पाकिस्तान की मंशा क्या है?

रविवार की देर रात में पाकिस्तान की तरफ से दस राकेट दागने और मशीनगन से फायरिंग करने की मंशा क्या थी? यह कश्मीर की कृष्णाघाटी में हुआ और एक भारतीय चौकी को निशाना बनाया गया। इससे पहले पाक प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने हमारे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह पर तोहमत लगाने की नालायकी दिखाई थी कि भारत ने समग्र संवाद की शुरुआत नहीं की। पाक प्रधानमंत्री बताएंगे कि उनकी जमीन से दागे गए राकेट क्या ‘युद्धविराम’ संधि का उल्लंघन नहीं है? अथवा अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत प्रवास से पहले पाकिस्तान अपनी असली सूरत दिखाने पर आमादा है? पाकिस्तान की जमीन और सरहदों से ऐसा होता आया है। जब 2000 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को दिल्ली आना था, तो दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के छत्तीसिंहपुरा गांव में एक अमानवीय आतंकी हमला किया गया था। अब तो डेविड हेडली जैसे आतंकी ने खुलासा कर दिया है कि वह हमला भी लश्कर-ए-तोएबा की ही साजिश थी। क्या उसमें पाक की संलिप्तता से इनकार किया जा सकता है? पाक ने भाड़े के दहशतगर्दों के जरिए पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के भारत आगमन से भी पहले ऐसा ही खूनी उत्पात मचाया था। आखिर पाकिस्तान की मंशा क्या है? क्या वह इन हथकंडों के जरिए कश्मीर मुद्दे पर अमरीकी राष्ट्रपति का हस्तक्षेप चाहता है? क्या वह ऐसी शुरुआत कराना चाहता है कि आजाद कश्मीर के पाकिस्तान में विलय से कश्मीर की गुत्थी सुलझने लगे? क्या कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय विवाद है, जो अमरीका अपनी टांग अड़ा कर हस्तक्षेप कर सकता है? या कश्मीर से परे वह अमरीका का बराबर का फोकस खींचना चाहता है? हालांकि 9/11 के बाद पाकिस्तान को अमरीका से करीब 20 अरब डालर की मदद मिल चुकी है कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखे, लेकिन लश्कर सरीखे आतंकी संगठन अलकायदा की ताकत और रणनीति को भी पार करने लगे हैं। अभी वाशिंगटन में तीसरे सामरिक संवाद के दौरान अमरीका ने पाक को साफ तौर पर समझाने की कोशिश की थी कि भारत के हौवे को भूल जाए। हर मुद्दे पर ‘भारत-भारत’ चिल्लाना छोड़ दे, लेकिन पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने ऐसा करने में असमर्थता जता दी, तो इसे क्या कहेंगे? यदि भारत पाक के लिए ‘हौवा’ है, तो स्थायी समाधान कैसे निकलेंगे? बेशक  अमरीका सुझाव के तौर पर हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन दबाव से कश्मीर का कोई हल तय करने की हैसियत में नहीं है अमरीका! संयुक्त राष्ट्र में भी कश्मीर सुलझ नहीं सका और राकेट दागकर और फायरिंग का खौफ पैदा कर न तो भारत की सहनशीलता को भड़काया जा सकता है और न ही दूसरे इरादों से बाध्य किया जा सकता है। यदि भारत कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा मानने पर सहमत होगा, तो ही पाकिस्तान के साथ इस मुद्दे पर संवाद हो सकता है। अलबत्ता कश्मीर की आजादी और अंतरराष्ट्रीय विवाद का राग तो शेख अब्दुल्ला के वक्त से ही गाया जा रहा है, लेकिन कश्मीर यथावत भारतीय व्यवस्था का अंग है। वैसे भी अमरीकी राष्ट्रपति के दफ्तर से अपेक्षाओं का जो एजेंडा हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय तक अमरीका के उप विदेश मंत्री विलियम बर्न्स ने पहुंचाया है, उसमें कश्मीर और पाकिस्तान का कोई उल्लेख नहीं है। पाक के साथ-साथ हुर्रियत कान्फ्रेंस को भी असलियत कबूल करनी चाहिए कि कश्मीर कोई अंतरराष्ट्रीय सरोकार नहीं है। कश्मीर को लेकर ढेरों शिकायतें हो सकती हैं? वे हमारे घरेलू विवाद का हिस्सा हैं। जो कश्मीरी तबके भारत सरकार से बेहद असंतुष्ट हैं, वे लगातार अपने पक्ष रखें। जिन इलाकों में सरकारी और सैन्य दमन के सिलसिले जारी हैं, उन पर जोरदार विरोध जताया जाता रहे। इस दौर में ‘गांधी’ बनने की कोशिशें फिजूल हैं। विलय का इतिहास दोहराना भी अप्रासंगिक है। बराक ओबामा इस देश और कश्मीर घाटी के अंदरूनी हिस्सों के आपसी विरोधाभासों पर क्या भूमिका निभा सकते हैं। यदि पाकिस्तान की मंशा युद्ध की और उसके जरिए बर्बाद होने की है, तो उसे स्पष्ट किया जाए। ओबामा हम सबके मेहमान हैं। उनका उसी तरह सामूहिक तौर पर स्वागत होना चाहिए।

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