60 लाख में पड़े एससीए चुनाव

लिंगदोह कमेटी की सिफारिशेंे भले ही छात्र उम्मीदवार को पांच हजार का खर्चा करने की इजाजत देती होंे, मगर परोक्ष रूप से चुनाव का खर्चा देखा जाए, तो लाखों रुपए में हुआ है। एक कालेज में एक संगठन को पैनल उतारने के लिए बीस हजार रुपए तक खर्च करने की इजाजत है। मगर अपरोक्ष रूप से यह खर्चा तय राशि से कहीं ज्यादा है। 99 कालेजों में छात्र संघ चुनावों में यदि तीनों संगठनों के प्रत्याशियों पर बीस हजार रुपए खर्च करने की बात की जाए तो खर्च की यह राशि 5,940,000 रुपए तक पहुंचती है। परोक्ष रूप से देखा जाए, तो यह खर्चा करोड़ों में है। विवि प्रशासन व कालेज प्रशासन का इसमें किसी भी तरह का खर्चा शामिल नहीं है। संगठन अपने स्तर पर इस खर्चे को वहन करते हैं। विवि प्रशासन का कहना है कि लिंगदोह की सिफारिशों को अक्षरशः लागू किया जाता है। सबसे महंगा चुनाव विवि का रहता है। यहां पर प्रचार हाईटेक तरीके से होता है। एसएमएस, ई-मेल से संपर्क साधकर छात्रों को अपने पक्ष में किया जाता है। राजधानी होने के चलते हर छात्र संगठन यहां पर जीत हासिल करना चाहता है, जिसके चलते संगठन छात्रों पर खूब पैसा बहाते हैं। चुनाव के दौरान पार्र्टियों का दौर भी खूब रहता है। जनरल हाउस के दौरान छात्रों के लिए टी-पार्टी रिफ्रेशमेंट का दौर खूब रहता है। भले ही तीनांे संगठनों के लिए खर्च की सीमा साठ हजार तय हो मगर वास्तविकता करीब तीन लाख तक की है। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के तहत छात्र संगठन न तो चुनाव प्रचार के लिए प्रिंटेड सामग्री का इस्तेमाल कर सकते हैं और न ही प्रचार के लिए लाउड स्पीकर व अन्य लग्जरी खर्चे कर सकते हैं। जो छात्र उम्मीदवार हैं उनके लिए पांच हजार रुपए खर्च सीमा तय की गई है। यदि कोई नियमों की अवहेलना करता है, तो उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। मगर संगठन जिस तरह से प्रचार करते हैं उस पर लाखों का खर्चा आता है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान संगठन कार्यकर्ताओं को जिला की जिम्मेदारी सांैपते हैं। छात्रों को रिझाना, प्रचार करना उस दौरान आने वाले खर्चे को मिलाया जाए, तो यह राशि पांच हजार से बढ़कर लाखों तक पहुंच जाती है। चुनावों से पहले संगठनों के कार्यकर्ता चंदा भी इकट्ठा करते हैं।

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