कमाल की आबोहवा, पर…

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक हिमाचल की प्राकृतिक आबोहवा जैविक खेती के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। बावजूद इसके हिमाचल में जैविक खेती के लिए अधिक तरजीह नहीं दी जा रही है। किसान भी जानकारी के अभाव में जैविक खेती से नहीं जुड़ रहे हैं। प्रदेश में पशुओं की संख्या में निरंतर गिरावट भी जैविक खेती में बाधा साबित हो रही है, जबकि जैविक खेती के लिए पशुपालन को अधिक बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है। जानकारों के मुताबिक हिमाचल में जैविक खेती की जो क्षमता निहित है, उसका 10 फीसदी भी दोहन नहीं हो पाया है। इसके लिए पशुपालन के अलावा किसानों को प्रशिक्षित व अनुदान की आवश्यकता है, ताकि किसान कम से कम कीटनाशकों व रसायनों का प्रयोग करें। कृषि सचिव रामसुभग सिंह के मुताबिक किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश सरकार ने इसे प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से वर्ष 2012 तक प्रत्येक किसान के घर वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

You might also like