संकट में हैं भद्र प्रधानमंत्री

By: Nov 25th, 2010 7:17 pm

– प्रो. एनके सिंह, लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं

दुर्भाग्य है कि हमारे प्रधानमंत्री जो अपने निजी जीवन में बेशक ईमानदार हैं, लेकिन बुराई से निपटने के लिए वह जरूरत से भी अधिक भद्र और नेक हैं…

हाल ही में संसद में जो शोर-शराबा हुआ है, उससे प्रशासन की सबसे भद्दी तस्वीर सामने आई है। प्रजातांत्रिक संसद का सबसे कुरूप चेहरा सामने आया है। कई दिनों से चर्चा एक ही बात की हो रही है, लेकिन बैठकर हल निकालने की कोई बात नहीं हो रही है। देश में जो कुछ हुआ है, उसमें कोई संदेह नहीं कि यह भ्रष्टाचार की अपार बढ़ोतरी और कुशासन बढ़ा है। एक के बाद एक घोटाले के कारण देश की छवि खराब हो रही है और कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं बचा है, जो यह दावा कर सके कि वह अन्य दलों से ज्यादा पवित्र है। धन की अंधी दौड़ में कांग्रेस और डीएमके तो बुरी तरह से फंसे ही थे, ऐसे में भाजपा के साथ जो बंगलूर में हुआ, वह भी पारदर्शी न होने का सबसे बुरा प्रमाण था। ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी भी शीघ्र ही ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कन्फ्यूजन बन गई, क्योंकि हर कोई एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहा है। आज तक बनी चार ऐसी संयुक्त संसदीय कमेटियों के कोई सही परिणाम नहीं आ सके और देश में निरंतर बढ़ रहे घोटालों में कोई कमी नहीं आई है। ऐसे में देश इस तरह की बिना रोक-टोक से चल रही लूट के खिलाफ क्या कर सकता है? एक सर्वेक्षण के अनुसार जानकारी देने वालों में 80 प्रतिशत लोगों ने यह कहा कि वे मानते हैं कि दोषी को सजा नहीं मिल पाएगी। अगर आप इंटरनेट के सर्वेक्षण देखें, तो कई दुखी नागरिक प्रजातंत्र की इस बुराई को और भी अधिक कोस रहे हैं। उनका कहना है कि हम इस प्रशासन की सफाई करने में नाकाम इसलिए हैं, क्योंकि जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के जिम्मेदार हैं, वे स्वयं इस बुरे शासन का हिस्सा हैं और संसदीय प्रजातंत्र का मुख्य भाग हैं। कुछ क्रोधित प्रतिक्रिया देने वाले तो यहां तक कहते हैं कि यहां भी चीन की तरह भ्रष्ट लोगों को गोली मार देनी चाहिए, बजाय इसके कि जांच की लंबी प्रक्रिया चले। न्यायिक जांच में भी बहुत समय लग जाता है और फिर भी भ्रष्टाचार थमने का कोई उपाय सामने नहीं आता। दुखद तो यह है कि सरकार के मुखिया और राष्ट्र के नेता को भ्रष्टाचार को मिटाने की पहल करनी होगी। दुर्भाग्य है कि हमारे प्रधानमंत्री जो अपने निजी जीवन में बेशक ईमानदार हैं, लेकिन बुराई से निपटने के लिए वह जरूरत से भी अधिक भद्र और नेक हैं। जब मैं स्टील कारपोरेशन में काम करता था, तो वहां भी इसी तरह के न मानने वाले अधिकारी थे। उस समय कंपनी के जो चेयरमैन थे और मेरे बॉस थे, उन्होंने जो मुझे बताया, वह मैं सारी उम्र नहीं भूल सकता। मैं उनके साथ एक भ्रष्ट व्यक्ति को निलंबित करने के मामले पर उनके साथ चर्चा कर रहा था और मैं चाहता था कि उस पर अनुशासनिक कार्रवाई हो, तो उन्होंने मुझे कहा कि तुम बुरे व्यक्ति को इसलिए नहीं समझ सकते, क्योंकि तुम निष्कपट व्यक्ति हो। बुरे लोगों को समझने के लिए जरूरी है कि तुम्हारे दिमाग में भी कुछ बुराई हो। मेरा मानना है कि भद्र प्रधानमंत्री पर भी यही बात लागू होती है, जो ए राजा को पत्र तो लिखते रहे, लेकिन यह नहीं समझ पाए कि ऐसे व्यक्ति के साथ कड़ाई के साथ पेश आना चाहिए था। अब राजा दावा करते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसकी पूरी जानकारी प्रधानमंत्री को थी। यहां तक कि विपक्ष भी प्रधानमंत्री को भ्रष्ट लोगों की श्रेणी में नहीं रखता, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुखिया होने के नाते उन्हें केवल पत्र लिखने के बजाय कोई ठोस कदम उठाना चाहिए था। प्रधानमंत्री की नाकामयाबी का कारण  ही उनकी भद्रता और शालीन व्यवहार है, जबकि नेता होने के नाते उनसे अपेक्षा यह थी कि वह ऐसे मामलों में सख्ती से कदम उठाएं। राष्ट्र के नेता होने के नाते उन्हें अपनी टीम को अनुशासित रखने का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए और भटकों को सही राह पर लाना चाहिए। कोई भी जेपीसी ऐसा नेतृत्व नहीं दे सकता। ऐसे में संसदीय प्रजातांत्रिक देश को सबक लेना चाहिए कि जब-जब जरूरत पड़ी, तो इंदिरा गांधी ने किस तरह से कड़ाई से फैसले लेने का साहस दिखाया।

