अगले जन्म मोहे सरकारी कर्मचारी ही कीजो

By: Sep 17th, 2012 12:15 am

(सुरेश कुमार लेखक, योल कांगड़ा से हैं)

घोषणाएं बजट की बेबसी नहीं देखतीं। वोट बटोरने के लिए वाहवाही की बैसाखियां इन घोषणाओं का ही उद्घोष है। सरकारी पालने में बैठे कर्मचारी कोष पर भी कुंडली मारे हुए हैं। सरकार का हर पिटारा कर्मचारियों को ही कद्दावर बनाता है। सरकारी दर्पण में सिर्फ कर्मचारियों का ही अक्स उभरता है। आम आदमी तो इस आईने के आसपास भी नहीं फटकता। मंत्रिमंडल की हर बैठक में कर्मचारियों को मिलते तोहफे बजट का बैंड बजाते दिखते हैं। महंगाई के मानदंड तो मजदूर के लिए भी वही हैं, जो कर्मचारियों के लिए, तो फिर बजट की बरसात सिर्फ कर्मचारियों पर ही क्यों? कर्मचारी और मजदूर में करोड़ों और कौड़ी का फर्क क्यों? मजदूर की दिहाड़ी 20 रुपए बढ़ती है तो कर्मचारी करोड़ों डकार कर भी असंतुष्ट। प्रदेश की 68 लाख की आबादी पर पौने तीन लाख कर्मचारियों की कदमताल भारी पड़ती है। सरकार को इन कर्मचारियों में रिपीट की राह दिखाई देती है, तभी तो तोहफों की तश्तरी उस कर्ज को भी झुठलाती नजर आती है, जिसे उतारने के लिए हर वर्ष कितना ही बजट किस्त अदायगी में चला जाता है। सरकार को सिर्फ कर्मचारियों के आंकड़े ही दिखते हैं कि कहीं ये पौने तीन लाख वोट सरकार को सांसत में न डाल दें। 68 लाख की आबादी अनसुनी रह जाती है, क्योंकि बजट का 60 फीसदी तो कर्मचारियों के वेतन-भत्तों की ही भेंट चढ़ जाता है। यह कैसी विडंबना कि पौने तीन लाख कर्मचारियों का बोझ पूरा प्रदेश ढोए। नौ लाख बेरोजगार किस उम्मीद से किस की तरफ देखें। बेरोजगार तो सरकार द्वारा परीक्षाओं की बदलती तिथियों से ही दिल बहलाते रहते हैं। कभी 4-9-14, कभी पे-बैंड, तो कभी गे्रड-पे की गूंज बजट को बेहाल करने के लिए काफी है। कर्मचारियों के वेतन-भत्तों के लिए लिया गया लोन पूरे प्रदेश का ही बजट बिगाड़ता है। कब तक सरकार लोन पर लोन लिए जाएगी। जब कर्मचारियों के वेतन-भत्ते ही लोन का लिबास ओढ़े हैं तो फिर कैसी समृद्धि, कैसे तमगे और कैसे सर्वेक्षण। वेतन-भत्तों के बोझ का ही नतीजा है कि सरकार गरीबों को दी जाने वाली सबसिडी की राशि घटाती जा रही है। सरकार इस स्थिति में भी नहीं कि सरसों के तेल को डिपुओं में जारी रख सके। दिन-प्रतिदिन वित्तीय मामलों में सरकार की पतली होती हालत के लिए जिम्मेदार कौन है? खुद सरकार ही, जो खजाने का मुंह सिर्फ कर्मचारियों की तरफ ही खोलती है। प्रदेश में ज्यादातर कर्मचारी वर्ग ही हड़तालों, बैठकों में मशगूल रहता है। हर हड़ताल सरकार को वेतन-भत्तों के लिए मजबूर करने के लिए ही होती है। बजट पर ज्यादा बोझ तो सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों का ही है। सरकार ने करोड़ों दे दिए हैं और अभी उनके एरियर का करोड़ों देना बाकी है। क्या ऐसा नहीं लगता प्रदेश की चादर छोटी है और पैर लंबे। और सरकार के लंबे पैर इन कर्मचारियों की ही देन है, वरना आम आदमी तो इस छोटी चादर में भी सब्र कर ले। सरकारी कर्मचारियों की कार्यप्रणाली देखो तो कछुआ चाल भी तेज लगे। पटवारी बिना पेशगी के पैमाइश नहीं करता जमीन की, पुलिस चाय-पानी के बगैर कहीं पांव नहीं धरती और हकीकत यह भी कि कितने ही कर्मचारी तनख्वाह के अलावा जाली बिलों से सरकार को चूना लगाने से भी नहीं चूकते। इसके विपरीत मनरेगा का मजदूर दिहाड़ी लगाने के बाद कितने ही दिन अपने मेहनताने की अदायगी की गुहार लगाता रहता है। सरकार का सौतेला व्यवहार तो सरेआम दिखता है, पर सरकार की आंखों पर रिपीट की पट्टी बंधी है। सरकार को सिर्फ रिपीट करना है, चाहे किसी को भी डिलीट करना पड़े। सरकार को पता होना चाहिए कि कर्मचारी बिन पैंदे के लोटा होते हैं। किस तरफ झुकेंगे कहा नहीं जा सकता। इनकी भूख सरकार ने खुद ही बढ़ा दी है और भूखा आदमी विश्वसनीय नहीं होता। कोई दूसरा ज्यादा दे देगा, तो बाजी पलटते देर नहीं लगेगी। अब तो संभलने का समय भी निकल चुका है। अब तो सरकार अपने रुझानों से ही खुद को रिझा ले, क्योंकि सत्ता का सारा कार्यकाल कर्मचारियों की चाकरी करता ही दिखा है। वरना आम आदमी तो चांद को ही रोटी समझ कर भूख मिटा रहा है। तो कौन नहीं चाहेगा अगले जन्म में सरकार के कर्मचारी बनना, जिसे सिर्फ लेना ही लेना है। देने के लिए आम आदमी जो है…

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