क्यों जरूरी हैं प्रदेश में तीन शिक्षा निदेशालय

– गुरुदत्त शर्मा लेखक, हिमाचल शिक्षक महासंघ के प्रदेश महामंत्री हैं

सैकेंडरी स्तर की शिक्षा का महत्त्व समझते हुए आज यह अनुभव किया जा रहा है कि इस स्तर तक की शिक्षा को ठोस आधार देकर इसकी गुणवत्ता बनानी होगी…

हिमाचल प्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रसार व विकास हुआ है। साक्षरता दर तेजी से बढ़ी है। आज साक्षरता तथा शिक्षा के प्रसार के क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश अग्रणी राज्य बनाकर उभरा है। हिमाचल प्रदेश में कुल बजट का 17 फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है। स्कूलों व शिक्षण संस्थानों में तेजी से वृद्धि हुई, परंतु ढांचागत परिवर्तन की ओर सरकार ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। आज हिमाचल प्रदेश में 10700 प्राथमिक पाठशाला, 2291 मिडल स्कूल, 833 हाई स्कूल, 1250 वरिष्ठ सैकेंडरी स्कूल हैं। इसके अलावा 80 के करीब कालेज, जिसमें 66 सरकारी व 14 निजी कालेज चल रहे हैं। शिक्षा के इतने बढ़े ढांचे के लिए आज भी दो ही शिक्षा निदेशालय हैं। प्राथमिक (पहले प्रारंभिक था) तथा उच्च शिक्षा के इतने बड़े व व्यापक ढांचे को एक निदेशक कैसे संभाल पाता है। यह तो निदेशालय की कार्यप्रणाली से आसानी से समझा जा सकता है। यदि उच्च निदेशालय को दो भागों उच्च तथा सैकेंडरी निदेशालय में बांटा जाए, तो यह प्रशासनिक व प्रबंधन के लिए सुगम होगा, जैसा कि सभी जानते हैं कि प्रदेश सरकार ने कक्षा छठी से 12वीं तक की शिक्षा को स्कूल के अधीन ही रखा हुआ है। ऐसे में यदि इस स्तर तक की शिक्षा के लिए सरकार एक सैकेंडरी शिक्षा निदेशालय का गठन करती है, तो इससे स्कूली स्तर तक की शिक्षा का ढांचा मजबूत ही नहीं होगा, बल्कि शिक्षा में गुणवत्ता की ओर यह महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा। वैसे भी उच्च शिक्षा निदेशालय के साथ रहते हुए प्रदेश में स्कूल स्तर की शिक्षा में कई कुरीतियों जैसे नकल व ट्यूशन का जन्म हुआ और उसे सुधारने के लिए विशेष ध्यान नहीं दिया गया, नतीजन उनका आकार व्यापक होता गया। स्कूली कैडर के अधिकारी अपने साथ उनके कैडर के अतिरिक्त निदेशक का पद पिछले सात सालोें से रिक्त चला आ रहा है। इसके अलावा संयुक्त निदेशक के तीन पद दो वर्षों से रिक्त पड़े हैं, जबकि कालेज स्तर के सभी अधिकारियों के पद कभी भी खाली नहीं रहते । अध्यापकों की हमेशा यह शिकायत रहती है कि कालेज के प्रवक्ता निदेशक से कभी भी मिल सकते हैं, परंतु स्कूल अध्यापकों को निदेशक से मिलने के लिए अपना बहुत समय जाया करना पड़ता है। यह सब शिक्षा का अध्यायिक ढांचा कार्य की अधिकता के  कारण है। सैकेंडरी निदेशालय के अलग होने के बाद यह सौतेला व्यवहार भी समाप्त हो जाएगा।

 सैकेंडरी स्तर की शिक्षा प्रदेश के अन्य विभागों को कर्मचारी व प्राथमिक शिक्षा के लिए अध्यापक ही उपलब्ध नहीं करवाती, बल्कि उच्च शिक्षा को प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी इस स्तर की शिक्षा को लांघ कर पार करते हैं। पहली पंच वर्षीय योजना के अंत में एक प्रपत्र द्वारा यह कहा गया कि प्राथमिक व उच्च शिक्षा में सैकेंडरी शिक्षा हमारे देश की प्रचलित शिक्षा प्रणाली में सबसे कमजोर कड़ी है और इसी कारण सरकार ने (देश की) 1986 में सैकेंडरी शिक्षा के महत्त्व को समझा और पूरे देश में एक समान सीनियर सैकेंडरी पद्धति आरंभ की।

कुछ प्रदेशों ने भी सैकेंडरी शिक्षा के महत्त्व को समझा और उन्होंने सैकेंडरी शिक्षा के निदेशालय का अलग गठन करके इस स्तर के शिक्षा के ढांचे को मजबूती प्रदान की, परंतु हिमाचल प्रदेश में इसे अफसरशाही व कालेज स्तर के अधिकारियों के दबाव के कारण उच्च शिक्षा के साथ जोड़े रखा गया। नतीजन इसका ढांचा प्रदेश में कमजोर हो रहा है।

सैकेंडरी स्तर की शिक्षा का महत्त्व समझते हुए आज यह अनुभव किया जा रहा है कि इस स्तर तक की शिक्षा को ठोस आधार देकर इसकी गुणवत्ता बनानी होगी। नकल का जहर भी इसी स्तर तक की शिक्षा में प्रदेश में अधिक है। इसको रोकने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि प्रदेश में सैकेंडरी का अलग निदेशालय बनाया जाए ताकि शिक्षा में फैली इस कुरीति के लिए व्यापक रूप से अभियान चलाया जा सके। सैकेंडरी स्तर तक के अध्यापकों के कैडर के  हिसाब से संगठन है, बल्कि कईयों ने तो अपने प्रतिद्वंदी संगठन भी खड़े कर दिए हैं। ये शिक्षा संगठन या शिक्षक इस स्तर की शिक्षा की उन्नति के लिए कम कार्य करते हैं और प्रतिद्वंदी संगठनों को धराशाही करने में अधिक व्यस्त रहते हैं। नतीजन इससे भी सैकेंडरी शिक्षा पद्धति को ठोस अधार नहीं मिला। सैकेंडरी निदेशालय बनने से इन अध्यापक संघों पर भी अंकुश लगेगा। यदि प्रदेश सरकार भी केंद्र सरकार के समक्ष अपना पक्ष सही ढंग से रखे तो सैकेंडरी निदेशालय गठन के लिए उन्हें वित्तीय सहायता मिल सकती है।

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