नगर निकाय कहीं हक न छीन लें

हिमाचल में गांवों से पलायन बढ़ने से शहरों का विस्तार जोर पकड़ने लगा है। ग्रामीण हमेशा ही शहरी निकाय में जुड़ने का विरोध करते आए हैं। नगर निकाय में ग्रामीण क्षेत्रों के शामिल हो जाने से ग्रामीणों के सारे अधिकार छिन जाते हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि निकाय में जुड़ने के बाद भी ग्रामीणों को जलापूर्ति, रास्ते, रोशनी व शौचालय इत्यादि सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। प्रदेश में जब किसी शहर का विस्तार किया गया हैं, तब-तब इसके खिलाफ विरोध के स्वर उठते रहे हैं। 18 अक्तूबर, 1996 को तत्कालीन प्रदेश सरकार ने अधिसूचना जारी करके शिमला के आसपास के 59 गांवों को नगर निगम शिमला में शामिल किया। जब ग्रामीणों ने कृषक संघर्ष समिति का गठन करके इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया, तो सरकार ने 17 जनवरी, 1997 को गांवों की संख्या घटाकर 30 कर दी। इससे 13 पंचायतें प्रभावित हो रही थीं। इसी तरह का विरोध पालमपुर में निकाय के विस्तार को लेकर किया गया। ग्रामीण जनता शहरी निकाय में नहीं जुड़ना चाहती है। सोलन नगर परिषद को नगर निगम बनाया जाना प्रस्तावित है। इसे बनाने की कवायद में समीप के चार दर्जन से अधिक गांव निकाय में समायोजित किए जाएंगे, जिसका अभी से विरोध शुरू हो गया है। मंडी शहरी निकाय के विस्तार को लेकर भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं। निकाय में शामिल होने के बाद ग्रामीणों को छोटे-छोटे कामों के लिए उपायुक्त कार्यालय या फिर टीसीपी/निकाय के चक्कर काटने पड़ते हैं। यहां तक की छोटी सी पशुशाला के निर्माण को भी उक्त महकमों के चक्कर काटने पड़ते हैं। पंचायतों के समय के बने क्षेत्रों को निकाय में शामिल करने के बाद वर्षों से खून-पसीने की कमाई से बने मकान नियमित करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। प्रदेश में अवैध निर्माण के दायरे में आने वाले अधिकांश मकान चूंकि लोगों के पुश्तैनी मकान हैं, जो कि शहरी निकाय में शामिल करने से पूर्व पंचायतों के समय में बने हैं। गौर योग्य बात है कि शहरों के विस्तार से पूर्व ग्रामीणों को विश्वास में नहीं लिया जाता है। यही वजह रही कि ग्रामीणों ने इनका विरोध किया।

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