ठोस संकल्प चाहिए

Dec 22nd, 2010 12:02 am

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा कांग्रेस महाधिवेशन के समापन पर भ्रष्टाचार का डट कर मुकाबला करने तथा कार्रवाई के स्तर पर उसका सबूत देने का आश्वासन इस बारे में कांग्रेस की ओर से समय-समय पर किए गए वादों को ही दोहराता है। यदि वास्तव में ऐसा हो पाए, तो उसे एक उपलब्धि माना जाएगा। जहां तक सार्वजनिक जीवन में घर कर चुके भ्रष्टाचार का प्रश्न है, आज भी देश आकंठ भ्रष्टाचार की दलदल में धंसा हुआ है। इससे कब निजात मिल पाएगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन है। आखिर कहीं तो कुछ ऐसे कारण होंगे, जो इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ समय से जिस तरह टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले तथा सत्ता की सौदागिरी को लेकर कारपोरेट सेक्टर तथा राजनेताओं का घालमेल सामने आया है, वह भ्रष्टाचार की नई परत खोलता है। भ्रष्टाचार निरोधक कार्यनीतियां तय करते हुए इन सब बातों को ध्यान में रखना होगा। यह भी कि उसकी जड़ों पर कैसे चोट की जाए? इस सिलसिले में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की यह रिपोर्ट कम चौंकाने वाली नहीं है कि घूसखोरी की 1500 से अधिक शिकायतों की जांच में केंद्र सरकार के विभागों द्वारा विलंब किया जाता रहा है। इनमें से कई शिकायतें तीन साल से लंबित पड़ी हैं। सबसे अधिक शिकायतें रेल मंत्रालय (117) तथा 97 केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) तथा दिल्ली नगर निगम (68) व दिल्ली विकास प्राधिकरण (58) से जुड़ी हैं। कमोबेश अन्य विभाग भी इस मर्ज से अछूते नहीं रहे हैं। सीवीसी का यह आकलन सरकारी महकमों में घूसखोरी की एक मिसाल भर है। उससे भ्रष्टाचार के मकड़जाल का अंदाजा लगाना कठिन नहीं होना चाहिए, लेकिन यहां सीवीसी की वार्षिक रिपोर्ट में जो मुख्य कारण बताए गए हैं, वे चिंता का विषय हैं। इनमें शिकायत के बावजूद जांच न करने, अधिकारियों द्वारा जांच के प्रति पूरी तरह से उदासीन होने तथा सक्षम अधिकारियों के अभाव जैसे कारण शामिल हैं। यदि खुद सरकारी विभाग ही इस तरह घूसखोरी व भ्रष्टाचार की शिकायतें दबाकर बैठे रहेंगे, तो सुधार कैसे संभव होगा? इसी तरह केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लै का यह कथन भी कम चिंताजनक नहीं है कि देश में पुलिस की भर्ती प्रक्रिया भ्रष्टाचार से ग्रसित है। यह भी कि लगभग हर राज्य में कांस्टेबल और सब-इंस्पेक्टर की नियुक्ति रिश्वत दिए बिना नहीं हो पाती। यदि स्थिति वास्तव में ऐसी है, तो उस पर प्रशासन कैसे सोया रहता है? यदि कानून की रक्षक मानी जाने वाली पुलिस का यह हाल होगा, तो उसे भक्षक होने से कौन रोक पाएगा? भ्रष्टाचार को लेकर देश की संसद में और उससे बाहर चलती रही बहस ने इस ओर पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया है। राजनीतिक स्तर पर विभिन्न राजनीतिक दल सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की घुसपैठ को लेकर एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। इसी कशमकश के कारण संसद का शीतकालीन सत्र बर्बाद हो गया। कोई उपयोगी कार्य नहीं हो पाया। ऐसे में यह देखना और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि राजनेताओं व अन्य के स्तर पर होते रहे अरबों के घोटाले व भ्रष्टाचार में उनकी कथित संलिप्तता को लेकर देश कितना सजग व सतर्क हो सकता है। राजनीति की स्वच्छता के लिए क्या यह जरूरी नहीं कि हमारा सार्वजनिक जीवन इस तरह की अनियमितताओं से मुक्त हो पाए और समाज को बेहतर वातावरण मुहैया करवाया जाए? यदि यह कार्य केवल नारों और आश्वासनों से पूरा हो सकता, तो आज तक बहुत कुछ हो जाता, लेकिन इसका न होना यह दर्शाता है कि अभी किसी तरह की ठोस पहल और ठोस राजनीतिक संकल्प की जरूरत बाकी है।

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