Divya Himachal Logo Sep 22nd, 2017

वैचारिक लेख


मजबूत होते रुपए के मायने

डा. अश्विनी महाजन लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय के  पीजीडीएवी कालेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं

सामान्य तौर पर जब डालर मजबूत होता है तो लोग डालर की ज्यादा मांग करते हैं, ताकि उसके मूल्य में वृद्धि का लाभ उठा सकें, जिससे डालर और मजबूत होता चला जाता है। रुपए के मजबूत होने से दुनिया भर में रुपए की मांग बढ़ेगी और रुपया मजबूत होगा। मजबूत होते रुपए की अपेक्षा से विदेशी लोग भारत से डालरों के बजाय रुपए में व्यापार करना ज्यादा पसंद करेंगे। आज जरूरत इस बात  की है कि सरकार और रिजर्व बैंक मिलकर रुपए में इस मजबूती के दौर को आगे बढ़ाने का काम करें…

बीते वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में रुपया जनवरी दो, 2017 को 68.23 प्रति डालर से मजबूत होता हुआ मार्च 31, 2017 तक आते-आते 64.85 रुपए प्रति डालर तक पहुंच चुका था। यानी लगभग पांच प्रतिशत की मजबूती के साथ रुपया अब अन्य मुद्राओं की तुलना में बेहतर नतीजे दिखा रहा है। यह सही है कि डालर दुनिया की अन्य मुद्राओं की तुलना में कमजोर हुआ है, लेकिन रुपए में मजबूती अन्य मुद्राओं से कहीं ज्यादा है। देखा जाए तो इस दौरान रुपया लगभग सभी मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। चीनी यूआन के मुकाबले यह मजबूती 3.68 प्रतिशत, पाउंड के मुकाबले 3.1 प्रतिशत, यूरो के मुकाबले 3.0 प्रतिशत, सिंगापुर डालर के मुकाबले 1.1 प्रतिशत और बांग्लादेशी मुद्रा के मुकाबले 7.0 प्रतिशत रिकार्ड की गई है। एक मुद्रा की किसी विदेशी मुद्रा के बदले में विनिमय दर उस मुद्रा की वास्तविक मांग और पूर्ति, भविष्य की अपेक्षाएं, सट्टेबाजी समेत कई कारणों से प्रभावित होती है। लेकिन मूल रूप से विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण निर्धारक तत्त्व होते हैं। पिछले लंबे समय से हमारा रुपया लगातार कमजोर ही होता जा रहा था। जनवरी, 2008 में यह 39.6 रुपए प्रति डालर से कमजोर होता हुआ, लंबे समय तक 68-69 रुपए प्रति डालर तक रहा। काफी लंबे अरसे के बाद उसमें किसी एक तिमाही में पांच प्रतिशत की उल्लेखनीय मजबूती आई है।

सामान्य तौर पर माना जाता है कि किसी देश की मुद्रा तब मजबूत होती है, जब विदेशी मुद्रा की मांग कम होती है। पिछली तिमाही के पहले दो महीनों में तो हमारा व्यापार घाटा पहले से ज्यादा रहा यानी पिछले साल के 14.2 अरब डालर की तुलना में अब इस वर्ष जनवरी और फरवरी में 18.7 अरब डालर। लेकिन अनिवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई राशियों, सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट और विदेशी निवेश के चलते हमारे विदेशी मुद्रा भंडार जनवरी में 360 अरब डालर से बढ़ते हुए मार्च 26 तक 370 अरब डालर तक पहुंच चुके थे। लेकिन मात्र विदेशी मुद्रा भंडारों के बढ़ने से रुपया मजबूत होने का इतिहास नहीं है, क्योंकि हम देख रहे हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार 2013-14 में 304 अरब डालर से बढ़ते हुए 2015-16 में 360 अरब डालर तक पहुंच चुका था। वास्तव में रुपया मजबूत तब होता है, जब एक ओर डालरों की मांग कम होती है, तो दूसरी ओर बाजार की अपेक्षाएं ऐसी होती हैं कि भविष्य में यह मांग और कम होगी। काफी लंबे समय तक तेल की लगातार घटती कीमतों के कारण भारत का व्यापार घाटा लगातार घट रहा था, रिकार्ड विदेशी निवेश प्राप्त हो रहा था, प्रवासी भारतीयों की बचतों और सॉफ्टवेयर से प्राप्तियां भी पूर्ववत जारी थीं, हमारा विदेशी मुद्रा भंडार भी लगातार उफन रहा था, लेकिन फिर भी दुनिया भर के सट्टेबाज रुपए को  लगातार कमजोर ही जान रहे थे।

