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वैचारिक लेख


वैचारिक उतावलेपन का दौर

पीके खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

पीके खुरानाऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी भी राजनीतिक दल से या राजनीतिक विचारधारा से नहीं जुड़े हैं। ऐसे लोग कुछ मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करते हैं और कुछ मुद्दों पर उनका विरोध करते हैं। वे भारत के ऐसे नागरिक हैं, जिनकी विचारधारा स्वतंत्र है। इनकी व्यथा यह है कि गैर भाजपा दलों के समर्थक उन्हें ‘भक्त’ कहकर उनका अपमान कर रहे हैं और भाजपा समर्थक लोग उन्हें ‘देशद्रोही’ कहकर दुत्कार रहे हैं। यह उतावलेपन का ऐसा दौर है, जहां कोई यह नहीं समझना चाहता कि जीवन सिर्फ श्वेत-श्याम ही नहीं है, इसमें और भी बहुत से रंग हैं…

एक जमाना था जब मीडिया का मतलब होता था अखबार, टीवी और सरकारी रेडियो। पत्रकार होने के लिए आपको इनमें से किसी एक से जुड़े होने की आवश्यकता होती थी। पारस्परिक संपर्क के लिए चिट्ठी और टेलीफोन होते थे। फिर इनमें फैक्स जुड़ा और बाद में इंटरनेट जुड़ गया। इंटरनेट जुड़ने के बाद तो तकनीकी क्रांति ने दुनिया ही बदल दी। ई-मेल आया और उसके बाद पारस्परिक संपर्क के साधनों का ऐसा मेला उमड़ा कि लगातार कई मील पत्थर जुड़ते चले गए। व्हाट्सऐप तथा अन्य मैसेंजर्स ने अलग तरह की क्रांति की शुरुआत की। आज हम देश-विदेश में बैठे मित्रों-रिश्तेदारों से मुफ्त के भाव संदेशों का आदान-प्रदान कर लेते हैं। इंटरनेट ने पारस्परिक संपर्क के तरीकों को ही नहीं, बल्कि मीडिया की परिभाषा को भी बदल दिया। आज यू-ट्यूब, पिनटेरेस्ट, फेसबुक, ट्विटर, टेलीग्राम, हाइक, व्हाट्सऐप, फेसबुक मैसेंजर कई सोशल मीडिया टूल हैं, जो पारंपरिक मीडिया को धकिया कर मीडिया की श्रेणी में आ गए हैं। ट्विटर अपने आप में तो मीडियम है ही, ट्विटर ने सेलेब्रिटीज को भी मीडिया बना दिया है। इसे समझने के लिए यह कहना ही काफी है कि पहले जब कभी शाहरुख खान जैसे बड़े सितारे अपनी फिल्मों की प्रोमोशन करते थे, तो वे फिल्मफेयर जैसी किसी बड़ी पत्रिका का सहारा लेते थे। कुछ वर्ष पूर्व से यह रुख एकदम बदल गया, जब फेमिना ने मिस इंडिया सौंदर्य प्रतियोगिता के लिए शाहरुख खान के ट्विटर हैंडल का सहारा लिया।

प्रसिद्ध राजनीतिज्ञों, समाजसेवकों, फिल्मी सितारों आदि के ट्विटर अकाउंट पर फालोअर्स की बढ़ती संख्या ने सेलेब्रिटीज को भी मीडिया बना दिया है। आज सोशल मीडिया भी मीडिया है और इसकी ताकत को नकारा नहीं जा सकता। सोशल मीडिया के संदेश वायरल हो जाते हैं, तो सच्ची-झूठी खबरें जंगल की आग की तरह फैलती हैं। एकाध बार ऐसा भी हुआ है कि किसी एक संदेश के वायरल हो जाने से दंगा तक हो गया है। सोशल मीडिया पर किसी का नियंत्रण नहीं है और सोशल मीडिया के माध्यम से भेजे जाने वाले संदेशों की प्रमाणिकता की कोई गारंटी नहीं है। चतुराईपूर्वक लिखे गए असत्य संदेश, फोटोशाप की गई तस्वीरें और सच और झूठ के मिश्रण से बनाई गई खबरें, अपमानजनक चुटकुले सोशल मीडिया के अभिन्न अंग बन गए हैं। यदि एक झूठ को हजार बार बोला जाए तो वह सच बन जाता है या यूं कहिए कि सच लगने लगता है। सोशल मीडिया के माध्यम से किसी एक झूठ को लाखों लोगों में फैलाना भी मिनटों का काम है, जिससे झूठ भी सच बन जाता है। समस्या यह है कि समाज का एक वर्ग योजनाबद्ध ढंग से रणनीति के तौर पर सोशल मीडिया की इस खामी का फायदा उठा रहा है। समाज के इस वर्ग में राजनीतिज्ञ, राजनीतिक दल, कारपोरेट कंपनियां आदि सब शामिल हो गए हैं जो झूठ और सच के मिश्रण से बने हुए संदेश बिना किसी रोकटोक में समाज पर थोप रहे हैं।

