तपोवन में सत्र का कितना तप

तपोवन (धर्मशाला) में स्थापित किया गया विधानसभा परिसर अब राजनीतिक मजबूरी बन गया है। भले ही वर्ष 2005 में तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने इस परिसर का निर्माण कांगड़ा की अनदेखी के आरोपों के चलते किया था, मगर अब यह कांग्रेस ही नहीं भाजपा के लिए भी मजबूरी बन गया है।  विधानसभा परिसर पर करीबन 16 करोड़ रुपए का खर्च किया जा चुका है। बुद्धिजीवी वर्ग की मानें तो विधानसभा परिसर के स्थापन से लोगों को राहत भी मिली है। लोग भले ही चार दिन के लिए मुख्यमंत्री व मंत्रियों से मिलें, मगर उनकी समस्याओं का वहां समाधान निकलता है। कांगड़ा ही नहीं, साथ लगते चंबा, मंडी, बिलासपुर व हमीरपुर के लोग भी इसका लाभ उठाने पहुंचते हैं। समाज का अक्षम वर्ग जो आर्थिक तौर पर मजबूत नहीं है। अपनी दिक्कतों के समाधान के लिए शिमला नहीं आ सकता, ऐसे वर्ग के लिए विधानसभा परिसर संजीवनी साबित होता है। हालांकि राज्य सरकार जनवरी में भी शीतकालीन प्रवास के दौरान कांगड़ा व प्रदेश के अन्य इलाकों के दौरे पर निकलती है। इस दौरान भी लोगों की समस्याओं का बड़े स्तर पर समाधान होता है, मगर जानकारों की राय में विधानसभा परिसर के स्थापन से वहां मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों, अफसरशाही की मौजूदगी के बीच लोगों को लाभ भी मिलता है।  उनकी राय में सरकारी खर्च में कटौती अन्य मदों पर भी की जा सकती है। मसलन विभिन्न महकमों का कार्यभार संभाले मंत्री व अन्य पदाधिकारियों को दी जाने वाली वाहन सुविधा का ही यदि आकलन किया जाए, तो यह करोड़ों में बनती है। जरूरत इस बात की है कि ऐसी फिजूलखर्ची में कटौती हो।  विधानसभा परिसर के स्थापन से जहां लोगों की दिक्कतों का समाधान होता है, वहीं उन्हें इस दौरान पूरी सरकार से कांगड़ा में ही रू-ब-रू होने का अवसर भी हासिल होता है। विधानसभा के प्रश्नकाल के एक घंटे समेत यदि आवश्यक चर्चाओं को छोड़ दें तो शेष समय में मंत्री, विधायक व अफसर लोगों की दिक्कतों के समाधान के लिए पर्याप्त समझे जाते हैं। भले ही वीरभद्र सिंह सरकार ने इसे राजनीतिक मजबूरियों के चलते कांगड़ा में स्थापित किया, मगर अब यह लोगों की भावनाओं से जुड़ा सवाल ही नहीं, मुद्दा बन चुका है। जानकार मानते हैं कि किसी भी सरकार को इस परिसर को शिमला में ही स्थायी तौर पर तबदील करने की सूरत में यह दूसरे दल के हाथों राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

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