हिमाचली खेती के अर्थ बदलने का जज्बा

कृषि वैज्ञानिक डा. श्याम कुमार शर्मा कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के 10वें कुलपति हैं। कांगड़ा जिला के ज्वालामुखी के पास कोहाला गांव में दो मार्च, 1951 को जन्मे श्री शर्मा ने आनुवंशिकी विषय की पीएचडी की है। छह जुलाई, 2010 को पालमपुर में कार्यभार संभालने से पूर्व डा. शर्मा राष्ट्रीय पादप आनुवंशिकी संसाधन ब्यूरो नई दिल्ली के निदेशक थे। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला में 1976 में एक वैज्ञानिक के रूप में कैरियर शुरू करने वाले श्याम शर्मा 34 वर्षों के एक लंबे अनुभव के साथ देश-प्रदेश में कई प्रतिष्ठित पदों पर सेवाएं दे चुके हैं। ‘दिव्य हिमाचल’ टीम के कुछ ज्वलंत सवालों के सामने कुछ इस तरह पेश हुए कुलपति…

दिव्य हिमाचल ः कृषि विश्वविद्यालय  के कुलपति का पद ग्रहण करने के बाद प्रदेश के किसानों, मुख्यतः लघु एवं सीमांत कृषकों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने के लिए आप क्या प्रयास करेंगे?

कुलपति ः वर्तमान परिस्थितियों में किसानों को ज्यादा से ज्यादा लाभ दिलाना हमारा मुख्य लक्ष्य है। देश एवं प्रदेश में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब वह समय नहीं रहा, जब आजादी के बाद कृषि विज्ञानियों का मुख्य ध्येय खाद्यान्नों की उत्पादकता बढ़ाना था, ताकि भारत खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर बन सके। आज देश में खाद्यान्नों का भरपूर स्टाक है। इसलिए अब वैज्ञानिकों के समक्ष लक्ष्य है कि किस प्रकार लघु एवं सीमांत कृषकों के लाभ को अधिक से अधिक बढ़ाया जा सके, ताकि वे आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सकें।

दिहिः क्या इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कोई रूपरेखा तैयार की गई है?

डा. शर्माः इस दिशा में पोली हाउस एवं जैविक खेती महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और कृषकों के लिए उन्नति के नए द्वार खोल सकते हैं। जार्डन में एक वैली में स्थापित 60 हजार से ज्यादा पोली हाउस एक उदाहरण के रूप में हमारे सामने हैं, जो उस क्षेत्र की प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करते हैं। साथ ही किसानों के आर्थिक उत्थान में भी एक निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जार्डन वैली में एक ही नदी इन सभी 60 हजार से ज्यादा पोली हाउसिज की सिंचाई की आवश्यकताओं को पूरा करती है। प्रदेश में पोली हाउस स्थापित करने के साथ-साथ जल के संरक्षण एवं संवर्द्धन पर भी ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि अब खेतों में फ्लड इरिगेशन का समय नहीं रहा है। इस पुरानी विधि से सिंचाई करने से मिट्टी में उपलब्ध तत्त्व अनावश्यक रूप से अधिक पानी के साथ बह जाते हैं, जिससे फसलों की उत्पादकता पर भी विपरीत असर देखने को मिलता है। सोलन जिला की सपरून घाटी में टमाटर उत्पादक वर्षा के पानी को एकत्रित कर व उसका सिंचाई में सदुपयोग कर इस दिशा में बेहतरीन कार्य कर रहे हैं।

दिहिः जैविक खेती की कितनी जरूरत है?

डा. शर्माः प्रदेश के कबायली क्षेत्रों में पैदा की जाने वाली फसलें मुख्यता जैविक खेती से प्राप्त की जाती हैं। इस तरह के उत्पादों का मूल्य अन्य उत्पादों से अधिक होता है, जो किसानों के लिए और भी लाभप्रद है। महानगरों में तो जैविक उत्पादों के विक्रय हेतु विशेष स्टोर भी स्थापित हो चुके हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों के किसानों को भी जागरूक बनाकर उन्हें जैविक खेती अपनाने हेतु प्रेरित किया जाना चाहिए। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इस दिशा में भी प्रयास कर रहे हैं।

दिहिः कहीं-कहीं पोली हाउस में भी विभिन्न फसलों के फेल होने से किसान परेशान हैं। इस बारे में विश्वविद्यालय क्या उपाय कर रहा है?

