Divya Himachal Logo Sep 25th, 2017

वैचारिक लेख


बायो फ्यूल की सीमाएं

डा. भरत झुनझुनवाला

लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

डा. भरत झुनझुनवालासारांश यह है कि बीज आधारित बायो फ्यूल, गन्ने से बना इथेनाल, हाइड्रो पावर तथा यूरेनियम-आधारित परमाणु ऊर्जा हमारे लिए उपयुक्त नहीं है। कोयला अल्प समय में उपयोगी हो सकता है। देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सौर ऊर्जा, सेलूलोज आधारित बायो फ्यूल और थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा स्वीकार्य विकल्प हैं। इनकी रिसर्च को बढ़ावा देना चाहिए। अल्प समय में कोयले का उपयोग करना चाहिए। सौर ऊर्जा के विस्तार को सरकार ने कई कारगर कदम उठाए हैं जिनका स्वागत है। शुगर लॉबी के दबाव में इथेनाल के उत्पादन को बढ़ावा देकर देश की खाद्य सुरक्षा को नष्ट नहीं करना चाहिए…

परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी ने हाल में पुणे में कृषि पदार्थों जैसे भूसा, मोलेसिस अथवा जटरोपा के बीज से ईंधन तेल बनाने के कारखाने का उद्घाटन किया है। पूर्व में भी उन्होंने कहा है कि हमें देश में बायो फ्यूल का उत्पादन बढ़ाना चाहिए ताकि हम आयातित ईंधन तेल पर अपनी निर्भरता कम कर सकें। श्री गडकरी के बयान का स्वागत है। वनस्पतियों से उत्पादित ईंधन को बायो फ्यूल कहा जाता है। यह तीन प्रकार की वनस्पतियों से बनाया जाता है : एक, जहरीले फल जैसे जटरोपा से; दो, खाद्यान्न जैसे सोयाबीन से; एवं तीन, गन्ने के रस से। जटरोपा को रतनजोत नाम से भी जाना जाता है। डूंगरपुर के एक मित्र ने इसे दो एकड़ बंजर भूमि पर लगाया है। वह प्रसन्न हैं चूंकि इस भूमि पर पहले केवल घास होती थी, लेकिन जटरोपा के उत्पादन को बढ़ावा देने में समस्या है कि उत्पादक द्वारा बायो डीजल की बिक्री सीधे करने पर प्रतिबंध है। कोलकाता की एक कंपनी द्वारा बायो डीजल कोलकाता ट्राम कंपनी को सीधे बेचा जा रहा था। पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा आपत्ति जताने के कारण ट्राम कंपनी ने यह खरीद बंद कर दी और बायो डीजल की फैक्टरी भी बंद हो गई। बायो डीजल की फैक्टरी के लिए यह अनिवार्य है कि वह उत्पादित माल को तेल कंपनी को बेचे। तेल कंपनी इसे डीजल में मिलाकर बेचती है। इस बिक्री पर तेल कंपनी टैक्स अदा करती है। वर्तमान में बायो डीजल की उत्पादन लागत लगभग 35 रुपए लीटर है। डीजल के बाजार भाव से यह कम है, इसलिए उत्पादक इसे सीधे उपभोक्ता को बेचकर लाभ कमा सकता है। परंतु तेल कंपनियों द्वारा बायो डीजल का दाम लगभग 25 रुपए प्रति लीटर दिया जा रहा है, चूंकि इन्हें इस पर टैक्स देना पड़ता है। अतः बायो डीजल की सीधी बिक्री की छूट देने से किसानों और फैक्टरियों के लिए बायो डीजल का उत्पादन करना लाभप्रद हो जाएगा। अतः सीधे बिक्री की छूट देने पर सरकार को विचार करना चाहिए।

जटरोपा से बायो डीजल का उत्पादन वर्तमान में केवल बीज से हो रहा है। पौधे के तने में सेलूलोज होता है जो कि ज्वलनशील है। परंतु सेलूलोज को ईंधन में परिवर्तित करने की तकनीक फिलहाल विकसित नहीं हुई है, यद्यपि इस पर वैश्विक स्तर पर शोध चल रहा है। सेलूलोज से उत्पादन हो जाए तो बायो डीजल बनाने में लागत कम आएगी। अतएव बायो डीजल के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सरकार को इस रिसर्च को बढ़ावा देना चाहिए। इस समस्या का समाधान हो जाए तो भी दूसरी समस्या बनी रहती है। जटरोपा द्वारा सूर्य की केवल 2 प्रतिशत ऊर्जा को बायो डीजल में परिवर्तित किया जाता है। तुलना में सोलर पैनल से 15 से 25 प्रतिशत ऊर्जा का संग्रह किया जा सकता है। अतः देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बायो डीजल की तुलना में सोलर पैनल जादा कारगर साबित होंगे। जटरोपा के स्थान पर सोलर पैनल लगाए जाएं तो ऊर्जा का उत्पादन अधिक होगा। इस ऊर्जा को बैटरी में संग्रह करके ईंधन तेल के स्थान पर उपयोग किया जा सकता है। बिजली से चलने वाली कारों का उत्पादन शुरू हो चुका है। इस विकल्प को देखते हुए सेलूलोज से ईंधन बनाने की सफलता में भी संदेह उत्पन्न होता है। बायो फ्यूल का दूसरा स्रोत खाद्यान्न है। अमरीका में उत्पादित लगभग 40 प्रतिशत मक्के का उपयोग बायो फ्यूल बनाने में किया जा रहा है। बायो फ्यूल का यह स्रोत हमारे लिए उपयोगी नहीं है, चूंकि हम पहले ही खाद्य तेलों के लिए आयातों पर निर्भर हैं। बायो फ्यूल बनाने के लिए यदि सोयाबीन की खेती की जाएगी तो खाद्यान्न और खाद्य तेलों के उत्पादन में गिरावट आएगी। खाद्य तेलों के लिए आयातों पर हमारी निर्भरता बढ़ेगी। बायो फ्यूल का तीसरा स्रोत गन्ना है। चीनी बनाने की प्रक्रिया में मोलेसिस का उत्पादन होता है। इसमें कचड़े के साथ कुछ मात्रा में चीनी भी विद्यमान रहती है। इस बची हुई चीनी से इथेनाल नामक ईंधन बनाया जाता है। लेकिन देश में उपलब्ध मोलेसिस की मात्रा सीमित है। इथेनाल का उत्पादन बढ़ाने के लिए गन्ने के रस का उपयोग चीनी बनाने के स्थान पर सीधे इथेनाल बनाने के लिए किया जा सकता है।

