अब तो जाग जाओ

दिहिः हिमाचल के कितने करीब हैं अनुपम?

अनुपम ः जहां मैं पला-बढ़ा हूं। शिक्षित हुआ हूं, वहां का एक-एक कण मेरे शरीर में रचा-बसा है, इससे ज्यादा क्या कहूं।

दिहिः जिस शिखर पर आप हैं, वहां से हिमाचल कैसा नजर आता है?

अनुपमः जहां भी हूं, यह सब आप लोगों की दुआओं और प्यार का ही फल है। आज भी जब किसी प्राकृतिक नजारे को किसी फिल्म में देखता हूं अपने प्रदेश की याद ताजा हो जाती है।

दिहिः फिल्म निर्माताओं की नजर में कहां है हिमाचल?

अनुपमः हर फिल्म निर्माता इस खूबसूरत -शांत प्रदेश के हर नजारे को कैद कर समूचे भारत को लुभाना चाहता है, लेकिन सुविधाओं का अकाल उसे निराश कर देता है, जिस राज्य पर प्रकृति इतनी मेहरबान हो, साधन संपन्न हो, वहां फिल्म उद्योग के लिए कुछ न होना निर्माताओं को परेशान करता है।

दिहिः  इसके लिए हमें क्या करना होगा? ‘फिल्म सिटी’ कितनी जरूरी?

अनुपमः फिल्म सिटी…? अरे कई सालों से यहां के रहनुमाओं से आग्रह कर रहा हूं, लेकिन कोई नहीं सुनता। तीन-चार बार पहले भी बात हुई, पर आज भी इस दिशा में राज्य ‘शून्य’ पर खड़ा है, इससे ज्यादा दुखदायी क्या हो सकता है। फिल्म सिटी बहुत जरूरी है, बाकी सुविधाएं तो उसका हिस्सा हैं।

दिहिः एक्टिंग स्कूल कैसा चल रहा है?

अनुपमः बहुत बढि़या। बहुत खुश हूं कि इस क्षेत्र से जुड़ने के बाद अब बच्चों को अभिनय सिखा रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे स्कूल से निकलने वाला हर छात्र खूब नाम कमाए?

दिहिः क्या हिमाचलियों को आपके एक्टिंग स्कूलों में कोई छूट है?

अनुपमः वह क्यों? छूट क्यों? सारे हिंदोस्तान के लोग मेरे स्कूल में अभिनय सीखने आते हैं। मेरे लिए सब बराबर हैं। मुझे आप लोगों ने क्या दिया है, जो मैं कुछ करूं?

दिहिः प्रदेश के लिए संदेश?

अनुपमः बहुत कुछ है आपके पास। बस जरूरत है तो सिर्फ उसे समझने और जागने की। अगर आज यहां फिल्मों से जुड़ी जरूरतें पूरी होती हैं, तो पर्यटन के बाद यह क्षेत्र प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ बन सकता है।

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