संरक्षित खेती को जुटे वैज्ञानिक

कार्यालय संवाददाता, पालमपुर

संरक्षित खेती अपने शैशव काल में जिस प्रकार से रफ्तार पकड़ रही है, उसे देखते हुए वैज्ञानिकों को इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को बढ़ाना होगा। संरक्षित खेती के अधीन कृषि क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि खेती को नपे-तुले तरीके से किए जाने की संभावनाएं अधिक होती हैं। इससे खेती में फसल गुणवत्ता को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे उत्पाद के बेहतर दाम किसानों को मिलते हैं। कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर में देश भर से आए कृषि वैज्ञानिकों की 21 दिनों तक चली कार्यशाला के समापन पर शोध निदेशक डा. एसपी शर्मा ने ये विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि विश्व व्यापार संगठन के कारण व्यापार का वैश्वीकरण हो चुका है, इसलिए गुणवत्ता का ध्यान रखकर किसान अधिक लाभ कमा सकता है। इस खेती को करने के लिए किसानों के समक्ष व्यापक चुनौतियां हैं और जब तक वे इससे पार नहीं पाते, तब तक वे लाभ नहीं कमा सकते।
उन्होंने कहा कि आज किसानों को कृषि तकनीकें, फसलों की विशिष्ट किस्में, नई किस्मों के कीट रोगों का नियंत्रण आदि ऐसी समस्याएं हैं, जिसके बारे में जानना और उनका समाधान करना वैज्ञानिकों के लिए भी चुनौती है। उन्होंने वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि वे इन चुनौतियों को हल कर किसानों को राहत दिलाएं। कृषि महाविद्यालय के डीन डा. पीके शर्मा ने कहा कि संरक्षित खेती पर तीन सप्ताह तक चला कार्यक्रम एक तरफा व्याख्यान नहीं था, बल्कि यह एक आपसी विचार-विमर्श पर केंद्रित कार्यक्रम था, जिसमें प्रायोगिक यात्रा तथा प्रदर्शन का अपना विशेष महत्त्व रहा। सब्जी एवं पुष्प विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डा. एनके पठानिया ने बताया कि 21 दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में देश के नौ राज्यों से 24 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इस दौरान उन्हें 43 विषयों पर विभिन्न वैज्ञानिकों ने व्याख्यान दिए। संस्थान के कुलगुरु डा. एसके शर्मा ने भी
इस दौरान प्रतिभागियों को अपना व्याख्यान दिया।

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