3-6-3)। उन्होंने घोड़े गाय आदि पशु तथा मनुष्य मारकर होम करना कहीं नहीं लिखा।  राजा न्याय धर्म से प्रजा का पालन करे, यजमान और अग्नि में भी घी आदि का होम करे यही ‘अश्वमेध’ है। अन्न, इंद्रियां, किरण, पृथ्वी आदि को पवित्र रखना ‘गोमेध’ है, जब मनुष्य मर जाए तब उसके शरीर का विधिपूर्वक दाह करना ‘नरमेध’ कहलाता है। गो आदि शब्दों के रूढ़ अर्थों को आधार लेकर वेद मंत्रों के किए गए अर्थों का कुपरिणाम हमारे सामने है…

आज भी कुछ लोगों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास जाता है कि प्राचीनकाल में गोमांस आदि खाने का प्रचलन था तथा उन्होंने यहां तक कहने की धृष्टता की जाती है कि वैदिक-काल में ऋषि-मुनि तक भी गोमांस खाते थे और सोम नाम का मादक द्रव्य पीते थे। यह देखकर अत्यंत दुख होता है कि स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाने वाले कुछ तथाकथित विद्वान भी इस प्रकार की की अनर्गल बातों का प्रचार और प्रसार करते हैं। वास्तव में ऐसा दुःसाहस अज्ञानता के कारण ही किया जाता है, जिन लोगों ने अपनी संस्कृति और ग्रंथों का गहन अध्ययन नहीं किया है तथा किसी न किसी प्रकार प्राचीन भारतीय संस्कृति को हेय और हीन बताने का प्रयास करना ही जिनका लक्ष्य है, ऐसे लोग ही इस प्रकार के जुमले उठाया करते हैं। अपनी इन मान्यताओं का आधार वे पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ऐसे ग्रंथों को बनाते हैं, जो या तो प्रक्षिप्त अंश हैं या फिर उन जैसे ही अज्ञानी लोगों द्वारा रचे गए हैं। वेद आदि ग्रंथों के भी तथाकथित विद्वानों ने ऐसे भाष्य कर दिए कि कुछ लोगों को इस प्रकार की कुत्सित भावनाओं को उठाने का अवसर मिल जाता है, क्योंकि उनका स्वयं का चिंतन तो होता नहीं है। वेदों का कर्मकांड और रूढि़वाद का सहारा लेकर जो भाष्य कुछ विद्वानों ने किया तथा उसी के आधार पर और विकास वाद को सत्य सिद्ध करने एवं भारतीय संस्कृति को हेय बताने के उद्देश्य से पाश्चात्य लोगों ने जो कुछ लिखा, उसी को तथा कुछ प्रक्षिप्त अंशों को लेकर ऐसी बातें कही जाती हैं, जबकि वेदादि ग्रंथों में इस प्रकार का कोई विधान नहीं है। इस बात पर भी विचार करना अपेक्षित है कि यदि कालांतर में कभी किन्हीं लोगों ने इस प्रकार के अभक्ष्य पदार्थों का सेवन किया भी हो तो क्या उसे सबके लिए उपयोगी और प्रमाणित मान लिया जाए? हमें वेदों की मूल मानवतावादी विचारधारा को लेकर चलने की आवश्यकता है, जिसके आधार पर व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति हो सके तथा एक सार्वभौमिक मानव धर्म की स्थापना हो सके। हमारे लिए पूर्वजों की अच्छी बातें ही अनुकरणीय और आदर्श  होनी चाहिए और उन्हीं का प्रचार-प्रसार करने की जरूरत है। यदि ऐसी भावना व्यक्ति के मन में होगी तो वह केवल सतही बातों की चर्चा नहीं करेगा, बल्कि यदि उसे ऐसा कहीं लगता है तो वह सत्य ओर असत्य का निर्णय करने के लिए पूरी नहीं करेगा, बल्कि यदि उसे ऐसा कहीं लगता है।  इतिहास लेखक का उद्देश्य तह तक पहुंच कर सत्य का उद्घाटन करना ही होना चाहिए।  वेदों के बारे में भाष्यकारों से जो मुख्य रूप से भूल हुई है उसी के कारण वेदों के ऊपर इस प्रकार के मनमाने आरोप लगाए जाते रहे हैं। वेद परमात्मा द्वारा प्रदत्त सार्वभौमिक तथा निभ्रांत ज्ञान है। इसलिए महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने साफ शब्दों में कहा है कि या तो वेदन परमात्मा द्वारा प्रदत्त ज्ञान नहीं है और यदि परमात्मा द्वारा दिया गया ज्ञान है तो वेद में कोई बात ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव के विपरीत नहीं हो सकती है। इसलिए वे मंत्रों का ऐसा अर्थ नहीं किया जा सकता जो परमात्मा के सत्य, न्याय, निराकार, दया, पवित्रता और सर्वज्ञता आदि गुणों के विपरीत हो। वेद में इस प्रकार की कोई बात भी नहीं हो सकती है जो सृष्टि नियम के विरुद्ध हो। वेद मंत्रों के अर्थ ऐसे भी नहीं हो सकते हैं जो व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति में किसी प्रकार से बाधक हों। वेद परमात्मा का दिया हुआ नित्य ज्ञान है। इसलिए उसमें किसी प्रकार का अनित्य इतिहास आदि नहीं हो सकता है। वेद मंत्र पहले है तथा उसका विनियोग बाद में, इसलिए विनियोग के आधार पर मंत्रों का अर्थ नहीं किया जाना चाहिए,बल्कि मंत्र का स्वतंत्र और स्वाभाविक अर्थ किया जाना ही अपेक्षित है। वेद मंत्रों के व्याख्याता को संस्कृत का ज्ञाता तो होना ही चाहिए, मगर साथ ही उसे पूर्व प्रसंग का भी ध्यान रखना चाहिए। मंत्रों में आने वाले इंद्र आदि शब्दों का अर्थ उनके विशेषणों के आधार पर निश्चित किया जातना चाहिए न कि किसी काल्पनिक देवता के आधार पर। वेद का व्याख्याता तपस्वी, संयमी और परमात्मा के प्रति पूर्णरूप से श्रद्धालु होना चाहिए। वेद को पूरी तरह समझने के लिए वेद के शब्दों को रुढि़ न मानकर योगिक माना जाए तभी उसमें निहित ज्ञान-विज्ञान के बारे में हमें जानकारी मिल सकती है। ऋचाओं को तीन भागों में बांटा जा सकता है। परोक्ष, प्रत्यक्ष और आध्यात्म परक इसलिए तदनुसार ही उनके अर्थ भी किए जाने चाहिए। यदि इस प्रकार से वेद को समझा जाता तो किसी को आक्षेप लगाने का अवसर ही प्राप्त नहीं हो सकता।

