अन्ना का नया पता

वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे ने उनके नेतृत्व में चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को राजनीतिक महत्त्वकांक्षाओं से दूर करने का संकेत देकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की पहल की है। इसे अरविंद केजरीवाल और उनके संगठन इंडिया अगेंस्ट क्रप्शन (आईएसी) से दूरी बनाने के संकेत के तौर पर भी लिया जा सकता है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब अन्ना हजारे ने पिछले तीन दिनों में दूसरी बार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को लेकर तल्ख टिप्पणी की है। अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़ने के इच्छुक लोगों को सीधे रालेगण सिद्धि आकर उनसे मिलने का निर्देश दिया है। असल में जबसे अन्ना हजारे और उनकी टीम के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू किया गया है, तब से ही उसके विभिन्न सदस्यों द्वारा उसके लक्ष्य को लेकर दिए जाते रहे बयानों के कारण न केवल क्रांति उत्पन्न हुई है, उनका अभियान अपने मकसद से भी भटक गया है। इनमें सबसे बड़ा विवाद इस प्रश्न को लेकर रहा कि क्या इस अभियान को राजनीति से जुड़ना चाहिए या कोई अपनी नई पार्टी खड़ा कर चुनावों में उतरना चाहिए। विशेषकर जबकि आम चुनाव काफी निकट हैं। जनता भी देश में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा उससे निपटने में राजनीतिज्ञों के नाकामयाब रहने पर कुछ नए विकल्प खोजने लगी है। इससे पूर्व अन्ना हजारे के सहयोगी रह चुके अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया तथा किरण बेदी जैसे सदस्य आंदोलन के राजनीति में उतरने पर भिन्न राय क्यों न रखते हों, अन्ना हजारे ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनका संगठन न तो राजनीति में और न ही चुनावों में उतरेगा। उन्होंने अपने इस कार्यक्रम का खुलासा कर दिया है। उनकी नजर में राजनीति समाज को बेहतर भविष्य नहीं दे सकती। यह भी कि उनका मकसद है कि अच्छे लोग राजनीति में आएं। यहां उनकी यह टिप्पणी भी निरर्थक नहीं दिखाई देती कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रश्न पर पक्ष और विपक्ष कोई भी गंभीर नहीं है। पिछले कुछ समय से संसद की कार्रवाई में बाधाओं का आना, लोकपाल विधेयक तथा अन्य गंभीर मसलों का लटके रहना, यह सिद्ध करता है कि कहीं न कहीं राजनीतिक संकल्प का अभाव है। यह भी कि इन मुद्दों पर आगे बढ़ने के बजाय उनका ध्यान 2014 के आम चुनावों की तरफ टिका है। यही कारण है कि वे एक-दूसरे की काट में लगे हैं। उनका यह भी मानना है कि हाल में जारी की गई पार्टियों की आय की सूची में दानदाताओं के नाम छिपाए गए हैं। ऐसा क्यों है? क्या यह इसलिए नहीं किया जा रहा कि दूसरों को सिद्धांतों और राजनीतिक शुचिता का पाठ पढ़ाने वाले राजनेता ऐसे मामलों में दूध के धुले नहीं हैं। अन्ना हजारे तथा उनके साथियों के नेतृत्व में चलाए जाते रहे आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिलता रहा है, लेकिन कुछ सवालों पर उसके सदस्यों में उभरते हुए आपसी भेदभावों व आंदोलन की धार को कम किया है। इस वजह उसमें बिखराव व अविश्वास की स्थिति भी उभरी है, अब जबकि अन्ना हजारे ने विभ्रम से उभरते हुए अपने समर्थकों को रालेगण सिद्धि का नया पता दिया है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि उनका आंदोलन फिर से पटरी पर आकर उसमें जनता द्वारा व्यक्त की गई आस्था को और मजबूत बनाने में सहायक होगा। किसी भी आंदोलन में बार-बार व्यवधान आने या उसके अपने मकसद से पिछड़ने के कारण शून्य का उभरना कोई शुभ लक्षण नहीं होता। प्रश्न भ्रष्टाचार उन्मूलन का हो या लोकपाल की स्थापना या विदेशों में जमा काले धन का, लक्ष्य भी स्पष्ट होना चाहिए कि हमंे जाना कहां है और क्या करना है?

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