पर्याप्त हैं प्रदेश में दो ही शिक्षा निदेशालय

– रमन कुमार गुप्ता, लेखक, सुंदरनगर से हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ के पूर्व मुख्य संगठन सचिव हैं

तीसरे निदेशालयों के गठन से नौकरशाही तथा लालफीताशाही का विस्तार होगा तथा आर्थिक बोझ बढ़ेगा। तीन निदेशालयों की तुलना में मात्र दो निदेशालयों को निखारने के लिए पिछले लंबे अरसे से लंबित पड़े सुधारों को लागू करना  अनिवार्य है..

 

हिमाचल प्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद प्रदेश में निःसंदेह शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से प्रसार हुआ। साक्षरता दर तेजी से बढ़ी तथा शिक्षण संस्थाओं में भी बड़ी तीव्र गति से वृद्धि हुई है, परंतु ढांचागत व्यवस्था के संदर्भ में सरकारी स्तर पर किए गए प्रयास मरे हुए घोड़े को चाबुक लगाने जैसे हैं। आज प्रदेश में 10700 प्राथमिक स्कूल 2291 मिडल स्कूल, 833 हाई स्कूल, 1250 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय और लगभग 80 सरकारी तथा गैर सरकारी कालेज शिक्षा का अलख जगा रहे हैं। प्रदेश के कुल बजट का 17 फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है। दरअसल मात्रात्मक दृष्टि से शिक्षा को गांव तक पहुंचाने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन गुणात्मक दृष्टि से उसकी प्रासंगिकता में न्यूनता आई है। शिक्षा हब का शृंगार तो हो रहा है,लेकिन गुणात्मकता की हिस्सेदारी छिन रही है। सुधारों के प्रस्ताव फाइलों में सो रहे हैं। वर्तमान में शिक्षा के समस्त प्रबंधन को दो निदेशालय संभाल रहे हैं, जो पर्याप्त हैं। आवश्यकता है प्रबंधन की कमियों को दूर करने की तथा कार्यशैली को समयावधि की नकेल से कसने की। केवल 80 कालेजों के कुशल प्रबंधन के लिए तीसरे निदेशालय का गठन प्रासंगिक प्रतीत नहीं होता, क्योंकि ऐसा करने से आर्थिक बोझ में भारी वृद्धि होगी, जबकि प्रदेश पहले ही विकट आर्थिक संकट से जूझ रहा है। वास्तव में पूर्व स्थापित निदेशालयों के समस्त प्रशासनिक प्रबंधन को कुशल तथा दक्ष बनाने के लिए व्याप्त त्रुटियों को दूर करने की जरूरत है। इसके लिए नौकरशाह अपने प्रशासनिक पदों के रंग बदलें। उन्हें प्रशासनिक त्रुटियों के खिलाफ स्पष्ट रूप से बोलना होगा, शिक्षा विभाग के आलोच्य मुद्दों के लिए कर्मठ होकर आलोचना के सारथी बनना होगा, क्योंकि हम निजी स्वार्थ के लिए आवश्यक आलोचना को गैर जरूरी मानते हैं। सरकारी तथा विभागीय कमियों के कारण कुछ तल्ख तथा दरकी हुई सच्चाइयां नहीं आ पा रही हैं, जिन्हें असामान्य करार दिया जा सके। परिणामस्वरूप शिक्षा विभाग अपने नाम को एक मानक और प्रामाणिक शिक्षा विभाग के रूप में पल्लवित, पुष्पित एवं फलित नहीं कर पा रहा है। दुखद तथ्य यह है कि स्कूल कैडर के अतिरिक्त निदेशक का पद तथा संयुक्त निदेशक के तीन पद वर्षों से सरकार के किसी हरम में क्यों धूल फांक रहे हैं। इन पदों की रिक्ततता से प्रदेश सरकार की तिजोरी तो फूल रही है, लेकिन इनके दुष्परिणाम अध्यापक और छात्र समाज से बहुत कुछ छीन रहे हैं। अच्छी ढांचागत सुविधाएं, पर्याप्त टीचिंग लर्निंग सामग्री एवं उपकरण उपलब्ध करवाना, अध्यापकों के रिक्त पदों को द्रुत गति से भरना समय और परिस्थितियों की अनिवार्यता है। आवश्यक और समीचीन है निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 को आवश्यक संशोधनों के साथ बड़ी प्रतिबद्धता के साथ लागू करने की। प्रदेश सरकार इस अधिनियम में इसी एक्ट की धारा 38 (1) के अंतर्गत आवश्यक संशोधन करने के लिए अधिकृत है। अध्यापकों को चुनाव तथा जनगणना जैसे गैर शिक्षण कार्यों में तैनाती नहीं करने संबंधी संशोधन भी निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा के कानून में अभिलषित है। यही नहीं, कार्य निष्पादन तथा कार्य निरीक्षण की रैंकिंग हो। इसके लिए निरीक्षण अधिकारियों के अतिरिक्त पदों के सृजन में गुरेज नहीं किया जाए। स्कूलों में प्रबंधन समितियों का गठन एक अच्छी पहल है, लेकिन ये किंत-परंतु से बचकर बिना किसी दुराग्रह के बुनियादी समस्याओं को हल करने तथा शिक्षा में गुणवत्ता लाने की कोशिश करें। नतीजतन शिक्षा के ढांचे को हर स्तर पर ठोस आधार मिलेगा, शिक्षा गुणात्मक दृष्टि से सशक्त होगी, स्कूली तथा कालेज शिक्षा के माहौल में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। अध्यापक छात्र अनुपात प्रभावशाली होगा और तो और शिक्षा में व्याप्त ट्यूशन और नकल जैसी कुरीतियों का भी अंत हो जाएगा। विद्यार्थियों के संकल्प फौलादी होंगे तथा शिक्षा संस्थानों में छात्र रौनक बढ़ेगी। अतः तीसरे निदेशालय के प्रपंच में न पड़कर उपरोक्त गुणों को अपनाना अधिक प्रासंगिक है। इनसे पूर्व स्थापित शिक्षा निदेशालयों की कार्यशैली को चार चांद लगेंगे। तीसरे निदेशालयों के गठन से नौकरशाही तथा लालफीताशाही का विस्तार होगा तथा आर्थिक बोझ बढ़ेगा। तीन निदेशालयों की तुलना में दो निदेशालयों को निखारने के लिए पिछले लंबे अरसे से लंबित पड़े सुधारों को लागू करना अति अनिवार्य है। यदि ऐसा होता है, तो सरकारी स्कूलों से अभाव का साया मिट सकेगा तथा शिक्षा संबंधी चिंताओं को तर्कशील आधार मिलेगा।

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