अनुबंध पर नौकरी किसी अभिशाप से कम नहीं!

(राजिंदर कुमार पंडित,लेखक, अंब से पूर्व पंचायत प्रतिनिधि ह)

आखिर अनुबंध कर्मचारी को नौकरी देकर वर्षों तक उसके भविष्य को अनिश्चितता में रखने के लिए किसे दोषी माना जाए? क्या यह हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त व्याख्यायित मौलिक अधिकारों का जनता की पोषक होने का दावा करने वाली हमारी सरकारों द्वारा उल्लंघन नहीं है…

कहने को सत्तासीन सरकारें आए दिन बेरोजगारी दूर करने की बातें करती नहीं थकतीं, मगर नौकरी के नाम पर अस्थायी रोजगार देकर जिस तरह से शिक्षित लोगों का शोषण किया जा रहा है अत्यंत चिंतनीय कहा जा सकता है। नौकरी के नाम पर सरकारी दफ्तर में हो रहा शोषण शायद सरकार में बैठे नुमाइंदों को नजर ही नहीं आता। कभी नौकरी मिलने पर कर्मचारी का परिवार भगवान का शुक्र मनाता था, मगर आज नौकरी मिलने के बाद भी चिंता रहती है कि कहीं अनुबंध पर मिली नौकरी चली न जाए। वेतन के नाम पर आलम ऊंट के मंुह में जीरे की कहावत चरितार्थ होती है। सरकार को कमाने के लिए कर्मचारी तो चाहिएं, मगर नियमित नहीं अनुबंध पर? कर्मचारी विभागीय प्रतिनिधि के रूप में नियमित कर्मचारी के पद पर कार्य करने को तो मान्य है। मगर वेतन-भत्तों, पेंशन, स्वास्थ्य लाभों को पाने का हकदार नहीं है, क्योंकि वह अनुबंध पर है। शायद इसलिए उसके भविष्य को लेकर रोजगार की पक्की नीति के बारे में कोई पुख्ता घोषणा नहीं हो पाई है। कोई भी वेतनवृद्धि तक नहीं है। मामला अनुबंध कर्मचारी का है, तो वह अपनी समस्या आखिर किससे कहें। अपने साथ किसी गलत व्यवहार की शिकायत वह किससे करे, अभी तक कोई भी ऐसा मंच किसी कार्यालय में तैनात नहीं है, अगर है तो किसी को जानकारी नहीं है। कई वर्षों तक काम करके सरकार के कार्यालयों को उन्नति तक ले जाने वाला अनुबंध पर तैनात कर्मचारी वेतन या किसी ठोस भविष्य नीति की कमी के कारण परिवार को पालने की मजबूरी के चलते सब सहने को मजबूर होता है। वहीं कई कार्यालयों में अनुबंध पर तैनात कर्मचारियों को जिन लक्ष्यों के लिए तैनात किया गया है, उनको भी कुछेक अधिकारी मनमाने कार्यों में लगाकर उनकी योग्यता व निर्धारित जॉब प्रोफाइल से हटकर काम लेने की कार्रवाई करते हैं, जिससे सरकार के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम व योजनाएं आम आवाम तक नहीं पहुंच पाती। कई बार ऐसे मामले सुर्खियों में रहते हैं। आखिर अनुबंध  कर्मचारी को नौकरी देकर वर्षों तक उसके भविष्य को अनिश्चितता में रखने के लिए किसे दोषी माना जाए। क्या यह हमारे संविधान में व्याख्यायित मौलिक अधिकारों का जनता की पोषक होने का दावा करने वाली हमारी सरकारों द्वारा उल्लंघन नहीं है। हमारे नेताओं को शायद आम कर्मचारी से कुछ सरोकार नहीं है, न ही उसकी समस्याओं से केवल चुनावी दौर के नजदीक सरकार को याद आती है। मगर अभी तक भी प्रदेश के तीस हजार के करीब अनुबंध तथा दैनिक वेतनभोगियों तथा विभिन्न विभागों के तहत चल रहे मिशनों, प्रोजेक्टों, समितियों, एजेंसियों या कंपनियों के माध्यम से काम कर रहे कर्मचारियों के बारे कोई सुरक्षित रोजगार नीति का ऐलान न होना स्पष्ट करता है कि इनकी चिंता किसी को नहीं है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकारी कार्यालयों से इन कर्मचारियों के बिना कोई काम सुचारू रूप से नहीं चल सकता यह सर्वविदित है। प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों के तहत चल रहे मिशनों, प्रोजेक्टों, समितियों, एजेंसियों या कंपनियों के माध्यम से कर्मचारी का दर्जा पाकर लोग सरकार के कार्यालयों की गाड़ी हांक रहे हैं, जबकि सर्वविदित है कि सरकार के कार्यालय से कर्मचारी रिटायर तो हो रहे हैं, लेकिन खाली पद नहीं भरा जा रहा है और न ही नियमित भर्तियां की जा रही हैं। आलम निजी संस्थानों जैसा नजर आ रहा है काम करो, जो मिलता है वेतन लो, कल क्या होगा, कोई सवाल न करो सरकार का नाम ही है बाकी कुछ नहीं, ऐसे में अनुबंध को किसी अभिशाप से कम नहीं आंका जा सकता। जहां सरकारी क्षेत्रों के साथ-साथ कई निजी क्षेत्रों में अनुबंध व दूसरे कर्मचारियों का ईपीएफ काटा जाता है, वहीं अनुबंध कर्मचारी का न तो ईपीएफ कटता है और न ही स्वास्थ्य भत्ता, क्या यह रोजगार उपलब्ध कराने के नियमों को  खुलेआम ठेंगा नहीं है। सरकारों को इस बारे में सोचना चाहिए कि जब नियमित कर्मचारियों व हमारे कर्णधार यानी नेताओं को सब पेंशन जैसी सुविधाएं हैं, तो सरकार जिनकी पालक होने का दम भरती है, आखिर उस कर्मचारी वर्ग की पेंशन जैसी सुविधा आखिर क्यों बंद की गई? अनुबंध पर काम कर रहे कर्मचारी जब सरकार के विभागों का काम कर रहे हैं, तो उनको सरकारी कर्मचारी को मिलने वाली सभी सुविधाएं आखिर क्यों नहीं दी जा रही हैं, जिनका वह हकदार है? आखिर जब यह वर्ग सरकारी कार्यालय में सरकार के काम को चलाने के लिए योग्य है, तो पद के अनुरूप वेतन भत्ते पाने का हकदार क्यों नहीं? 

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