आरक्षण कितना सही

(अशोक बहल, जयंती विहार, कांगड़ा)

भगवान द्वारा रचित सृष्टि, जिसमें वनस्पति जगत है, पशु-पक्षी हैं, पानी में रहने वाले जीव हैं, कहीं भी आरक्षण का सिद्धांत नहीं है। मानव जाति में भी आज पूरी पृथ्वी पर कहीं भी मानवों के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। हमारे धर्मशास्रों में दान और दया का तो बड़ा महत्त्व है, परंतु आरक्षण का जिक्र कहीं नहीं है। भारतवर्ष के इतिहास में अनादि काल से कहीं भी आरक्षण का प्रावधान नहीं मिलता। मगर अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद भारत में आरक्षण का प्रावधान है। आरक्षण के पीछे शायद सोच यह थी कि शोषित वर्ग को मुख्य धारा में लाया जाए। शुरू में आरक्षण का प्रावधान कम समय के लिए था और आरक्षण का प्रतिशत भी कम था। मगर अब आरक्षण की अवधि भी बढ़ा दी गई है और इसका प्रतिशत भी बढ़ गया है। आरक्षण का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है। कोई भी राजनीतिक पार्टी आरक्षण को समाप्त करने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती। ऐसा कहने या करने में उसे आरक्षित वर्ग का वोट बैंक खोने का डर है। आज देश जब गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है तो सरकार पद्दोन्नति में भी आरक्षण देने में व्यस्त है। हो भी क्यों न, आखिर आरक्षित और अल्पसंख्यक वर्ग के समर्थन से ही सरकार सत्तासुख भोग रही है। देश जाए भाड़ में।

 

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