कश्मीर की आजादी का मतलब

– डा. अश्विनी महाजन, लेखक, पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं

कश्मीरी लोगों को अलगाववादी ताकतों और शत्रु राष्ट्रों के बहकावे से बाहर आकर कश्मीर के विकास और वहां के जीवन स्तर को सुधारने के लिए शांति का एक मौका देना चाहिए…

देश की आजादी के साथ ही कश्मीर समस्या की शुरुआत हो गई थी। अभी कश्मीर पूर्व शासक द्वारा कश्मीर के भारत में विलय की घोषणा अभी बाकी थी कि 1947 में ही कबालियों के भेष में पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर के एक बड़े भू-भाग पर अपना कब्जा जमा लिया था, जिसे हम आज पीओके यानि पाकिस्तानी कब्जे का कश्मीर कहते हैं, जिसे चाहे पाकिस्तान आजाद कश्मीर का नाम दे, वास्तव में वह गुलाम कश्मीर ही है। यह सर्वविदित है कि भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के बल पर जो राजनीतिक स्थिरता हासिल की, उसके कारण हमारी अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है। आज भारत अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में केवल आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि सफलता की बुलंदियों को छू रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी का क्षेत्र हो, स्वास्थ्य सुविधाओं की बात हो, अंतरिक्ष विज्ञान हो, प्रतिरक्षा या शांतिपूर्ण उपयोग के लिए आणविक शक्ति, सभी क्षेत्रों में आज भारत की गिनती दुनिया के अग्रणी देशों में होती है।

अभी हाल ही में संपन्न राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने कई विकसित देशों को पछाड़ते हुए पदक तालिका में जो दूसरा स्थान प्राप्त किया है, खेलों में भी भारत का लोहा माना जाने लगा है। यह सब अचानक नहीं होता, इसके लिए देश की प्रतिभावान जनता को लगातार मेहनत करनी होती है। भारत की जनता ने हमेशा से कश्मीर को अपने देश का ‘मुकुट’ माना है। भारत के स्विट्जरलैंड के नाम से जानी जाने वाली कश्मीर घाटी सभी भारतीयों के लिए गर्व का विषय रही है। जम्मू-कश्मीर राज्य को विकास के उच्चतम शिखर तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता भारत में हमेशा से रही है। इसीलिए योजना आयोग से लेकर वित्त आयोग तक सभी एजेंसियां कश्मीर के विकास के लिए योजनाएं बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए हमेशा कार्यरत रहती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग ही नहीं, इसका भारत के लिए सामरिक महत्त्व भी बहुत अधिक है। इसलिए किसी भी हालत में कश्मीर को तथाकथित कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के हाथ में सौंपा नहीं जा सकता। उधर यदि गुलाम कश्मीर की तरफ नजर मारें तो पता चलता है कि वहां पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं अथवा चीन की सैनिकों की आवाजाही को सुगम करने वाली सड़कों और पुलों के अतिरिक्त वहां विकास का कोई चिन्ह दिखाई नहीं देता। ऐसे में यदि पाकिस्तान के षड्यंत्र द्वारा भोले भाले कश्मीरियों को उकसा कर वहां के अलगाववादी नेता यदि किसी भी स्तर पर तथाकथित आजादी अथवा स्वायत्त शासन प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं (जिसकी संभावनाएं शून्य हैं) तो कश्मीर की हालत का अंदाज लगाना कोई कठिन काम नहीं है। यदि हम कश्मीर की तथाकथित आजादी के केवल स्वप्न की बात ही करें तो यह कश्मीर और कश्मीरियों के लिए भयावह स्वप्न ही होगा। जम्मू-कश्मीर एक ऐसा राज्य है, जहां केंद्र और राज्य दोनों सरकारें जो बहुत अधिक राजस्व एकत्र नहीं कर पाती। जहां वर्ष 2008-09 में प्रत्यक्ष करों से केंद्र सरकार द्वारा 335000 करोड़ रुपए एकत्र किए गए, जम्मू-कश्मीर से यह मात्र 452 करोड़ ही थे। इसमें भी यदि देखें तो केवल दो कर दाताओं, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और सन फार्मा लिमिटेड से ही 300 करोड़ रुपए से भी अधिक राशि एकत्र की गई। जहां तक केंद्रीय उत्पाद शुल्क का प्रश्न है, वर्ष 2009-10 में मात्र 62 करोड़ रुपए से भी कम की राशि जम्मू-कश्मीर से प्राप्त हुई। इसमें भी अधिकांश कर राजस्व जम्मू क्षेत्र से प्राप्त हुआ। अगर राज्य सरकार का राजस्व देखा जाए तो देखते हैं कि उनका अपना कर राजस्व 2009-10 में मात्र 3011 करोड़ रुपए का ही है, जबकि राज्य सरकार का कुल राजस्व इस वर्ष में 19362 करोड़ रुपए का था। इसमें केंद्रीय करों के हिस्से के रूप में इसे 1880 करोड़ रुपए और सहायता अनुदान के रूप में 13232 करोड़ रुपए, यानि कुल मिलाकर केंद्र से जम्मू कश्मीर को 15112 करोड़ रुपए दिए जाने का प्रावधान रखा गया।

