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आतंकी लपटों में झुलसता जम्मू-कश्मीर

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं हिंसा से थक चुके आम लोग केवल विकास चाहते हैं। अगर वहां विकास हुआ होता तो कुछ युवा आतंकवाद की ओर आकर्षित न हुए होते। कश्मीरी चाहते हैं कि घाटी में फिर खूब सैलानी आएं, तभी वहां विकास आ पाएगा। आम कश्मीरी…

नए फलों के परीक्षण को चाहिए विशेष विभाग

डा. चिरंजीत परमार लेखक, वरिष्ठ फल वैज्ञानिक हैं हमें ठीक तरीके से नए फलों और नई किस्मों का चुनाव करना चाहिए, जिसकी आज बहुत आवश्यकता है।  इसके लिए प्रदेश में तीन-चार अलग ही अनुसंधान केंद्र स्थापित करने पड़ेंगे, तभी यह काम वैज्ञानिक तरीके से…

थरूर की दृष्टि में रोजगार का अर्थ

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं शशि थरूर के मित्र और कांग्रेस के अर्थशास्त्री पी चिदंबरम तो उनसे भी दो कदम आगे जाते हैं। उनका कहना है कि यदि अपनी रेहड़ी पर पकौड़े तल कर बेचना भी रोजगार की श्रेणी में आता है, तब तो भिक्षा…

गोवंश का सहारा बनें मंदिर ट्रस्ट

रणजीत सिंह राणा लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता हैं वेदों में गोमाता को विश्वरूपा एवं विश्ववंदया बताया गया है। यह हमारे जीवन की सर्वस्व निधि हैं। भारतीय पुरातन परंपरा, संस्कृति, सभ्यता, मर्यादा एवं धर्म की प्रतीक स्वरूप हैं। अनादि वैदिक सनातन धर्म…

बाल मन में कचरा भरता फास्ट फूड

अदित कंसल लेखक, नालागढ़ से हैं फास्ट फूड विद्यार्थियों में मानसिक प्रदूषण पैदा कर, उनकी मानसिक स्थिति अनियंत्रित कर रहा है। फास्ट फूड से विद्यार्थियों में आलस्य, ग्लानि व क्रोध बढ़ रहा है। छोटी-छोटी बातों पर लड़ना-झगड़ना, गाली-गलौज, नशे की…

राजस्थान चुनावों में भाजपा की हार बयां हुई ?

प्रो. एनके सिंह लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं राजस्थान उपचुनाव के परिणाम किसी मोहभंग का नतीजा हैं अथवा भाजपा के पतन की शुरुआत हो चुकी है, यह अगले कुछ महीनों में स्पष्ट हो जाएगा। कुछ लेखकों व मीडिया ने यह अवलोकन करना…

खेल प्रतिभाओं का संरक्षक बने बजट

भूपिंदर सिंह लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं सरकार को बजट में कुछ ऐसे वित्तीय प्रावधान करने चाहिएं कि बच्चे स्कूली स्तर पर पर्याप्त वजीफे से अपनी तैयारी करके केंद्र सरकार की योजनाओं के लिए चयनित हो सकें। कोशिश होनी चाहिए कि किसी खेल…

यथार्थ से कटी योजनाओं का हश्र

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं योजना बनाते समय जमीनी स्थिति को ध्यान में न रखने का परिणाम ऐसा ही होता है कि सरकार प्रचार करती रहती है और जनता माथा पीटती रहती है। मौजूदा सरकार की अधिकांश योजनाओं का यही हाल है। वह…

स्मार्ट गांव का खाका खींचे बजट

निधि शर्मा लेखिका, स्वतंत्र पत्रकार हैं गांव आधारित प्रदेश की अर्थव्यवस्था केसामने सबसे बड़ी चुनौती स्मार्ट गांव बनाने के लिए धन की व्यवस्था करना है। करीब 46 हजार करोड़ के कर्ज तले दबी प्रदेश सरकार स्मार्ट गांव की अवधारणा से ही आत्मनिर्भर…

पुरानी पेंशन योजना के पक्ष में खड़ी हो सरकार

अनुज कुमार आचार्य लेखक, बैजनाथ से हैं अंशदायी पेंशन योजना विधेयक को प्रदेश सरकार द्वारा 15 मई, 2003 से पुरानी पेंशन योजना के स्थान पर लागू तो कर दिया गया, लेकिन आजकल सेवानिवृत्त हो रहे सरकारी कर्मचारी इसी योजना की खामियों का खामियाजा भी…

अभी दूर है समावेशी विकास का लक्ष्य

ललित गर्ग लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं चालू वित्त वर्ष में आर्थिक क्षेत्र में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले, लेकिन इन सब स्थितियों के बावजूद मोदी एवं जेटली देश को स्थिरता की तरफ ले जाते दिखाई पड़ रहे हैं। लेकिन कटु सत्य यह भी है कि हमारा…

वित्तीय घाटा बढ़ने दीजिए

डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने के मंत्र के पीछे सोच थी कि मेजबान सरकार भ्रष्ट होने से सरकारी निवेश पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। इसलिए सरकारी निवेश घटाओ और निजी निवेश बढ़ाओ। वित्त…

सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता तय करे बजट

आशीष बहल लेखक, चुवाड़ी, चंबा से हैं जब सरकारी स्कूलों में मुफ्त में शिक्षा, मुफ्त किताबें, मुफ्त वर्दी, मुफ्त में खाना और छात्रवृत्तियों से लेकर इलाज तक मुफ्त में होता है, फिर भी लोग सरकारी स्कूलों की तरफ आकर्षित नहीं हो रहे।  इससे एक बात…

कबड्डी में हिमाचल को पहला स्वर्ण पदक

भूपिंदर सिंह लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं 65वीं वरिष्ठ राष्ट्रीय कबड्डी प्रतियोगिता में हिमाचल की बालाओं ने पहली बार किसी भी वरिष्ठ राष्ट्रीय प्रतियोगिता का टीम स्वर्ण पदक जीत कर हिमाचल को गौरव दिलाया है। इस टीम की अधिकांश लड़कियां…

बजट के बहाने ग्रामीण वोटबैंक पर निशाना

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं केंद्रीय बजट ग्रामीण भारत पर केंद्रित है, जहां देश के लगभग 70 फीसदी मतदाता रहते हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली को अर्थशास्त्र के साथ राजनीति की मिलावट में कोई पछतावा नहीं है। पहले भी, जब बजट को चुनावों से…
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