डा. शर्माः यह सच है कि पोली हाउस में भी क्राप फेलियर के मामले सामने आए हैं, विशेषकर शिमला मिर्च के बारे में, जिससे कुछ स्थानों पर कृषकों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। किसानों को भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि पोली हाउस में उगने वाली तथा खुले खेतों में उगने वाली किस्मों में फर्क होता है। पोली हाउस के अंदर का वातावरण भी भिन्न होता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के कीटों को पनपने की भी अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध रहती हैं। वैज्ञानिक समय-समय पर किसानों को सलाह देते हैं।

दिहिः सिरमौर जिला समेत कई जगह अदरक सड़ रहा है। उत्पादकों की समस्याओं का कोई निदान वैज्ञानिक क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

डा. शर्माः सच है कि सिरमौर समेत अदरक उत्पादक क्षेत्रों में उत्पादकों को भी विभिन्न प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि सिरमौर जिला में चूंकि अदरक बहुतायत मात्रा  में उगाया जाता रहा है, लिहाजा इस फसल को प्रभावित करने वाली बीमारियों के ‘माइक्रो आर्गेनिज्म’ की ‘इनाकुलम’ (मात्रा) बहुत बढ़ गई है। अगर अदरक का सर्वोत्तम भी सिरमौर में किसान बीजते हैं, तो इस फसल पर बीमारियों का कुछ न कुछ प्रभाव देखने में आया है। अदरक उत्पादकों को यही परामर्श है कि वहां पर फसलों की अदला-बदली (रोटेशन) कर उगाया जाए। अदरक की फसल को तीन फसलों की रोटेशन में लगाया जाना चाहिए।

दिहिः निचले क्षेत्रों की एक मुख्य फसल मक्की के उत्पादकों के लिए आप क्या परामर्श देंगे?

डा. शर्माः हिमाचल के चंबा, कांगड़ा, हमीरपुर, ऊना एवं बिलासपुर जिलों में मक्की की फसल लगभग तीन लाख हेक्टेयर में उगाई जाती है। मक्की के उत्पादन में हिमाचल का प्रति हेक्टेयर उत्पादन राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है। यह एक ऐसी फसल है, जिसका केवल 25 प्रतिशत उत्पादन मनुष्यों द्वारा खाने के रूप में प्रयोग किया जाता है, बाकी 75 प्रतिशत उत्पादन अन्य कार्यों में प्रयोग में लाया जाता है। इसमें से भी मक्की का प्रयोग पशुओं को फीड में अधिक किया जाता है। मक्की उत्पादकों को एक बात विशेष रूप से ध्यान में रखनी चाहिए कि मक्की को पूरी तरह सुखा कर ही बाजार में बेचना चाहिए, अन्यथा इसमें नमी के चलते किसानों को भाव कम प्राप्त होंगे। 

दिहिः कांगड़ा चाय अभी तक बाजार में अपेक्षित स्थान नहीं बना पाई है, क्यों? इस दिशा में कोई ठोस एवं कारगार कदम?

डा. शर्माः राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कांगड़ा चाय की प्रतिस्पर्धा हमेशा से ही दार्जिलिंग की चाय से रही है। कांगड़ा चाय को प्रोत्साहन देने के लिए इसे जैविक खेती के रूप में अपनाया जाना चाहिए, तभी सही बाजार मूल्य प्राप्त होने की संभावना अधिक रहेगी। वैसे भी अधिकतर चाय उत्पादक नाममात्र के ही बायो केमिकल प्रयोग करते हैं। विश्वविद्यालय इस संदर्भ में कार्यरत है व जल्द ही चाय की जैविक खेती का ‘एक मॉडल’ चाय उत्पादकों को उपलब्ध करवाया जाएगा।

दिव्य हिमाचलः आपका विजन क्या है?

एसके शर्माः रोजगार को शिक्षा के साथ नहीं जोड़ा जाए, बल्कि बाजार और रोजगार को देखकर शिक्षा का ढांचा तैयार हो। संस्थान में इसी को ध्यान में रखते हुए एमबीए एग्री बिजनेस और बीटेक फूड साइंस एंड टेक्नोलाजी को आरंभ किया गया है। साथ ही संस्थान आतिथ्य और होटल प्रबंधन से संबंधित कोर्स को भी आरंभ करने की दिशा में सार्थक कदम उठा रहा है।

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