हिमाचल में स्वास्थ्य सेवाओं का भविष्य

अब टांडा में सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल बन रहा है। ऐसा लगता है कि यह विचार बड़ी देर के बाद आया, जबकि इसके बारे में पहले ही सोचा जाना चाहिए था। मैं कई बार चौंक जाता हूं कि हिमाचल में स्पेशलिस्ट स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। धर्मशाला जैसे शहर में कोई हड्डियों का विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं है। मैं कुछ ऐसे स्थानीय लोगों को जानता हूं, जो दांतों या अन्य जटिल रोगों के इलाज के लिए बाहर जाते हैं। टांडा को पीजीआई की तरह बनना चाहिए था या फिर कम से कम उसके दूसरे नंबर का होना चाहिए था। हाल ही में समाचार पत्रों में घुटने बदलने की शल्य चिकित्सा का सुखद समाचार आया था, अगर मैं इसे भी एक उपलब्धि की तरह मान रहा हूं, तो अभी हमें और कितना आगे जाना होगा। लगभग एक साल से हम सुन रहे हैं कि मुफ्त एंबुलेंस सेवा शुरू होगी, लेकिन अभी तक केवल घोषणाएं ही हुई हैं और हकीकत में कुछ भी नहीं हो पाया है। देश में प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु दर हिमाचल की सबसे अधिक है, यहां तक कि यह राष्ट्रीय औसत दर से भी अधिक है। कम्प्यूटर इंटरनेट पर सरकारी साइट में स्वास्थ्य विभाग का 2012 का बहुत बड़ा सपना दिखाया गया है, लेकिन साइट पर मुख्यमंत्री की ही तारीफों के पुल बांधे गए हैं और उसमें केवल यही दिखाया गया है कि मुख्यमंत्री की सोच क्या है। इसमें वर्ष भर की उपलब्धियों और कई नौकरशाहों का तुच्छ विवरण ही दिया गया है। जरूरी यह है कि हम योजनाओं का खाका बनाकर लक्ष्य निर्धारित करें, ताकि जान सकें कि क्या कुछ उपलब्ध किया जा सका है। यह जरूरी नहीं है कि उन अनजान लोगों द्वारा तैयार किया गया विवरण बनाकर रखा जाए, जो विषय को समझते तक नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि हजारों हिमाचली इलाज के लिए लाखों खर्च करके पड़ोसी राज्यों में जा रहे हैं। सबसे अधिक संख्या दुर्घटनाओं में मरने वालों की है, जिन्हें केवल पीजीआई के लिए रैफर कर दिया जाता है और वे रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। क्या सरकार में मौत और जिंदगी के सवाल पर कोई जल्दी है?

बस स्टाप

पहला यात्री ः क्या आपने सुना कि भाजपा के मुख्यमंत्री बंगलूर से दिल्ली आए और खो गए और सारी रात उनका पता तक नहीं चल पाया?

दूसरा यात्री ः शायद वह अपना कार्यालय छोड़ने से पूर्व कंपनियों से अपनी उगाही करने गए होंगे या फिर वह नाइट शो देख रहे होंगे।

 

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