नव भारत निर्माण के संकल्प

ललित गर्ग लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं हमने आजाद भारत के विकास में कितना सफर तय किया है, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि हम अब भारत को कैसा बनाना चाहते हैं। हमारा सफर लोकतंत्र की व्यवस्था के साए में निश्चित रूप से…

विजन के साथ हाजिर हों राजनीतिक दल

अनुज कुमार आचार्य लेखक, बैजनाथ से हैं नेताओं को अखबारी सुर्खियों द्वारा लोगों को मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाने से बचने की जरूरत है। राजनीतिक दलों से अपेक्षा रहेगी कि वे अपने घोषणा पत्र में किन्हीं पांच परियोजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत…

सुरक्षा और मानवता के बीच रोहिंग्या

प्रभुनाथ शुक्ला लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं कोई भी व्यक्ति अगर किसी देश में शरण लेता है, तो उसके मानवीय अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। लेकिन अगर वह मानवीयता की आड़ में जीवनयापन की मांग करे और उसी देश के खिलाफ आतंकी साजिश में शामिल होकर…

किसान के आर्थिक पक्ष को मजबूत बनाइए

कुलभूषण उपमन्यु लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं किसान की उपज के मूल्यों में 1947 से अब तक 19 गुना बढ़ोतरी हुई है, जबकि उसके निवेश की कीमतों में 100 गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हो गई है। नौकरीपेशा कर्मियों के वेतन में 150 से 320 गुना तक…

एच1बी वीजा पर साहस दिखाइए

  डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं भारत सरकार के सामने दो रास्ते खुले हैं। एक रास्ता है कि अमरीका से याचना करें कि एच1बी पर सख्ती न की जाए, भारतीय इंजीनियरों का पलायन होता रहे, अमरीकी कंपनियां वैश्विक…

राजनीतिक बगिया में सिद्धांतों का सूखा

सतपाल लेखक, एचपीयू में शोधार्थी हैं हर राजनीतिक दल का एक विचार होता है, उसके कुछ सिद्धांत होते हैं, उस राजनीतिक दल का संविधान होता है, परंतु आज के समय में दलों में यह सब कागजों तक सीमित है। नेता और दल समय-समय पर इसमें अपनी सुविधानुसार…

बनी रहे चुनाव आयोग की स्वायत्तता

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार ज्योति ने केवल हिमाचल के लिए चुनाव तिथियों की घोषणा की तथा कोई यह नहीं जानता कि गुजरात के लिए चुनाव तिथियां कब घोषित की जाएंगी। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई…

जाति व क्षेत्र के भेदभाव से बचें मतदाता

शिव कुमार लेखक, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विवि में शोधार्थी हैं किसी क्षेत्र में यदि जाति विशेष का दबदबा रहा है, तो राजनीतिक दल वहां बहुसंख्य जाति के उम्मीदवार को टिकट देते रहे हैं। कारण यह कि राजनीतिक दल आज भी सत्ता में आने के लिए जातिगत…

अयोध्या में भव्य दीपावली

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं उत्तर प्रदेश की सरकार ने आम भारतीयों के साथ खड़े होकर पहली बार दिवाली का उत्सव मनाया तो लगा सरकार और लोगों में द्वैत समाप्त हो गया है। यह द्वैत विदेशी शासन में तो होता है, लेकिन…

बेखौफ अपराध की अंतहीन दास्तां

जगदीश बाली लेखक, शिमला से हैं हाल ही में अपराध की कुछ घटनाएं मनुष्य की दरिंदगी की पराकाष्ठा की तस्वीर पेश करती हैं। ये घटनाएं इस बात को भी उजागर करती हैं कि जुर्म करने वालों को न तो इनसानियत से कुछ सरोकार है, न कानून की रखवाली पुलिस का डर…

तिब्बत की प्रभुसत्ता का सवाल

कुलभूषण उपमन्यु लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं तिब्बत की समस्या दुनिया की बड़ी और पेचीदा समस्याओं में से एक है। सबसे ज्यादा इसका डंक भारत को ही झेलना पड़ रहा है। तिब्बत पर कब्जा करने के बाद चीन भारत से इसलिए भी चिढ़ा रहता है कि…

कांग्रेस को चमत्कार की आस

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं यह सही है कि राहुल अभी मोदी के मुकाबले में कहीं नहीं दिखते। वह कांग्रेस उपाध्यक्ष बने रहें या अध्यक्ष बन जाएं, इससे आम जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता, पर राहुल गांधी किसी भी रूप में…

सिर्फ बाहरी नहीं, भीतर के दीप भी जलें

ललित गर्ग लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं दीपावली पर्व की सार्थकता के लिए जरूरी है, दीये बाहर के ही नहीं, भीतर के भी जलने चाहिएं। दीया कहीं भी जले, उजाला देता है। दीए का संदेश है-हम जीवन से कभी पलायन न करें, जीवन को परिवर्तन दें, क्योंकि…

अगर मोदी वास्तव में ‘प्रेजिडेंशियल’ होते

भानु धमीजा सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं हम अभी देख रहे हैं कि कैसे राष्ट्रपति ट्रंप की शरारतें राष्ट्रपति प्रणाली में सिरे नहीं चढ़ पा रही हैं। मोदी हमारे पहले…

हिमाचल के हिस्से एक और शहादत

प्रताप सिंह पटियाल लेखक, भूतपूर्व सैनिक हैं मुद्दा यह है कि हमारे जवान बेवजह शहीद हो रहे हैं। सीमा से कब तक हम भारतीय सैनिकों की लाशें ढोते रहेंगे। कब तक हमारे नेता संसद में भाषणों तक सीमित रहेंगे। एक मुट्ठी भर देश ने कई दशकों से भारत को…