चिंता की बात यह है कि झूठ और सच के जिस मिश्रण से संदेश और अपमानजनक चुटकुले किसी एक व्यक्ति, दल, वर्ग अथवा कंपनी के विरुद्ध जनमत बनाने के लिए भेजे जा रहे हैं जो भारतीय जनमानस में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। ये संदेश किसी धर्म विशेष की एकता के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया के माध्यम से विभिन्न धर्म के लोगों को बांटने का काम किया जा रहा है। सर्वणों और पिछड़े वर्ग के बीच वैमनस्य बढ़ाने के प्रयत्न तेज हो गए हैं। भाजपा और गैर-भाजपा दलों के नाम पर बंटवारा हो रहा है। समाज का एक शक्तिशाली वर्ग राजनीतिक समर्थन के दम पर शेष सब को देशद्रोही भी कह रहा है और नितांत अपमानजनक भाषा-शैली का प्रयोग कर रहा है। यह सही है कि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग सुविधाभोगी हो गया है और कई बार उसने देशहित की भी उपेक्षा की है। यह भी सही है कि कुछ लोग अलगाववादियों का समर्थन करते हैं। यह भी सही है कि कांग्रेस के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के कारण जनता ने उसे नकार दिया है। लेकिन यह भी सही है कि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो न कांग्रेसी हैं, न अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, न सुविधाभोगी हैं और न ही संघ की उग्र हिंदुवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं। हां, ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी भी राजनीतिक दल से या राजनीतिक विचारधारा से नहीं जुड़े हैं। ऐसे लोग चाहे कितने ही कम हों, पर हैं। और ऐसे लोग कुछ मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करते हैं और कुछ मुद्दों पर उनका विरोध करते हैं। वे न भाजपाई हैं न कांग्रेसी या विपक्षी। वे भारत के ऐसे नागरिक हैं, जिनकी विचारधारा स्वतंत्र है। ऐसे लोगों की व्यथा यह है कि गैर-भाजपा दलों के समर्थक उन्हें ‘भक्त’ कहकर उनका अपमान कर रहे हैं और भाजपा समर्थक लोग उन्हें ‘देशद्रोही’ कहकर दुत्कार रहे हैं। यह उतावलेपन का ऐसा दौर है, जहां कोई यह नहीं समझना चाहता कि जीवन सिर्फ श्वेत-श्याम ही नहीं है, इसमें और भी बहुत से रंग हैं।

आप भाजपा समर्थक या भाजपा विरोधी ही नहीं, बल्कि ‘भाजपा न्यूट्रल’ भी हो सकते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति सत्ता में आने के लिए या अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए रणनीति के रूप में कमजोर वर्ग को दबाने का काम करता है तो समाज का लाभ नहीं होता, समाज इससे बंटता ही है। बहुमत जब तानाशाही बन जाए तो वह खतरनाक हो जाता है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘व्हाई इंडिया नीड्स प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ में लेखक भानु धमीजा ने स्पष्ट किया है कि सन् 1937 में जब देश में विधानसभा चुनाव हुए और नेहरू-गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को बहुमत मिला तो नेहरू ने यही गलती की कि उन्होंने अल्मत में रह गए जिन्ना को कुछ भी देने से मना कर दिया। जिन्ना ने जब यह देखा कि वह संयुक्त भारत में बहुमत नहीं पा सकते तो उन्होंने अलग पाकिस्तान का राग छेड़ दिया। कांग्रेस की हर बात के विरोध की नीति अपना ली। तत्कालीन कांग्रेस द्वारा सब कुछ हड़प लेने का लालच ही पाकिस्तान के जन्म का कारण बना। आज मोदी भी यही कर रहे हैं। वे सब कुछ अकेले ही हड़प लेना चाहते हैं, चाहे इसके लिए किसी का सार्वजनिक अपमान करना पड़े, किसी का मजाक उड़ना पड़े, राजनीतिक दलों में जोड़-तोड़ करनी पड़े या कुछ भी और करना पड़े। वह किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं और अपने हर काम को वह देशभक्ति का जामा पहना देने में माहिर हैं। उनके भक्त भी उनके व अमित शाह के शब्दों को तोते की तरह रटते जा रहे हैं। विपक्ष को रौंदने और समाज को बांटने के इस काम में वह सच-झूठ और नैतिक-अनैतिक की परवाह किए बिना जीत का जश्न मनाते चल रहे हैं और इस सच की उपेक्षा कर रहे हैं कि इससे समाज बंट रहा है, लकीरें खिंच रही हैं और ये लकीरें इतनी गहरी होती जा रही हैं कि बाद में कभी इनको पाटना आसान नहीं होगा। समय आ गया है कि हम इस तरफ ध्यान दें कि हम उतावले न हों, किसी दूसरे पर कोई लेबल चस्पां न करें और अपनी एकता को छिन्न-भिन्न होने से बचा लें। इसी में समाज और देश दोनों का भला है।

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