अंतरिक्ष में शतक

भारत ने अंतरिक्ष में अपने सौवें अंतरिक्ष मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देकर एक नया इतिहास रचा है। इससे भारत के उन आलोचकों को भी मुंह तोड़ जवाब मिल गया होगा जो भारत जैसे गरीब देश द्वारा ऐसे कार्यक्रमों पर किए जा रहे भारी व्यय पर सवाल उठाते रहे हैं। भारत की यह कामयाबी पश्चिम के ऐसे देशों के लिए भी एक सबक है, जो भारत को अभी तक बैलगाडि़यों व सपेरों का देश करार देते आए हैं। 1975 में भारत की पहली अंतरिक्ष यात्रा से लेकर आज तक की भारत की उपलब्ध्यिां उसकी प्रखर क्षमता व मेधा की सबूत हैं। भारत की अगले पांच वर्षों में 28 मिशन छोड़ने की योजना है, जिसमें 25 राकेट तथा 33 उपग्रह शामिल हैं। उस लिहाज से भारत की वर्ष 2014 में चंद्रयान-2 मिशन के प्रति दुनिया भर की निगाहें टिकी रहना स्वाभाविक हैं। भारत ने अपने सौवें अंतरिक्ष मिशन के तहत पीएसएलबी सी-21 के माध्यम से दो विदेशी उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित किया है। यह उपग्रह फ्रांस तथा जापान के थे। कल तक प्रक्षेपण के लिए अन्य बड़े देशों पर निर्भर करते रहने के बाद यह स्थिति भार के लिए कम उपलब्धिपूर्ण नहीं है। भारत कई बार स्पष्ट कर चुका है कि वह स्पेस में चीन या किसी अन्य से होड़ में नहीं रहना चाहता। इसी प्रकार भारत का मंगल मिशन का उद्देश्य विज्ञान के नए आयाम खोजना है। भारत गत पांच वर्षों में अंतरिक्ष के क्षेत्र में 20 हजार करोड़ रुपए खर्च चुका है। इस दौरान हालांकि कुछ नाकामयाबियां भी उसके हाथ लगी हैं, लेकिन इससे उसका उत्साह मंद नहीं पड़ना चाहिए। केंद्र द्वारा इसरो के मंगल मिशन को मंजूरी उसके उत्साह को बढ़ाने के लिए काफी है, जैसा कि इसरो के अध्यक्ष डा. के राधाकृष्ण ने स्वीकार किया है। मंगल मिशन क्योंकि एक समयबद्ध कार्यक्रम है, इसे नई प्रौद्योगिकी और अनुप्रद्योगों का विकास भी होगा। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने अंतरिक्ष मिशन केंद्र से 100वें मिशन का प्रक्षेपण देख कर भारतीय वैज्ञानिकों का उत्साहवर्धन किया है। इसके साथ ही अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए बजट प्रावधान में भी और वृद्धि करने की आवश्यकता है। इसरो को सालाना बजट के तौर पर मात्र चार हजार करोड़ रुपए मिलते हैं, जो उसकी वास्तविक जरूरतों से कम है। यहां यह नहीं भूलना होगा कि देश का विकास आखिरकार उसकी प्रौद्योगिकी आधारित कौशल का ही परिणाम है और देश को उसके व्यापक और सामाजिक लाभ मिले हैं। स्वयं प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों को दी गई बधाई में इस पक्ष को स्वीकार किया है। यहां इस बात का श्रेय भी भारतीय वैज्ञानिकों को दिया जाना चाहिए कि अब भारत अंतरिक्षयात्रियों को लोअर अर्थ आर्बिट में ले जाने के लिए कार्यक्रम तैयार करेगा। अपने नए प्रयोग के साथ वह विश्व स्पेस मार्केट में ऊंची उड़ान भर चुका है। यहां इसरो के प्रमुख जी माधवन नायर का यह आत्मविश्वास काबिले तारीफ है  कि यदि दो ट्रांपापोंडर्स के साथ उन्हें दो लाख करोड़ रुपए मिल जाए, तो वे पूरी दुनिया का स्पेस कार्यक्रम चला सकते हैँ। कुछ क्षेत्रों में इसे माधवन के अतिउत्साह की संज्ञा ही क्यों न कहा जाए, भारत ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में वह स्वयं को दुनिया के चोटी के दावेदारों से कहीं कम नहीं है। इसके लिए भारत के वैज्ञानिक साधुवाद के अधिकारी हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विस्तार की अभी असीम संभावनाएं हैं, जिन्हें भारत को और आगे तलाश करना है।

You might also like