शिमला के फेफड़ों की ताजगी

शिमला के फेफड़ों की मजबूती का सवाल न भी हो, लेकिन धूम्रपान से मुक्त होकर यह शहर अपने संस्कारों के कारण देश में अलग दिखाई देगा। यह प्रशंसा का विषय है कि हिमाचल सरकार राजधानी की हवा को धूम्रपान के प्रतिकूल प्रभाव से पूर्ण रूप से मुक्त कर रही है। पहले ही सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान की मनाही का असर पूरे प्रदेश में महसूस किया जा रहा है और अब अगर शिमला व अन्य शहरों में धूम्रपान पर प्रतिबंध लगता है, तो प्रदेश में स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से यह एक सार्थक कदम होगा। देश में पर्यावरण सुरक्षा के मामले में हिमाचल ने जिस तरह श्रेष्ठता हासिल की, उसी तरह धूम्रपान के खिलाफ छेड़ा गया अभियान भी यादगार बनेगा। यह तंबाकू के इस्तेमाल तक ही सीमित न होकर, नशामुक्ति के हर उपाय का सबब बने, तो प्रदेश की युवा पीढ़ी को बचाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश हिमाचल में नशे की गिरफ्त में कई युवा अपना भविष्य अंधकारमय कर रहे हैं, लेकिन न समाज कुछ कर पा रहा है और न ही सरकारी स्तर पर किए गए प्रयत्न असरदार हो रहे हैं। बेशक चंद नशामुक्ति केंद्रों के योगदान को सराहनीय माना गया, लेकिन एक पीढ़ी को बचाने के लिए कई अन्य प्रयास करने पड़ेंगे। प्रदेश में पर्यटन के संदर्भ नशाखोरी से जुड़े हैं और जहां मलाणा क्रीम की ब्रांडिंग में हिमाचल अभिशप्त हो रहा है। कई पर्यटन केंद्र अपने विविध आकर्षणों के अलावा नशे के अड्डे भी बन रहे हैं। यह केवल अफीम-चरस तक ही नहीं, बल्कि कई प्रकार की दवाइयों का सेवन भी इसी उद्देश्य से होने लगा है। प्रारंभिक तौर पर धूम्रपान से सौ फीसदी दूर होकर शिमला अगर अलग छवि बना रहा है, तो भविष्य में इसी तर्ज से नशामुक्ति पर भी सोचा जा सकता है। फिलहाल शराब सेवन के हिसाब से भले ही हिमाचल की तिजोरी फूल रही है, लेकिन सामाजिक परिदृश्य में यह ग्रामीण माहौल के खिलाफ है। प्रदेश के ग्रामीण अंचल में, मेहनत-मजदूरी कर रहे वर्ग की आंतों में जमाहो रहा शराब, शाप के मानिंद बहुत कुछ छीन रहा है। छोटे-छोटे गांवों में शराब की अवैध दुकानों की संख्या का निरंतर प्रसार सेहत के लिए खतरनाक है, साथ ही पारिवारिक जीवन के खिलाफ भी एक बड़ी चुनौती है। सरकार को इस दिशा में सोचना होगा या संबंधित विभागों को अवैध शराब के धंधे में बर्बाद होते जीवन को बचाने का सामूहिक प्रयास करना चाहिए। बहरहाल, शिमला का धूम्रपान वर्जित होना, एक बड़ी उपाधि है और इससे शहर की ताजगी में पर्यटन उद्योग की सांसें मजबूत होंगी। निश्चित तौर पर धूमल सरकार की ऐसी पहल का स्वास्थ्य व सामाजिक तौर पर व्यापक असर होगा। पोलिथीन मुक्त प्रदेश को धूम्रपान मुक्त बनाने की दिशा में सरकार ने जो बीड़ा उठाया है, वह सामाजिक सहयोग के बिना पूरा नहीं हो सकता। सामाजिक जिम्मेदारी केवल सामुदायिक भावना से ही सुनिश्चित होती है। पोलिथीन मुक्त हिमाचल में कुछ शहरी आबादी का योगदान तो प्रशंसनीय रहा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में संदेश की चोरी हो गई। इसी तरह नगरों में चला सफाई अभियान भी स्थायी रूप से प्रभावशाली नहीं हो पाया। उम्मीद करनी चाहिए कि शिमला को धूम्रपान मुक्त करने में समाज पूरी तरह निर्णायक भूमिका निभाएगा। नागरिक सतर्कता जब तक सरकारी पक्ष का साथ न दे, घोषणाओं के अर्थ मुकम्मल नहीं होते। देश के चौथे धूम्रपान मुक्त शहर बनने का अर्थ कोई भौगोलिक सीमांकन नहीं, बल्कि शिमला के बाशिंदों की नशे पर पहली जीत है और इसी तर्ज पर अन्य व्यसनों पर काबू पाने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।

You might also like