लेकिन शहर को नहीं खबर

तो हिमाचल छोटे-मोटे गांवों से बना राज्य है,लेकिन विकास की अंधी दौड़ गांवों को दीमक की भांति खोखला कर रही है। ग्रामीणों में शहर की तरफ भागने की होड़ सी लगी हुई है। विडंबना यह है कि न तो राज्य सरकार, न शहरी विकास विभाग और न ही नगर एवं ग्राम नियोजन महकमे के पास प्रदेश के शहरों को सुव्यवस्थित ढंग से बसाने के लिए कोई योजना है। व्यवस्थित शहर बसाने को सरकार का विजन न होने का नतीजा है कि आज भी प्रदेश के अधिकतर शहरों में बिना पूर्व योजना के शहर बसाए जा रहे हैं। शहर में उपलब्ध भूमि का आवश्यकता से अधिक दोहन हो रहा है। इससे शहरों में जमीन की कमी खलनी शुरू हो गई है। लोग एक-एक इंच भूमि भी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। नतीजतन शहरों में रास्ते भी नहीं बचे हैं। इससे लोगों में आपसी विवाद उपजे हैं। रही सही कसर सरकार द्वारा समय-समय पर बनाए जाने वाले लचीले कानून पूरा कर रहे हैं। इन कानूनों को लोगों ने पेचीदा शर्तों के कारण हमेशा ही नकारा है। चाहे वह ग्राम पंचायतों के अंतर्गत पड़ने वाले क्षेत्रों को नगर-निकायों में शामिल करने की सरकार की योजना हो या फिर लोगों की सहमति के बगैर नए-नए कानून बनाकर जनता पर थोपना हो। राज्य सरकार व टीसीपी महकमा शहरी विकास के प्रति कितना संजीदा हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हिमाचल के 54 प्रमुख शहरों में से 34 शहर ऐसे हैं,जिनके लिए अब तक डिवेलपमेंट प्लान ही नहीं बने हैं,जबकि टीसीपी एक्ट हिमाचल के 20 प्लानिंग व 34 स्पेशल एरिया में समान रूप से लागू होता है। टीसीपी महकमा ठियोग, वाकनाघाट, डलहौजी प्लानिंग एरिया तथा रिकांगपिओ, कैलांग, काजा, पांगी, भरमौर, चमेरा, पंडोह, हाटकोटी, खजियार, सराहन, उदयपुर, मणिकर्ण, चायल, ताबो, रोहतांग, सोलंग, चामुंडा, नैरचौक, जाबली, बड़ोग, कंडाघाट, बीड़-बिलिंग, बाबा-बालकनाथ, पौंग-डैम, त्रिलोकपुर, गरली-परागपुर, नग्गर, हेरात स्पेशल एरिया को डिवेलपमेंट प्लान नहीं बना पाया हैं, जिससे इन शहरों में अन-प्लान्ड कंस्ट्रक्शन हो रही है। बिना डिवेलपमेंट प्लान के हो रही कंस्ट्रक्शन से हिमाचल में अवैध भवनों की तादाद निरंतर बढ़ती जा रही है। प्रदेश में सबसे अधिक अवैध निर्माण डलहौजी, धर्मशाला, शिमला, सोलन तथा मंडी में हो रहा है। इन शहरों में कई कालोनियां ऐसी विकसित हो चुकी हैं,जहां मृत व्यक्ति के शव को घरों से बाहर कुर्सी पर निकालना पड़ता है। ऐसे शहरों में घरों के साथ एंबुलेंस रोड तथा सेट-बैक तो दूर राज्य में अपना ‘हिमाचल प्रदेश टाउन एंट कंट्री प्लानिंग एक्ट-1977’ लागू होने के बावजूद अवैध निर्माण नहीं रुक रहा है। एक्ट की धारा 39 ए (1) में अवैध निर्माण शुरू होते ही काम पर रोक लगाने की शक्तियां टीसीपी, साडा, नगर निगम, नगर परिषद, नगर पंचायत को दी गई हैं, लेकिन प्रभावशाली लोगों की राजनीतिक पहंुच के कारण अवैध निर्माण रोक पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। लोग टीसीपी निमयों को ठेंगा दिखाकर अवैध भवन खड़े कर रहे हैं। राज्य में इससे टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट मखौल बनकर रह गया है। टीसीपी, साडा व स्थानीय निकाय को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट लागू करने में मुंह की खानी पड़ रही है। हिमाचल में शहरों के विकास में जमीन की कमी व सियासी दलों के राजनीतिक हित सबसे बड़ा अडं़गा साबित हो रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टी यदि विकास करना भी चाहे तो विपक्षी दल वोट बैंक बढ़ाने के लिए अडं़गा डाल देते हैं।

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