नोराह ने हिमाचल को सिखाया था अभिनय

उपेंद्र कटोच, पंचरुखी

बर्फीली चोटियां, चाय के बागान और साफ हवा, यही सब आयरिश नाटककार नोराह रिचर्ड को सात समंदर पर कांगड़ा जिला के पालमपुर खींच लाया था। बाद में ग्रामीण संस्कृति से वह इतनी प्रभावित हुईं कि अंद्रेटा को सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर निखार कर हिमाचलियों को अभिनय सिखाने में अहम भूमिका निभाई। यही नहीं बांस की बल्लियों तथा घास-फूस की छत से बना उनका बसेरा ‘दि रिट्रीट’ नाटक प्रेमियों के लिए कला मंदिर बन गया। नोराह का जन्म 29 अक्तूबर, 1876 को गौरावुड (आयरलैंड) में हुआ था। 21 वर्ष की आयु में रिचर्ड ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की। टॉलस्टाय का साहित्य पढ़ने से उनकी रुचि अभिनय की तरफ हुई। इंग्लैंड में उन्होंने थियेटर का ज्ञान प्राप्त किया। ‘ओथेलो’ व ‘मर्चेंट आफ बेनिस’ नाटकों से उनकी प्रतिभा सामने आई। वर्ष 1906 में ‘डोरसेट’ में नोराह का विवाह फिलिप अर्नेस्ट रिचर्ड से हुआ। 1911 में उनके पति की दयाल सिंह विवि में अंग्रेजी अध्यापक के रूप में नियुक्ति होने पर नोराह लाहौर आ गईं। यहां आकर नौरा ने अधिक समय नाटक लेखन, निर्देशन व अभिनय में गुजारना शुरू किया। उन्होंने नाटक संस्था ‘सरस्वती ड्रामा आर्ट’ सोसायटी का गठन किया और शेक्सपियर के नाटकों ‘मिड समर नाइट्स ड्रीम’ और ‘एज यू लाइक इट’ का मंचन किया। 1920 में उनके पति की मृत्यु हो गई। कुछ समय बाद वह वापस अपने मूल वतन की सरजमीं पर लौट गईं, लेकिन 1925 में वह फिर भारत वापस आ गईं व अपनी प्रशंसक व मित्र श्रीमती ई. डब्ल्यू पारकर के घर बनूरी में रहने लगीं। अंद्रेटा गांव के एकांत एवं प्राकृतिक सौंदर्य से प्रभावित होकर वह 1934 में यहां आकर बस गईं। नौरा 1935 से चार मार्च, 1971 मृत्यु तक अंद्रेटा में ही रहीं। खास यह कि नौरा ने पहाड़ी बोली भी सीखी थी। वर्तमान में विडंबना यह कि  हिमाचल सरकार उनके निवास को जाने वाली सड़क तक को पक्का नहीं करवा पाई है।

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