टैक्स के चक्कर में दुकानदारी बन गई सिरदर्द

By: Nov 26th, 2010 7:25 pm

– ओंकार ठाकुर, लेखक, उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग शिमला के पूर्व सदस्य हैं

अब आलम यह है कि अगर कोई दुकानदार कम से कम लाभ पर भी चीज बेचता है, तो खरीददार फिर भी यही कहता है कि यह मुझे लूट रहा है। जब महंगाई आसमान छूने लगी, तो उसका भी कारण दुकानदार ही बना…

एक समय था जब देश में और प्रदेश में केवल दो ही पेशे जाने जाते थे- एक थी जमींदारी और दूसरी दुकानदारी। दोनों एक दूसरे पर निर्भर थे। ग्राम में पुराने समय में जमींदारी किसानगिरी बहुत कठिन कार्य माना जाता था अतः थोड़े आरामफरोश परिवार दुकानदारी की तरफ मुड़ जाते थे, क्योंकि इसमें एक बार मुनीमगिरी करने के बाद यह पेशा आसान गिना जाता था और यही नहीं, बल्कि इज्जतदार कहलाता था। जहां भी कोई उत्सव ग्राम में होता था, तो दुकानदार को बड़ी इज्जत से लाला जी कहकर अच्छे स्थान पर बिठाया जाता था। आजादी के बाद बदलाव आया। घरों में छोटी-छोटी सहूलियत की वस्तुओं की जरूरत बढ़ी। इस जरूरत को देखते हुए कुछ एक समृद्धशाली दुकानदारों ने लघु उद्योग लगा लिए और कई फर्में तथा कंपनियां खड़ी कर लीं और आगे समान बनाकर ग्राम की छोटी-मोटी दुकानों को बेचना शुरू कर दिया। यहां पर अब उचित और अनुचित लाभ की बात सामने आई। कुछ मतलबप्रस्त दुकानदारों ने अनुचित लाभ उठाने शुरू कर दिए और जब यह बुराइयां बल पकड़ने लगीं, तो सरकार ने निरीक्षकों की फौज खड़ी करके उन पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया।

इसी सिलसिले में दुकानदारों पर दबाव बढ़ाना और कम करना अब इन निरिक्षकों पर आ गया, जिसकी वजह से उन्हें सरकारी वेतन के अलावा ऊपरी धन का लालच आ गया। जब दोनों में खिंचाव बढ़ता गया, तो अनुचित ढंग से धन एकत्रित करने का ठीकरा दुकानदार के सिर पर फोड़ दिया। कुछ हद तक यह ठीक भी था, क्योंकि इस अनुचित प्रथा को यानी कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी कुछ एक मतलबी दुकानदारों की वजह से मिला, परंतु जैसे एक गंदी मछली सारे तालाब के पानी को गंदा कर देती है इसी प्रकार कुछ ऐसे गिने चुने दुकानदारों की मतलबपरस्ती ने सारे पेशे को मुनाफाखोरों का पेशा बना दिया।  अब आलम यह है कि अगर कोई दुकानदार कम से कम लाभ पर भी चीज बेचता है, तो खरीददार फिर भी यही कहता है कि यह मुझे लूट रहा है। समय में और बदलाव आया सरकार ने विभिन्न उद्योगों पर कर लगा दिए, भाव बढ़ता गया फिर आखिर में वैट लगा दिया। उससे भी कीमतें बढ़ीं। सरकारी नौकरी में वेतनों में बढ़ोतरी हुई, बार-बार चुनाव आए, कीमतें बढ़ती गईं, परंतु इसका धब्बा केवल दुकानदार पर ही लगा। चोर बाजारी बढ़ाने में किस-किस का हाथ था, इसका खुलासा किसी ने भी कभी नहीं किया।

जब महंगाई आसमान छूने लगी, तो उसका भी कारण दुकानदार ही बना। बेशक कुछ एक दुकानदारों ने माल छिपाकर महंगाई को बढ़ावा दिया, परंतु उसकी संख्या बहुत कम थी, जबकि उसका धब्बा सभी को लगा। किसी ने यह आवाज नहीं उठाई कि बढ़ती हुई महंगाई के साथ-साथ ग्राम में हर आदमी की प्रतिदिन की आमदनी में भी सरकार बढ़ोतरी करे। हां अब नरेगा लाकर सरकार ने पहली बार ग्राम के निर्धन आदमी की पुकार को सुना है और उससे आम आदमी की खरीददारी की शक्ति बढ़ी है, परंतु दुकानदारी के खिलाफ आवाज उठती गई और अब आखिर में प्रदेश सरकार ने सस्ते मूल्य की दुकानें खोलकर पीडीएस सिस्टम चालू कर दिया। इस प्रकार जो आटा दुकान पर 18 रुपए प्रति किलोग्राम बिकता है, वही आटा सरकारी डिपो पर 8.30 रुपए प्रति किलो मिलने लगा।

तेल दुकान पर 90 रुपए प्रति किलो तो सरकारी दुकान पर 45 रुपए। यही बात दालों की और चीनी की है। इसलिए सारे का सारा खरीददार अब लंबी कतारों में सरकारी दुकान पर आ गया। ग्राम में छोटी दुकानदारी साफ होती गई। सबसे बड़ी बात यह हुई कि यह सस्ता राशन बिना किसी आय का ध्यान रखकर सभी को देना शुरू कर दिया। अब ग्राम का दुकानदार सुबह दुकान पर आता है और शाम को खाली हाथ वापस आ जाता है। उस निर्धन की नरेगा के मजदूर जितनी आमदनी भी नहीं होती। वह अपने पुरखी कार्य को छोड़ भी नहीं सकता, क्योंकि मजदूरी करने के काबिल वह है नहीं और सरकारी नौकरी आज के जमाने में मिलने से रही। अतः इस ओर ध्यान देना अति आवश्यक हो गया है।

मजे की बात यह है कि सरकारी दुकान पर सामान भारी सरकारी सबसिडी पर मिलता है। किसी नेता ने यह नहीं लोगों को समझाया कि यह सबसिडी हजारों रुपए तनखाह लेने वालों के लिए नहीं है, बल्कि केवल बीपीएल परिवारों के लिए है, क्योंकि ऐसा करने से उनके वोट बैंक पर फर्क पड़ता है।

आज जरूरत है इस उजड़ते हुए व्यवसाय को बचाने का उपाय ढूंढा जाए, नहीं तो कल को यही लोग समाज पर बोझ बन जाएंगे।

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