मत घबराएं वीजा फीस वृद्धि से

– डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

अमरीका यदि वीजा फीस न्यून रखता है, तो भारतीय इंजीनियर ज्यादा संख्या में आएंगे और अमरीकी कर्मियों के रोजगार समाप्त होंगे। दूसरी तरफ यदि वीजा फीस में वृद्धि की जाएगी, तो कार्य भारत को आउटसोर्स किया जाएगा और पुनः अमरीकी रोजगार का हनन होगा…

अमरीकी अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल अभी भी छाए हुए हैं। पिछले समय में कुल उत्पादन में मामूली वृद्धि हुई है, परंतु रोजगार का क्षरण अभी भी जारी है। उत्पादन में यह वृद्धि अमरीकी सरकार द्वारा उत्प्रेरणा पैकेज लागू किए जाने के कारण हुई है, परंतु कंपनियों द्वारा आटोमेटिक मशीनों के उपयोग से श्रम की मांग कम होती जा रही है। बेरोजगारी दस प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। विदेशी इंजीनियरों को अमरीका में प्रवेश के लिए अमरीकी सरकार से एच-1 बी वीजा लेना होता है। इस वीजा के लिए देय फीस में अमरीकी सरकार ने भारी वृद्धि की है। सोच है कि इससे कम संख्या में विदेशी इंजीनियर प्रवेश करेंगे। तदानुसार घरेलू इंजीनियरों के लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी। महंगे अमरीकी इंजीनियरों को सस्ते भारतीय इंजीनियरों से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी होगी। वीजा फीस में की गई वृद्धि प्रथम दृष्ट्या भारत के लिए हानिकारक एवं अमरीका के लिए लाभप्रद दिखती है। भारतीय कर्मियों के लिए अमरीका में रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे, अतः भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने अमरीका के इस निर्णय की भर्त्सना की है। तत्काल अमरीकी इंजीनियरों को मिलने वाले रोजगार में कुछ वृद्धि होने की संभावना है, परंतु यह आकलन अल्पकाल के लिए ही सही बैठता है। जैसे नुक्कड़ की आटा चक्की में पिसाई दर में वृद्धि कर दी जाए, तो अल्प समय में उसे लाभ होता है, पंरतु कुछ समय बाद उसके ग्राहक कम हो जाते हैं। कुछ परचून की दुकान से गेहूं के स्थान पर आटा खरीदने लगते हैं, तो कुछ पास के मोहल्ले की चक्की पर चले जाते हैं और कुछ पैकेट वाला आटा खरीदने लगते हैं। इसी प्रकार वीजा फीस में वृद्धि के कारण अल्प समय में भारतीय इंजीनियरों को नुकसान एवं अमरीकी इंजीनियरों को लाभ होगा, परंतु दीर्घकाल में विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अमरीका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के विवेक वाधवा के अध्ययन के अनुसार अमरीका द्वारा पेटेंट करवाई गई तकनीकों में 40 प्रतिशत अप्रवासियों द्वारा इजाद की गई हैं। अप्रवासियों द्वारा स्थापित कंपनियों में 450000 रोजगार अमरीका में उत्पन्न किए गए हैं। इसी बात को माइक्रोसाफ्ट कंपनी के प्रमुख बिल गेट्स कहते हैं। आप लगातार मांग करते हैं कि एच-1बी वीजा की संख्या को बढ़ाया जाए, जिससे उनकी कंपनी को निपुण एवं प्रतिभावान भारतीय इंजीनियरों की सेवा प्राप्त हो सके। भारतीय इंजीनियरों की उपलब्धि कम होने से अमरीकी कंपनियों को महंगे एवं कमजोर अमरीकी इंजीनियरों से काम लेना होगा, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा शक्ति में हृस होगा। आज दुनिया के 90 प्रतिशत कम्प्यूटरों में माइक्रोसाफ्ट द्वारा बनाया गया विंडोज साफ्टवेयर चल रहा है। निपुण भारतीय इंजीनियरों को अमरीका जाने को नहीं मिलेगा, तो वे भारत में ही साफ्टवेयर बनाएंगे। संभव है कि वे विंडोज से उम्दा साफ्टवेयर बना लें। तब माइक्रोसाफ्ट का बाजार ध्वस्त हो जाएगा। अतएव दीर्घकाल में अमरीका के लिए वीजा फीस में वृद्धि हानिप्रद रहेगी। भारत में दीर्घकाल में अच्छा प्रभाव पड़ने की संभावना है। दूर संचार का विस्तार होने से दूर बैठे लोग आपस में बातचीत कर सकते हैं, जैसे वे आमने-सामने बैठे हों। वेब कान्फ्र्रेंसिंग के माध्यम से दूर बैठे व्यक्ति का चित्र टीवी स्क्रीन पर आ जाता है और आपस में चर्चा हो सकती है। आजकल न्यायालयों द्वारा जेल में बैठे मुल्जिम से साक्षात्कार वेब कान्फ्रेंसिंग से किया जा रहा है। मुल्जिम को न्यायालय तक लाने की अनिवार्यता नहीं रह गई है।

