ओबामा बनाम गांधी

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में विश्व के नेताओं को संबोधित करते जिस तरह महात्मा गांधी के सिद्धांतों का उल्लेख किया है, वह मौजूदा हालात में खास मायने रखता है। इन दिनों जिस तरह इस्लाम विरोधी फिल्म को लेकर मुस्लिम देशों में अमरीका के खिलाफ प्रदर्शन चलते रहे हैं, उसने धार्मिक असहिष्णुता को एक नई चुनौती के तौर पर पेश किया है। बेनगाजी में अमरीकी नागरिकों पर हमला और लीबिया स्थित अमरीकी राजदूत क्रिस्टोफर स्टीवस की हत्या इस बात के ताजा सबूत हैं कि आज कुछ धार्मिक व नस्ली मुद्दों को लेकर कुछ वर्गों में असहनशीलता किस कद्र बढ़ रही है, इसकी निंदा किया जाना स्वाभाविक है। हालांकि ओबामा पहले भी कह चुके हैं कि अमरीका का इस्लाम विरोधी विवादास्पद फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह भी कि कोई अनपढ़ व घृणित वीडियो उनके देश पर हमले का बहाना नहीं हो सकता। इसके बावजूद यह प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित है कि इस तरह के प्रयास अमरीका की धरती पर क्यों हो रहे हैं। प्रश्न चाहे इस्लाम का हो या किसी भी दूसरे धर्म का, आज की वैश्विक भागीदारी के वक्त उन्हें किसी भी तरह के वैरभाव व उस कारण उपजी हिंसा से मुक्त रखा जाना चाहिए। ओबामा ने खुद स्वीकार किया है कि इस्लाम विरोधी फिल्म न सिर्फ मुसलमानों का, बल्कि अमरीका का भी अपमान है। यदि वास्तव में अमरीका सभी देशों व नस्ल के लोगों का स्वागत करता है तो वह उसके आचरण व व्यवहार में भी नजर आना चाहिए। यह सिद्धांत किसी भी ऐसे देश पर लागू समझा जाना चाहिए, जो बहुनस्ली संस्कृति व सद्भाव में यकीन रखते हैं। उस लिहाज से महात्मा गांधी का असहिष्णुता को अपने आपमें हिंसा करार देना अर्थपूर्ण है। बशर्ते कि आज वर्चस्व की लड़ाई में घिरे महादेश इस मंत्र के सही अर्थ समझ पाएं। ओबामा ने इन्हीं संदर्भों में सही कहा है कि भविष्य उन लोगों का नहीं हो सकता, जो इस्लाम के पैगंबर का अनादर करते हैं। यहां इसे किसी भी धर्म के पैगंबर के संदर्भ में पढ़ा जा  सकता है। इस तरह की असहनशीलता लोकतांत्रिक भावना के विकास में बाधक हो सकती है। ऐसे में यदि वाकई हमें गांधीवादी विचारों से कुछ सीखना है तो शांति, अहिंसा और सांप्रदायिकता सद्भाव को अपने जीवन में उतारना होगा। जमाना चाहे बदल गया हो, महात्मा गांधी और उनके आदर्श आज भी प्रासंगिक और विचारणीय हैं। इस्लाम विरोधी फिल्म को लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न भी जुड़ा है। यह भी कि उसे किस तरह अमल में लाया जाता है। अमरीका में बनी विवादास्पद फिल्म के निर्माता के खिलाफ कोई कार्रवाई न होना कुछ शंकाएं प्रस्तुत करता है। विशेषकर जबकि उसका निर्माण स्वयं अमरीका में हुआ। भूलना न होगा कि असम-महाराष्ट्र  में फैली हिंसा भी अमरीका से प्रचारित एमएमए के जरिए हुई थी। यह कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर एकांगी तौर पर न सोचकर सभी पक्षों व भावनाओं का आदर करते हुए विचार होना चाहिए, ताकि इस तरह की संकीर्णता समाज में वैरभाव व आपसी घृणा का विष न फैला पाए।

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