वेद पर कलम चलाने वालों ने उपरोक्त बातों को ध्यान में नहीं रखा इसीलिए उन्होंने उक्ष्णों हि में पंचदश साकं पचतिं विंशतिम्…इदुभा कुक्षी पृणंति में विश्वस्मादिंद्र उत्तरः।। ऋग्वेद (10-86-14) वेद मंत्र का अनर्थ करते हुए लिखा कि मेरे लिए इंद्राणी द्वारा प्रेरित यज्ञकर्त्ता लोग पंद्र-बीस बैल मारकर पकाते हैं, जिन्हें खाकर मैं मोटा होता हूं। वे मेरी कुक्षिओं को सोम से भी भरते हैं। इसी तर्ज पर पाचात्य लोगों ने भी यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वैदिक लोग नशीला पेय पीते थे तथा मांस आदि का भक्षण करते थे। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस प्रकार के अनर्गल प्रसंग बिलकुल भी नहीं हैं। कुछ लोग ऋ. 1-24-12 से 15 तक के मंत्रों में ‘शुनःशेप’ शब्द को लेकर नरबलि प्रथा की चर्चा करते हैं, मगर निरूक्त के आधार पर महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेदों के समस्त शब्दों को योगिक बताया है। तदनुसार उन्होंने ‘शुनःशेप’ का अर्थ ‘अत्यंत ज्ञान वाले विद्या व्यवहार के लिए प्राप्त और परमेश्वर वा सूर्य’ किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस मंत्र में कहीं भी नरबलि आदि का उल्लेख नहीं है। अज्ञान और अविवेक के कारण लोगों ने वेद पर इस प्रकार के मिथ्यारोप लगाने की कुचेष्टा की है। इसी प्रकार योगिकवाद को न समझने के कारण गोमेध, अश्वमेध तथा नरमेध आदि यज्ञों के भी लोगों ने मनमाने अर्थ किए हैं।

यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है फिर भी यज्ञों में गौ, अश्व, बकरे और नरबलि की कल्पनाएं कैसे कर दी यह सोच कर ही आश्चर्य होता है। वास्तविकता यह है कि यज्ञ के बारे में जो भी शब्द आए हैं उनमें से किसी का भी अर्थ पशुबद्ध या हिंसा नहीं है बल्कि ‘अध्वर’ शब्द अहिंसा का ही सूचक है। यज्ञ कराने के लिए जिन लोगों की नियुक्ति की जाती है उनमें से एक का नाम ‘अध्वर्यु’ है जो यज्ञ को कायिक, वाचिक और मानसिक प्रकार की हिंसाओं से बचाता है। यज्ञ में गोवध की कल्पना करना ही अप्रासंगिक और निंदनीय है क्योंकि गाय को तो ‘अघ्नया’ कहा गया अर्थात किसी भी हालत में न मारने योग्य। इसी प्रकार अश्वमेध यज्ञ के बारे में भी अज्ञानतावश ऐसा कह दिया जाता है कि इसमें अश्व की बलि दी जाती थी, मगर यजुर्वेद के बाइसवें से पच्चीसवें अध्याय तक अश्वमेध की चर्चा हुई है उसमें इस प्रकार की अनर्गल बात बिलकुल ही नहीं कही गई है।  महर्षि दयानंद सरस्वती जी  शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण देते हएु कहते हैं ‘राष्ट्र वा अश्वमेधः’ (13-1-6-3) इस आधार पर वे आगे लिखते हैं-‘राष्ट्र पालनमेव क्षत्रियाणाम् अश्वमेधाख्यो यज्ञो भवति, नार्श्व हत्वा तदड्ंगान होमकरणं चेतिः।’ अर्थात राष्ट्र का पालन करना ही क्षत्रियों का अश्वमेध यज्ञ है, घोड़े को मारकर उसके अंगों को होम करना नहीं। महर्षि जी सत्यार्थप्रकाश में अश्वमेध, गोमेध और नरमेध आदि के बारे में लिखते हैं ‘राष्ट्र वा अश्वमेधः।’ (शत. 13-6-3), अन्नं हि गौः। (शत. 4-3-1-25), अग्निर्वा अश्वः। (शत. 3-2-5), आज्यं मेधः। (शत. 13-3-6-3)। उन्होंने  घोड़े-गाय आदि पशु तथा मनुष्य मारकर होम करना कहीं नहीं लिखा।  राजा न्याय धर्म से प्रजा का पालन करे, यजमान और अग्नि में भी घी आदि का होम करे, यही ‘अश्वमेध’ है। अन्न, इंद्रियां, किरण, पृथ्वी आदि को पवित्र रखना ‘गोमेध’ है, जब मनुष्य मर जाए तब उसके शरीर का विधिपूर्वक दाह करना ‘नरमेध’ कहलाता है। गो आदि शब्दों के रूढ़ अर्थों को आधार लेकर वेद मंत्रों के किए गए अर्थों का कुपरिणाम हमारे सामने है। इसी प्रकार के अन्य और भी अनेक शब्द हैं, जिनके बारे में लोगों को बहुत भ्रांतियां हैं। ऋग्वेद के नौवें अध्याय के अनेक सूक्तों में सोमलता नामक एक औषधि का वर्णन आता है, जिसे कुछ लोगों ने अज्ञानतावश नशीले पदार्थों के रूप में प्रचारित किया है। यहां पर इस सोम का नाम वृषभ भी बताया गया है।

सूर्य को भी गौ कहते हैं तथा सूर्य की एक किरण जो चंद्रमा में जाकर प्रकाशित होती है, उसे भी गौ कहा जाता है। गौ के अर्थ और भी बहुत से हैं अतः अर्थ के अनुकूल ही शब्द का अर्थ किया जाना चाहिए। ऋग्वेद (10-87-16) में कहा गया है कि जो राक्षस मनुष्य का, घोड़े का और गाय का मांस खाता हो तथा दूध की चोरी करता हो, उसके सिर को कुचल देना चाहिए। अथर्व (8-3-16) में राजा को आदेश दिया गया है कि यदि प्रजापीड़क लोग गौ आदि पशुओं को विष देकर मार डालें और दुष्ट आचरण वाले लोग गाय को काटें, तब सबका प्रेरक राजा इनका सर्वस्व लेकर अपने राज्य से बाहर निकाल दें। यजुर्वेद (13-49) में राजा को आदेश है कि वह कानून बनाकर गउओं, बैलों, भैंसों तथा बछड़ों आदि का वध बंद करा दे। इसके बावजूद जो गऊ की हत्या करे उसे यजुर्वेद (30-18) मृत्यु दंड दिया जाए।

 -आचार्य भगवान देव ‘चैतन्य’ महादेव, सुंदरनगर, जिला मंडी हिप्र

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