देखना होगा कि वर्ष 2012-13 में व्यापार घाटा 195.6 अरब डालर से घटता हुआ वर्ष 2015-16 तक 130 अरब डालर ही रह गया। इस बीच चार सालों में 178.5 अरब डालर का विदेशी निवेश भी प्राप्त हुआ, अनिवासी भारतीयों द्वारा 260 अरब डालर भी भेजे गए, फिर भी रुपया 68 से 69 रुपए प्रति डालर के निम्न स्तर पर ही बना रहा। तो ऐसा क्या हुआ कि अचानक तीन महीनों में रुपया पांच प्रतिशत मजबूत हो गया, जबकि तेल की कीमतों में भी अब इजाफा होने लगा है और पिछले तीन महीनों में तेल की कीमतें 17.8 प्रतिशत बढ़ गई है और व्यापार घाटा भी बढ़ गया है। वास्तव में रुपए की मजबूती की तमाम शर्तें पूरी होने के बावजूद रुपए का कमजोर होना, एक विरोधाभास था, जो लगातार चल रहा था। लेकिन सट्टेबाजों का यह खेल लंबे समय तक नहीं चल सकता। इसलिए अब रुपए का पुनर्मूल्यन होना स्वाभाविक ही था। यही नहीं, भविष्य में भी रुपए के अवमूल्यन की संभावनाएं नहीं के बराबर हैं। ऐसे में भविष्य का बाजार भी रुपए में मजबूती की ओर इंगित कर रहा है। इसका एक कारण विमुद्रीकरण हो सकता है। पूर्व में देश में नकदी (और काली नकदी) का चलन बहुत था। ऐसे में नकदी धारक लोग डालरों के रूप में उसे बदली कर, डालर के मूल्य में वृद्धि का लाभ तो उठाते ही थे, गैर कानूनी तौर पर कम बिल (अंडर इनवॉयस) करके चीन आदि देशों से आयात भी करते थे। इन लोगों द्वारा गैर कानूनी तौर पर डालर की मांग से उसकी कीमत बढ़ती थी यानी रुपया कमजोर होता था। विमुद्रीकरण के बाद उस प्रवृत्ति पर कुछ अंकुश लगा है।

जनता द्वारा चीन के माल के बहिष्कार से भी डालर की मांग कम हुई है। उसका परिणाम यह हुआ कि 2015-16 (अप्रैल से फरवरी) के मुकाबले 2016-17 (अप्रैल से फरवरी) में चीन से भारत का व्यापार घाटा दो अरब डालर कम हुआ है। दिसंबर 2016 में चीन से आयात 5.8 अरब डालर से घटता हुआ फरवरी 2017 में 4.69 अरब डालर तक पहुंच चुका है। चीन के प्रति जनता और व्यापार के रुख से समझा जा सकता है कि आने वाले समय में चीन से आयात भी काफी कम हो जाएंगे। सरकार द्वारा मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, प्रतिरक्षा में स्वदेशी माल की प्राथमिकता के आधार पर खरीद इत्यादि के कारण भी आयात कम हो सकते हैं। पिछले काफी समय से औद्योगिक उत्पादन की थमी रफ्तार में भी अब कुछ हलचल दिख रही है। इस आशा से भी रुपए में मजबूती के आसार बाजार देख पा रहा है। पहले तो कमजोर रुपए के पैरोकार यह कहते रहे हैं कि रुपए का कमजोर होना अवश्यंभावी है, वह यह भी कहते हैं कि इससे आयात सस्ते और निर्यात महंगे हो जाएंगे, जिसके चलते हमारा व्यापार घाटा बढ़ सकता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब हमारा रुपया कमजोर हुआ है, तब-तब हमारा व्यापार घाटा कम होने की बजाय हमेशा बढ़ा है। इसका कारण यह है कि हमारे अधिकांश आयात और निर्यात लोचहीन हैं यानी आर्थिक सिद्धांतों के आधार पर सोचें, तो रुपए का अवमूल्यन करने के बजाय उसको और मजबूत करने से व्यापार घाटे को पाटा जा सकता है।

रुपए के मजबूत होने का एक लाभ उन लोगों को भी होता है, जिन्होंने विदेशी मुद्रा में ऋण लिए हुए हैं, क्योंकि उनको ब्याज और मूल की वापसी के लिए अब कम पैसा देना होगा। सरकार द्वारा लिए गए विदेशी ऋणों पर भी रुपयों में पहले से कम ब्याज और मूल चुकाना होगा। सामान्य तौर पर जब डालर मजबूत होता है तो लोग डालर की ज्यादा मांग करते हैं, ताकि उसके मूल्य में वृद्धि का लाभ उठा सकें, जिससे डालर और मजबूत होता चला जाता है। रुपए के मजबूत होने से दुनिया भर में रुपए की मांग बढ़ेगी और रुपया मजबूत होगा। मजबूत होते रुपए की अपेक्षा से विदेशी लोग भारत से डालरों के बजाय रुपए में व्यापार करना ज्यादा पसंद करेंगे। देश रुपयों में भी विदेशी ऋण ले पाएगा। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और रिजर्व बैंक मिलकर रुपए में इस मजबूती के दौर को आगे बढ़ाने का काम करें।

ई-मेल : ashwanimahajan@rediffmail.com

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