खर्च कटौती की असलियत

तपोवन (विधानसभा) में वर्ष 2008 में आयोजित किए गए शीतकालीन सत्र पर लगभग 80 लाख रुपए का खर्च आया था। पिछले वर्ष यह दर 46 लाख के आसपास बताई गई। अब इसे कम करके लगभग 36-37 लाख रुपए करने की कवायद है। राज्य सरकार ने उन्हीं सचिवों व अफसरों को धर्मशाला सत्र के दौरान आवाजाही करने की अनुमति दी है, जिनकी वहां आवश्यकता है। अन्य विभागाध्यक्ष जरूरत पड़ने पर ही वहां आ सकेंगे। शिमला में आयोजित सत्र के दौरान हिमाचल प्रदेश सचिवालय की राजधानी में ही मौजूदगी के चलते कोई भारी-भरकम खर्च सरकार को वहन नहीं करना पड़ता है। दोपहर के भोजन के दौरान ही विधायकों, मंत्रियों व पत्रकारों पर औसतन 500 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से खर्च का आकलन किया गया है। धर्मशाला में भी इसी दर से दोपहर के भोजन पर खर्च आता है। जबकि विधायकों को दैनिक भत्ते के तौर पर 500 रुपए और वाहन खर्च के तौर पर 10 रुपए प्रति किलोमीटर की दर से खर्च अदा किया जाता है। यही दर विधानसभा द्वारा आयोजित विभिन्न कमेटियों की बैठक के दौरान भी तय की गई है। कई विधायकों ने इसकी पुष्टि भी की है। दोनों क्षेत्रों के विधानसभा सत्र के खर्च का यदि तुलनात्मक आकलन करें तो धर्मशाला में वाहन आवाजाही व ठहरने का खर्च भारी पड़ता है, जबकि शिमला में ठहरने व वाहनों का खर्च नाममात्र का होता है। जिसका आकलन नहीं किया गया है। राज्य सरकार ने वर्ष 2008 के मुकाबले पिछले सत्रों में जहां खर्च में कटौती की है, वहीं इस बार भी कटौती का प्रयास है। धूमल सरकार का यह किफायती कदम विधानसभा सत्र के लिए ही नहीं, बल्कि आम दिनों के लिए भी लागू है। मुख्यमंत्री खुद इसकी मिसाल पेश कर चुके हैं। ओकओवर से सचिवालय तक मुख्यमंत्री पैदल जाते हैं। इसे पर्यावरण संरक्षण के लिए भी बेहतरीन कदम बताया गया है। हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री की मिसाल अभी तक अन्य किसी मंत्री द्वारा नहीं प्रस्तुत की गई है। सरकार द्वारा उठाए गए किफायती कदमों के तहत फोन बिलों, निजी यात्राओं के दौरान खर्च में कटौती के साथ कार्यालय में प्रयोग की जाने वाली स्टेशनरी के प्रयोग में भी किफायत बरतने के आदेश काफी पहले दिए जा चुके हैं।

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