अप्रासंगिक हिमाचली पत्रिकाएं

प्राकृतिक नजारों से ओतप्रोत पहाड़ी प्रदेश का हर कोना लेखकों के लिए वरदान है। यही कारण है कि यहां एक से बढ़कर एक सृजनकर्ता मौजूद है, लेकिन नहीं है उनके सृजन को स्थान और पहचान। प्रदेश सरकार के भाषा-संस्कृति विभाग से लेकर तीनों विश्वविद्यालय और निगम बोर्ड कोई न कोई पत्रिका प्रकाशित करते हैं, लेकिन प्रकाशन क्या हो रहा है, लेखक कौन है, किस पत्रिका की कितनी प्रतियां छप रही हैं, किसको वह मिली है, आज भी एक अबूझ पहेली है। हर लेखन समाज के लिए आईना है, भविष्य के लिए मार्गदर्शन है, लेकिन प्रदेश का सरकारी प्रकाशन अपने ही नियमों, उद्देश्यों और लक्ष्यों के साथ उल्टी चाल चल रहा है। एक सीमित ढर्रा उसका आधार है। यही कारण है कि सरकार के मुख्य प्रकाशन ‘गिरिराज’ से लेकर भाषा विभाग की ‘विपाशा’, हिमाचल की आर्थिकी के आधार पर्यटन विभाग की ‘मोनाल’ शिक्षा बोर्ड की ‘ज्ञान लोक’ के अलावा भाषा विभाग की ही ‘फिक्रोफन’, ‘सोमसी’, ‘हिम भारती’, ‘श्यामला’ समेत अन्य निगमों बोर्डों की पत्रिकाएं ‘बंधुआ’ स्थिति में हैं। क्या छप रहा है, कौन छप रहा है, पत्रिकाएं किसको मिल रही हैं, सब कुछ सीमित। न हिमाचली लेखक, न सरोकार। ‘अंधा बांटे रेवडि़यां मुड़-मुड़ अपनों को दे’ कहावत चरितार्थ हो रही है। जितने लेखक उतनी ही पत्रिका की प्रतियां। ‘मैंने लिखा-मैंने पढ़ा’ से आगे कुछ नहीं। सरकारी प्रकाशन में हिमाचल की स्थिति सदा डांवांडोल ही रही है। जो सरकारी पत्रिकाएं छपती हैं वे आर्थिक रूप से कभी स्वावलंबी नहीं हो पाईं। कारण कुछ भी हो सकते हैं समय पर प्रकाशन न होना, संपादन में पक्षपात.. नई प्रतिभाओं की उपेक्षा ‘सरकारी काम है, बस चलता है’ वाली मानसिकता के कारण भी ये पत्रिकाएं ज्यादा प्रभावित नहीं कर पातीं। नई प्रतिभाओं का आक्षेप रहता है कि उन्हें प्रोत्साहन नहीं मिलता, उन्हें छापा नहीं जाता या तो प्रदेश से बाहर के लेखकों को वरीयता दी जाती है या फिर प्रदेश के भी केवल स्थापित, पुराने लेखक ही बार-बार छपते हैं। यह सही भी है, परंतु यह भी सही है कि लेखन अपनी-अपनी लड़ाई है..निरंतर संघर्ष का नाम ही लेखन है। एक कविता या एक कहानी लिखकर विश्वकोश में अपना नाम ढूंढने वाले तो निराश होंगे ही। तो समाधान क्या है? सरकारी पत्रिकाओं को बंद कर देना चाहिए या फिर नई प्रतिभाएं शीर्षक से मासिक या त्रैमासिक पत्रिका सरकार निकाले। सरकारी पत्रिकाएं घाटे में चलती हैं, इनकी प्रासंगिकता सीमित है। विश्वविद्यालयों की शोध पत्रिकाएं भी या तो छपती नहीं या फिर सफेद हाथी हैं। इसलिए अधिकांश विश्वविद्यालयों की शोध-पत्रिकाएं बंद हो गई हैं। अब शोध पत्रों की बजाय शोध पुस्तकें छपने लगी हैं। एक और खतरनाक प्रचलन हुआ है…दूसरे प्रदेश की संस्थाएं या पत्र-पत्रिकाएं हिमाचल पर केंद्रित अंक छाप रही हैं और यहां के अतिथि संपादक अपनी जांघ थपथपाते हुए अपने बाडे़ के लेखकों को महान घोषित कर वाहवाही लूटने के सम्मोहन में समाधिस्थ हैं। ‘आकंठ’ मध्य प्रदेश की पत्रिका का हिमाचल की कविता पर केंद्रित अंक ऐसा महत्त्वपूर्ण अंक है जो हिमाचल के लेखकों, संपादकों की गुटबंदी को बेशर्मी से उजागर करता है। आधा-अधूरा अंक जिसमें न हिमाचल की हिंदी कविता पर कोई संदर्भ लेख है और न ही हिमाचल के वरिष्ठ कवियों की रचनाएं हैं। जो अंक के सूत्रधार हैं, उन्होंने अपने ही इंटरव्यू पत्रिका में दिए हैं…बूढे़ लेखकों के इंटरव्यू…जबकि युवा रचनाशीलता की बात उठाई गई है।

आलोचकों के भी नाम उद्घोषित कर दिए गए हैं, लेकिन कबूतर यदि आंख बंद भी कर ले, तो क्या बिल्ली झपटेगी नहीं। इस समय हिमाचली लेखक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां वह दिग्भ्रमित है। मुंडू बनकर ख्याति अर्जित करे। अपने बलबूते पर लडे़…पत्र-पत्रिकाओं का मुखापेक्षी न हो…पत्र-पत्रिकाएं बंद समझें। बहुत से प्रश्न हैं, जो अनुत्तरित रह जाते हैं, क्योंकि हिमाचल में प्रकाशन की सुविधा नहीं, दिल्ली दूर है और हिमाचल अकादमी जो एकमात्र प्रकाशन संस्थान हो सकता है, आरंभ से ही
विपन्न रही है…वैसे हिमाचल की राजभाषा हिंदी है… इसलिए यह नारा लगाकर जय हिंदी, जय नागरी कह कर गुनगुनी धूप का मजा लो और प्रासंगिकता-अप्रासंगिकता को अभी हवा में लटकने दो, क्योंकि हिमाचल में कोई सुनने वाला नहीं है।

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