आओ शहर को साफ करें

– प्रेमपाल महिंद्रू, नाहन

अरे छोड़ो पढ़ाई-लिखाई आओ पहले शहर की सफाई करें। शहर के स्कूलों में केवल पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, बल्कि इसके साथ-साथ शहर की सफाई पर भी पूरा या यूं कहिए कि पूरा का पूरा ध्यान दिया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में शहर की सफाई व्यवस्था को भी पढ़ाई लिखाई के साथ जोड़ दिया गया है, भले ही इस विषय को लेकर परीक्षाओं में शामिल नहीं किया गया है। वैसे भी इस विषय के लिए स्कूलों द्वारा कोई अलग से फीस नहीं ली जाती। शायद इसलिए चूंकि स्कूलों में दाखिला लेते समय छात्रों के अभिभावकों के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं रखी जाती कि स्कूल में पढ़ाई के साथ शहर की सफाई में भी छात्रों का योगदान अनिवार्य होगा। यह तो एक अतिरिक्त कार्यभार है, जो शहर की संस्थाओं द्वारा इन छात्रों को बलि का बकरा बनाकर सौंपा जाता है। पर्यावरण संरक्षण दिवस ‘सफाई अभियान सप्ताह’ आदि में इन संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले अभियानों में मुख्य रूप से भिन्न-भिन्न स्कूलों के छात्र-छात्राओं को ही घसीटा जाता है, भले ही स्कूलों में परीक्षाओं के दिन निकट हों। छात्रों के हाथों में झाड़ू, दराट जैसे हथियार पकड़ाकर कई-कई घंटे तालाबों के किनारे सड़कों के किनारे व अन्य ऐसी जगहों पर घुमाया जाता है, जहां न केवल सांप व बिच्छू पर्याप्त मात्रा में होते हैं, बल्कि पानी से भरे तालाब भी इन छात्रों के लिए जान जोखिम में डाल सकते हैं। हजारों रुपए पगार के रूप में ले रहे नगरपालिका के सफाई कर्मी भले ही इन स्थानों की अनदेखी करते हों, परंतु प्रशासन इस पर कोई गौर नहीं करता और इसके लिए स्कूली छात्र-छात्राओं को ‘खतरों के खिलाड़ी’ बनना पड़ता है। क्या स्थानीय स्वयंसेवी व समाजसेवी संस्थाएं यह कार्य मजदूरों को मजदूरी देकर नहीं करवा सकती हैं। अपने को समाचारों की सुर्खियों में लाने के लिए इन छात्र-छात्राओं को बलि का बकरा क्यों बनाती हैं। क्या इससे इन छात्रों की पढ़ाई में बाधा नहीं होती। क्या इन छात्रों के अभिभावक इस बात को पसंद करते हैं कि उनके बच्चे स्कूल में शिक्षा ग्रहण नहीं कर रहे।

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