अपनी सियासी विरासत के कुशल चितेरे थे सत महाजन

Sep 6th, 2012 12:15 am

(लेखक, जगदीश शर्मा, संसदीय पत्रिका के पूर्व वरिष्ठ संपादक हैं)

सत महाजन ने कभी भी नौकरशाही को अपने मंत्री पद पर हावी नहीं होेने दिया। वह विभागीय कामकाज की बारीकियों से पूर्णतः परिचित थे और फाइलों में उनकी सटीक नोटिंग के चलते सचिव स्तर के अधिकारियों में उनकी धाक थी और वह जनता की नब्ज को पहचानते थे…

वयोवृद्ध कांग्रेस नेता के पहली सितंबर, 2012 को दिल्ली में हुए निधन से हिमाचल विशेष कर कांगड़ा की राजनीति में भारी शून्य पैदा हो गया है। 1977 में जन लहर के विपरीत चुनाव जीतकर महाजन जी ने हिमाचल विधानसभा में पदार्पण किया। उसके बाद पांच बार विधानसभा का और एक बार लोकसभा का चुनाव जीतकर उन्होंने जनता जनार्दन पर अपनी पकड़ और राजनीतिक रण कौशल का तो परिचय दिया ही साथ ही चार बार प्रदेश के विभिन्न महत्त्वपूर्ण विभागों का जिस दक्षता और चतुराई से संचालन किया वह स्वयं में अद्वितीय है। सत महाजन ने कभी भी नौकरशाही को अपने मंत्री पद पर हावी नहीं होेने दिया। वह विभागीय कामकाज की बारीकियों से पूर्णतः परिचित थे और फाइलों में उनकी सटीक नोटिंग के चलते सचिव स्तर के अधिकारियों में उनकी धाक थी और वह जनता की नब्ज को पहचानते थे।  उनकी स्मरणशक्ति गजब की थी। पांच-सात साल बाद भी अगर किसी को मिलते थे तो तुरंत उसके नाम से उसे पुकारते थे। उनकी मिलनसारिता का तो आलम यहां तक था कि शायद ही कोई फरियादी उनके यहां से मायूस वापस आया हो। जनता का अपार स्नेह उन्हें प्राप्त था। मैं 1996-98 के दौरान उस समय उनके निकट संपर्क में आया, जब वह लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। मैं उस समय लोकसभा सचिवालय में कार्यवाही सारांश बनाने हेतु लोकसभा की कार्रवाई संपादक के रूप में कवरेज करता था। उस समय सुप्रीम कोर्ट से पौंग बांध विस्थापितों की याचिका पर ताजा-ताजा निर्णय आया था। एक दिन वह एकाएक मेरे कमरे में दाखिल हुए और कहने लगे कि क्या तुम्हारे पास सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रति है जगदीश, मेरे हां कहने पर उन्होंने तुरंत मुझे प्रधानमंत्री गुजराल को एक पत्र डिक्टेट कराया, जिसमें राजस्थान के मुख्यमंत्री को सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शीघ्र लागू कराने के लिए अनुरोध किया गया था। उस पत्र पर तुरंत कार्रवाई हुई और राजस्थान सरकार हरकत में आई। इसी तरह का एक और वाकया जो महामंत्री की कुशल सूझबूझ का परिचायक है, मुझे याद आता है। मैं उनके दिल्ली निवास पर लोकसभा में अगले पखवाड़े में महाजन जी द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों का ड्राफ्ट कराने में उनकी सहायता कर रहा था। इसी बीच उनके टेलीफोन की घंटी बजी। पता लगा, दिल्ली स्थित गद्दी विकास यूनियन का एक प्रतिनिधिमंडल अपना मांग पत्र लेकर उनसे मिलने आ रहा है। मांग पत्र पढ़ने पर पता चला कि नए हिमाचल के गद्दियों को अनुसूचित जनजाति का लाभ नहीं मिल रहा, जबकि पुराने हिमाचल के इसी समुदाय को बहुत पहले से अनुसूचित जाति में शामिल किया जा चुका है। जब उन्हें बताया गया कि  यह विभाग बलवंत सिंह रामू वालिया जी देख रहे हैं तो वह तुरंत प्रतिनिधिमंडल को लेकर उनके निवास पर पहुंच गए। कल्याण विभाग के मंत्री उनके पुराने जानकार थे। जब उन्होंने इस विसंगति की ओर उनका ध्यान दिलाया तो रामू वालिया जी ने हर दो साल में एक बार अनुसूचित जाति की सूची में होने वाले संशोधन में इस जाति को शामिल करने का आश्वासन दिया। एक साल के भीतर इस समुदाय को वे सभी लाभ मिलने लगे, जिनसे वे वंचित थे। रविवार 2-9-2012 को उनके पार्थिव शरीर के दर्शन करने और उनके दाह-संस्कार में शामिल होने के लिए जो जन सैलाब उमड़ा वह अद्वितीय था। पूरा नूरपुर नगर, जसूर और इसके साथ लगते सभी कस्बों में पूर्ण बंद था। गमगीन आंखों से विदाई देने वालों में मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल, पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, मंत्री विधायक, सांसद और हिमाचल प्रदेश और पंजाब के सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल थे। वे सभी इस बात से सहमत थे कि महाजन साहिब ने जन सेवा और विकास कार्यों की जो मिसाल कायम की है वह मानस पटल पर सदैव बनी रहेगी।

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