वेब कान्फे्रेसिंग से आसानी से बातचीत हो जाने के कारण भारतीय कंपनियों ने इंजीनियरों को अमरीका भेजना पहले ही कम कर दिया है। अमरीकी ग्राहक से ठेके लेकर वे वेब कान्फे्रसिंग के द्वारा बंगलूर से ही काम करा लेते हैं। भारतीय कंपनियों द्वारा एच-1बी वीजा की मांग कम की जा रही है। इन्फोसिस ने 2008 में 4559 वीजा की मांग की थी, जबकि 2009 में मात्र 440 वीजा की मांग की है। विप्रो, सत्यम एवं टीसीएस द्वारा भी एच1बी वीजा की मांग बहुत कम की जा रही है। पूर्व में एच1बी वीजा का कोटा खुलने के प्रथम दिन ही पूरा समाप्त हो जाता था। खबर है कि इस वर्ष उपलब्ध 85000 वीजा के सामने केवल 28000 अर्जियां प्राप्त हुई हैं। एच1बी वीजा की मांग सहज ही कम हो रही है। इसमें फीस में वृद्धि करना मरे घोड़े को चाबुक लगाने जैसा है। वीजा फीस में वृद्धि के पूर्व ही साफ्टवेयर का अधिकाधिक कार्य भारत में किया जाने लगा है। गत वर्ष इन्फोसिस की 53 प्रतिशत आय भारत स्थित कार्यों से हुई थी। कंपनी के मुख्य अधिकारी क्रिस गोपालकृष्णन के अनुसार कंपनी 95 प्रतिशत कार्य भारत में करा सकती है। प्रयोग के रूप में दो ग्राहकों के कार्य को भारत को सफलतापूर्वक स्थानांतरित किया जा चुका है। अतः अमरीकी कंपनियों द्वारा भारतीय कंपनियों को साफ्टवेयर के ठेके पूर्ववतः दिए जाएंगे, चूंकि भारतीय इंजीनियर कम वेतन पर अच्छा काम करते हैं। अंतर यह होगा कि अब तक भारतीय कंपनियां आधे कार्य को अमरीका में और आधे कार्य को भारत में कराने का प्रयास करेंगी। इससे अमरीका को दोहरा नुकसान होगा। भारतीय इंजीनियर द्वारा अमरीकी कंपनी के ठेके पर कार्य करते समय की गई खोज का फैलाव भारत में ज्यादा होगा। दूसरा नुकसान यह होगा कि नई तकनीकों का आविष्कार भारत में होने लगेगा।  मेरी समझ में अमरीका फंस चुका है। यदि वीजा फीस न्यून रखता है, तो भारतीय इंजीनियर ज्यादा संख्या में आएंगे और अमरीकी कर्मियों के रोजगार समाप्त होंगे। दूसरी तरफ यदि वीजा फीस में वृद्धि की जाएगी, तो कार्य भारत को आउटसोर्स किया जाएगा और पुनः अमरीकी रोजगार का हनन होगा। साथ-साथ अमरीका की तकनीकी अगुवाई भी कमजोर पड़ेगी। अतः भारत को इस प्रकरण से हताश नहीं होना चाहिए, बल्कि अमरीका के बढ़ते संरक्षणवाद का लाभ आउटसोर्सिंग के माध्यम से उठाने को कमर कसनी चाहिए। यदि साफ्टवेयर लिखने की बौद्धिक क्षमता का उत्पादन भारत में दस लाख रुपए में हो जाता है और अमरीका में उसी क्षमता के उत्पादन की लागत 50 लाख आती है, तो भारत की विजय ही होनी है। भारतीय बुद्धि को बाहर रखने से अमरीका का क्षय होना ही है। इस प्रपंच में न पड़कर अमरीका को भारतीय संस्कृति के उन गुरों को अपनाना चाहिए, जिनसे बुद्धि का उत्पादन कम मूल्यों पर हो जाता है, जैसे हाथ में मोली बांधना, माथे पर टीका लगाना, मंदिर की परिक्रमा करना, गंगा एवं अन्य पवित्र नदियों में स्नान करना, घंटा एवं शंखनाद करके पूजा करना, धूप जलाना इत्यादि। भारतीयों को भी अपनी इस सफल परंपरा का निर्वाह एवं सम्मान करना चाहिए और पश्चिम की अकुशल जीवन शैली का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।

 

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