प्रदेश में हीरो लाल दुर्ग में जीरो

केंद्रीय छात्र संघ (एससीए)के लिए हुए चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक बार फिर प्रदेश में सबसे अधिक सीटें जीतने में कामयाब रही है। चुनावों में एनएसयूआई दूसरे व एसएफआई तीसरे स्थान पर रही है। एससीए चुनावों में एबीवीपी को 196 सीटें मिली हैं। एनएसयूआई को 130, एसएफआई को 44 व अन्य 13 सीटों पर काबिज रहे हैं।

एबीवीपी प्रदेश के कुछ ही कालेजों में वापसी कर सकी है तथा छात्र राजनीति का मुख्य गढ़ माने जाने वाले प्रदेश विश्वविद्यालय में एक बार फिर बैकफुट पर दिखाई दी है। जीत एबीवीपी से कोसों दूर रही वहीं एसएफआई ने सफलता के नए झंडे गाड़ते हुए जीत के अंतर का रिकार्ड बनाया है। लाल दुर्ग को भेदने के लिए विद्यार्थी परिषद ने पूरी तैयारी की थी, एबीवीपी के प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय मंत्री व प्रांत मंत्री ने खुद प्रचार का जिम्मा संभाला था। मगर जीत हासिल करना उनके लिए टेढ़ी खीर ही साबित हुआ। संस्कृत कालेज व छोटे कालेजों में एबीवीपी ने पूरे पैनल के साथ जीत हासिल की है। हिंसा के कारण मीडिया की सुर्खियां बने  मुख्यमंत्री के गृह जिला हमीरपुर कालेज चुनाव में एबीवीपी एसएफआई के लाल दुर्ग को भेदने में नाकामयाब रही है। एक सीट जीत कर हालांकि उसने लाल किले में सेंध जरूर लगाई है, मगर इसे सफलता का रंग देना तर्कसंगत नहीं होगा। पिछले एक सप्ताह से कालेज में जो हिंसा का दौर चल रहा था उस से चुनावों की तस्वीर पहले ही सपष्ट हो चुकी थी। पूरे प्रदेश के लोगों की निगाहें इस कालेज के चुनावों पर लगी थी। एबीवीपी के लिए दोनों ही संगठनों के इस कालेज का चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था। एबीवीपी के लिए सबसे राहत की बात सोलन कालेज में जीत हासिल करना रहा। यह कालेज प्रदेश के बड़े कालेजों की श्रेणी में आता है। यहां पर वोटर भी चार हजार से अधिक हैं। मंडी व धर्मशाला कालेज में भी एबीवीपी ने वापसी करते हुए कुछ हद तक सफलता हासिल की है। राहुल ब्रिगेड कही जाने वाली एनएसयूआई का ग्राफ प्रदेश में सुधरना न सुधरना एक बराबर ही रहा। प्रदेश विवि में वह 100 के आंकड़े को भी नहीं छू पाई है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी यहां पर आकर छात्रों को संबोधित कर चुके हैं। उनके इस दौरे को एससीए चुनावों से जोड़ा जा रहा था। युवाओं में उनकी अच्छी पैठ को देखते हुए एनएसयूआई को इस दौरे का फायदा मिलने के कयास भी लगाए जा रहे थे। एनएसयूआई की विवि में हुई पतली हालत को देखते हुए यह लगता है कि न तो उन्होंने यहां पर चुनावी होमवर्क किया था और न ही उनके प्रदेश अध्यक्ष और तथाकथित नेता चुनाव जीतने के लिए रुचि दिखा रहे थे।  एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष का उनके अपने गृह कालेज जोगिंद्रनगर में भी जादू नहीं चल पाया है। संगठन संजौली में वापसी करते हुए पूरा पैनल जीतने में जरूर कामयाब रहा है। मगर यहां पर क्षेत्रवाद का फैक्टर हावी रहा है। इस का श्रेय जिला अध्यक्ष को ही जाता है।  एसएफआई के लिए गौरव की बात यह रही है छात्र राजनीति के सबसे बड़े गढ़ में उन्होंने किसी भी संगठन को भटकने तक नहीं दिया। इस का श्रेय कार्यकर्ताओं को ही जाता है। आम छात्रों की समस्याओं को सुलझाने में चाहे कार्यकर्ता हरदम तैयार रहते हैं। यही कारण है कि इस बार जीत के सारे रिकार्ड उन्होंने तोड़ दिए हैं। वहीं एसएफआई ने चंबा, मंडी, जोगिंद्रनगर हमीरपुर, चकमोह कालेज में जीत हासिल कर छात्र राजनीति में बदलाव के संकेत भी दिए हैं। एनएसयूआई जिन कालेजों में जीती है, वहां पर वह पहले से ही सुदृढ़ थी। नया करिश्मा करने में वह नाकामयाब रही है। पिछले वर्ष की बात की जाए तो एबीवीपी 195 सीटें जीती थी इस बार उन्होंने एक सीट में बढ़ोतरी दर्ज की है। एनएसयूआई को आठ सीटों का नुकसान हुआ है। पिछले वर्ष 138 सीटों के मुकाबले इस बार 130 सीटों पर जीत हासिल हुई है। वहीं एसएफआई भी 41 के आंकड़े को पार कर 44 तक पहुंची है। हालांकि पिछले वर्ष 95 के करीब कालेजों में चुनाव हुए थे, जबकि इस बार 99 के करीब कालेजों में छात्र संघ चुनाव हुए हैं।

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