भारत-जापान सहयोग

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जापान यात्रा के दौरान भारत व जापान के मध्य आर्थिक सहयोग समझौते पर हुई सहमति तथा असैन्य परमाणु पर वार्ता तेज करने के निर्णय से दोनों देशों के आपसी संबंध और मजबूत होने की संभावनाएं उजागर हुई हैं। टोक्यो में श्री सिंह और उनके जापानी समकक्ष नाओतो कान के बीच हुई वार्ता कई मायनों में महत्त्वपूर्ण तो है ही, एशियाई में भारत की स्थिति को और मजबूती प्रदान करती है। एक ओर जहां भारत व जापान के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (सीईपीए) पर सहमति से दोनों देशों के मध्य व्यापारिक संबंध और उदार हो सकेंगे। वहीं बेहतर निवेश का माहौल भी तैयार हो सकेगा। जैसा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी स्वीकार किया है अभी भी भारत व जापान व्यापार उम्मीद से कम है। इसमें असंतुलन बना हुआ है। यदि भारत की उम्मीद के अनुसार वर्ष 2012 तक द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डालर से अधिक हो पाए, तो उसे एक उपलब्धि स्वीकार किया जाएगा। इन दिनों चीन व्यापार के क्षेत्र में भारत व जापान के लिए प्रतिस्पर्धा क्यों न उत्पन्न कर रहा हो, दोनों देश आर्थिक सहयोग और व्यापार के क्षेत्र में आदान-प्रदान की असीम संभावनाएं लिए हुए हैं। वैसे भी भारत ने वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते जैसे अपनी आर्थिक प्रगति को बनाए रखा है। वह दुनिया भर के लिए एक मिसाल बना है। वैसे भी दोनों देश स्वाभाविक मित्र का दर्जा बनाए हुए हैं। उस लिहाज से सीईपीए पर सहमति को ऐतिहासिक सफलता करार देना गलत नहीं है। यहां प्रधानमंत्री का यह आश्वासन भी मायने रखता है कि भारत अनुकूल निवेश माहौल और विदेशों से अधिक निवेश प्रवाह हेतु आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को जारी रखना चाहता है। आर्थिक सहयोग समझौते की तरह भारत व जापान के बीच जापान की कुछ हिचकिचाहट के बावजूद असैन्य परमाणु करार पर बातचीत की गति तेज करने का निर्णय तथा उससे जुड़े अनुबंध कमोबेश भारत की परमाणु नीतियों से मेल खाती हैं। इस पर वार्ता संभवतः अगले माह हो पाएगी, जिसमें असैन्य परमाणु करार पर मतभेद दूर हो पाएंगे। फिलहाल दिक्कत यह है कि जापान-भारत परमाणु परीक्षण पर स्वैच्छिक रोक से आगे कुछ आश्वासन चाहता है, जिसका अर्थ व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि को अंगीकार करना होता। भारत ने इस विषय में अपने स्टैंड को कभी छिपाए नहीं रखा है। इसलिए उसने जापान पर अपनी विवशताओं से हटकर असैन्य परमाणु करार न थोपने की बात भी कही है। यह अलग बात है कि भारत ने इस संदर्भ में अपनी शर्तें मान्य होने का मुद्दा भी रखा है। विश्व, विशेषकर दक्षिण एशिया में उभर रहे सामरिक माहौल और उससे जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए इस दिशा में एक स्पष्ट नीति को अपनाया जाना जरूरी है, ताकि भारत के परमाणविक शक्ति के शांतिपूर्वक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की संकल्पबद्धता के साथ उसके धंधों के दुष्परिणामों से बचा जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत व जापान की किसी अगली बैठक में इस पर कोई सहमति बन पाएगी। यहां जापान को भी यह समझ लेना चाहिए कि इस मुद्दे पर भारत अपने भिन्न मापदंड लेकर नहीं चल सकता। अमरीका, रूस व फ्रांस के साथ हुए उसके समझौते इन्हीं मापदंडों पर आधारित हैं। भारत इस मामले में उन सभी शर्तों का डटकर विरोध करता रहा है, जो भारत पर कुछ बेमेल प्रतिबंध थोपती है।

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