वर्ष 2009-10 के बजट में सिंचाई योजनाओं, विद्युत योजनाओं, पेयजल योजनाओं इत्यादि पर भारी खर्च करने का प्रावधान रखा गया और लगभग 5000 करोड़ रुपए की परियोजनाएं केंद्र सरकार को भेजी गइर्ं। राज्य सरकार के सामान्य खर्चों के लिए भी जम्मू-कश्मीर राज्य के पास पर्याप्त साधन नहीं हैं। तेरहवें वित्त आयोग द्वारा केवल केंद्रीय करों में हिस्से के रूप में 20183 करोड़ रुपए सहायता अनुदान के रूप में 20256 करोड़ रुपए यानि कुल मिलाकर 40439 करोड़ रुपए वर्ष 2010 से 2015 के बीच जम्मू-कश्मीर को मिलेंगे, यानि 8000 करोड़ रुपए से भी अधिक प्रति वर्ष। वित्त आयोग द्वारा हो अथवा योजना आयोग या सरकार की कोई और एजेंसी, राज्यों को राशि आबंटित करते हुए इस बात को ध्यान में नहीं रखती कि उस राज्य से केंद्र को कितना राजस्व प्राप्त हो रहा है, बल्कि इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उस राज्य की आवश्यकताएं कितनी हैं। विकास का विषय हो अथवा गरीबी और बेरोजगारी का उन्मूलन अथवा ढांचागत विकास, देश के समस्त राज्यों में उनके विकास हेतु आवश्यक धन राशि आबंटित की जाती है। इसी के मद्देनजर हालांकि जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का एक प्रतिशत से भी कम है, साथ ही कश्मीर में अलगाववादी शक्तियों की सक्रियता के चलते वहां से बड़ी संख्या में हिंदू जनसंख्या का पलायन भी हुआ है, उस राज्य में राजस्व की संभावनाएं कम होने, राज्य सरकार की आमदनी दूसरे स्रोतों से भी न बढ़ सकने की स्थिति और उस क्षेत्र के विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए तेरहवें वित्त आयोग द्वारा राज्यों को करों में हिस्से का लगभग 1.6 प्रतिशत जम्मू-कश्मीर को दिया गया और सहायता अनुदान का 7.5 प्रतिशत जम्मू-कश्मीर को मिला। ध्यातव्य है कि जम्मू-कश्मीर से केंद्र को अधिक से अधिक 4000 (यानी 500 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष) करोड़ रुपए कर राशि ही इस काल खंड में केंद्रीय करों के रूप में मिलेगी। कुल हिसाब किताब देखा जाए, तो जम्मू-कश्मीर राज्य जिसमें लद्दाख, कश्मीर घाटी और जम्मू तीन क्षेत्र शामिल हैं, आर्थिक रूप से कई कारणों से शेष भारत से यह राज्य थोड़ा पिछड़ा है। पिछले कई वर्षों से चल रहे अलगाववाद और आतंकवाद के चलते पूरे जम्मू-कश्मीर और विशेष तौर पर कश्मीर घाटी की अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है।

बड़े दुःख का विषय है कि कश्मीरियों के हित चिंतक होने का दावा करने वाली अलगाववादी शक्तियां कश्मीर की दुरावस्था का वास्तिवक कारण है। जब यह मान्यता है कि भारत माता का मुकुट कश्मीर है और समुद्र उसके पांव धोने का काम करता है, तो यह समझा जा सकता है कि कश्मीर और कश्मीरियों के साथ भारत का एक भावनात्मक लगाव है। कश्मीरी लोगों को अलगाववादी ताकतों और शत्रु राष्ट्रों के बहकावे से बाहर आकर कश्मीर के विकास और वहां के जीवन स्तर को सुधारने के लिए शांति को एक मौका देना चाहिए।

You might also like