परंतु यहां भी खाद्यान्न का संकट है। गन्ने के उत्पादन के लिए अधिक भूमि का उपयोग करने से गेहूं और चावल का उत्पादन प्रभावित होगा। जानकार बताते हैं कि नागपुर में चीनी मिलों की एक लॉबी है। इस लॉबी द्वारा जोर दिया जा रहा है कि सरकार द्वारा इथेनाल को बढ़ावा दिया जाए। इथेनाल की मांग बढ़ेगी तो इनका व्यापार और प्रॉफिट बढ़ेगा। इस लॉबी को इस बात की चिंता नहीं है कि इथेनाल के उत्पादन से देश की खाद्य सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा। श्री गडकरी को इस लॉबी से सचेत रहना चाहिए। उनकी दृष्टि देश के सर्वांगीण हित को साधने की होनी चाहिए। चीनी मिलों के प्रॉफिट के लिए देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाना चाहिए। बात बची ईंधन तेल के लिए हमारी आयातों की निर्भरता की। बायो फ्यूल की सीमाओं को देखते हुए हमें ऊर्जा के दूसरे स्रोतों पर ध्यान देना होगा। दूसरा स्रोत कोयले का है। अपने देश में कोयले का भंडार सीमित है। अनुमान है कि डेढ़ सौ साल में हमारे भंडार समाप्त हो जाएंगे। इसके अतिरिक्त अच्छी क्वालिटी का कोयला निकाल लेने के बाद शेष की क्वालिटी नरम होगी। इसमें धूल मिट्टी ज्यादा होगी। घटिया कोयले से ऊर्जा के उत्पादन में लागत ज्यादा आएगी। लेकिन अगले 100 वर्षों में ऊर्जा के अन्य स्रोतों का विकास हो सकता है। हमारे कोयले के भंडार समाप्त होने पर इन नए स्रोतों को अपनाया जा सकता है। इस रिस्क को उठाकर वर्तमान में कोयले से ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है। यहां समस्या कार्बन उत्सर्जन की है। इसके लिए प्राथमिकता देते हुए खेतों की मेंडों पर वृक्षारोपण एवं जंगलों का संरक्षण करना चाहिए।

ऊर्जा का तीसरा स्रोत हाइड्रो पावर का है। इसके तमाम पर्यावरणीय दुष्प्रभावों एवं जनविरोधी चरित्र को देखते हुए वर्तमान में लगी इकाइयों को बंद करने अथवा इनके डिजाइन में परिवर्तन करने की जरूरत है। ऊर्जा का चौथा स्रोत यूरेनियम-आधारित परमाणु ऊर्जा है। कोयले की तुलना में यह ‘साफ’ है बशर्ते इन संयंत्रों को रिहायशी इलाकों से दूर लगाया जाए। लेकिन अपने देश में यूरेनियम कम ही पाया जाता है, अतः आयातों पर निर्भरता बनी रहती है। ऊर्जा का अंतिम वैकल्पिक स्रोत थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा का है। अपने देश में थोरियम के अपार भंडार उपलब्ध हैं। लेकिन थोरियम से परमाणु ऊर्जा बनाने की तकनीक अभी विकसित नहीं हुई है। चीन द्वारा विश्व का पहला थोरियम-आधारित ऊर्जा संयंत्र बनाया जा रहा है। इस दिशा में हम बहुत पीछे हैं। सारांश यह है कि बीज आधारित बायो फ्यूल, गन्ने से बना इथेनाल, हाइड्रो पावर तथा यूरेनियम-आधारित परमाणु ऊर्जा हमारे लिए उपयुक्त नहीं है। कोयला अल्प समय में उपयोगी हो सकता है। देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सौर ऊर्जा, सेलूलोज आधारित बायो फ्यूल और थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा स्वीकार्य विकल्प हैं। इनकी रिसर्च को बढ़ावा देना चाहिए। अल्प समय में कोयले का उपयोग करना चाहिए। सौर ऊर्जा के विस्तार को सरकार ने कई कारगर कदम उठाए हैं जिनका स्वागत है। शुगर लॉबी के दबाव में इथेनाल के उत्पादन को बढ़ावा देकर देश की खाद्य सुरक्षा को नष्ट नहीं करना चाहिए।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

September 19th, 2017

 
 

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