कांगड़ा से घूमता सियासी पहिया

Sep 23rd, 2012 12:15 am

हिमाचल प्रदेश की सियासत का अखाड़ा हर बार कांगड़ा जिला ही बनता रहा है। राज्य के 68 विधानसभा क्षेत्रांे में से एक चौथाई विधायक इसी जिला से चुनकर आते हैं, लिहाजा पुनर्सीमांकन से पहले 16 विधानसभा क्षेत्रों वाले कांगड़ा जिला का बहुमत प्रदेश की सरकार का मार्ग प्रशस्त करता रहा है। जिला की राजनीति हमेशा ही भाजपा के दिग्गज नेता शांता कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही है।  हालांकि सबसे पहले इस जिला में जनसंघ का दीपक जलाने वाले कंवर दुर्गा चंद यहां से प्रमुख नेता उभर कर आए थे, लेकिन बाद में हिमाचल प्रदेश का पुनर्गंठन होने के बाद अस्तित्व में आए राज्य को इस जिला ने मुख्यमंत्री वर्ष 1977 में शांता कुमार के रूप में दिया। उस दौरान शांता कुमार ने जनता पार्टी की सरकार बनाई थी। बाद में जनता पार्टी के टूटने से जिला की राजनीति में नए समीकरण बन गए। तीन वर्ष बाद इस जिला में कांग्रेस को टक्कर देने के लिए भारतीय जनता पार्टी खड़ी हो गई। कांगड़ा का राजनीतिक इतिहास इस बात का प्रमाण है कि इस जिला की 16 में से 09-10 सीटंे जीतने वाले दल ने ही प्रदेश में अपनी सरकार बनाई है। वर्ष 1998 में भाजपा ने यहां से 10 सीटंे जीतीं और ज्वालामुखी से रमेश धवाला निर्दलीय चुनकर आए, लिहाजा बराबरी के आंकड़े पर अटकी भाजपा-कांग्रेस के खेशनहार रमेश धवाला बन गए। उस दौरान कांगड़ा जिला की राजनीति ने पूरे देश का ध्यान अपनी और आकर्षित कर लिया। जाहिर है कि शुरुआती दौर में रमेश धवाला ने कांग्रेस को समर्थन देकर वीरभद्र को मुख्यमंत्री बना दिया। कुछ ही दिनांे बाद भाजपा मंे लौटकर रमेश धवाला ने प्रेम कुमार धूमल की सरकार का गठन कर प्रदेश की राजनीति में अनूठा रिकार्ड स्थापित कर दिया। वर्ष 2003 में पिछले चुनावों के विपरीत भाजपा को पांच तथा कांग्रेस को 10 सीटंे मिलीं। इस बार भी भाजपा के नवीन धीमान का टिकट कटने के बावजूद वह परागपुर से निर्दलीय चुनाव जीत गए। इतिहास फिर दोहराया गया और 10 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने प्रदेश में अपनी सरकार बना ली। वर्ष 2007 के चुनावांे में भाजपा ने नौ सीटंे जीती और कांग्रेस को सिर्फ पांच सीटांे पर संतोष करना पड़ा। कांगड़ा से बसपा तथा नूरपुर से भाजपा के राकेश पठानिया ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में बाजी मारी, लिहाजा इस बार भी कांगड़ा से बहुमत हासिल करने वाले दल ने प्रदेश की सत्ता काबिज की, लिहाजा कांगड़ा जिला प्रत्यक्ष रूप से प्रदेश की राजनीति में अपना प्रमुख किरदार अदा करता है।

भाजपा को शांता, कांग्रेस को वीरभद्र का सहारा

विधानसभा चुनाव में भाजपा की नैया पार लगाने का जिम्मा पार्टी के दिग्गज नेता शांता कुमार के कंधांे पर होगा। शांता कुमार के इशारे पर कांगड़ा भाजपा की राजनीति चलती है। लिहाजा पार्टी प्रत्याशी जिला में उनकी ताकत को भुनाने का प्रयास करंेगे। कांग्रेस को जीत दिलाने का बीड़ा खुद पार्टी अध्यक्ष वीरभद्र सिंह को उठाना पडे़गा। हालांकि यहां पर कुछ विधानसभा क्षेत्रांे में पूर्व सांसद चंद्र कुमार का कांग्रेस को जिताने में अहम रोल रह सकता है। जीएस बाली भी नगरोटा के अलावा कांगड़ा तथा धर्मशाला में अपना प्रभाव छोड़ सकते हैं। इसके अलावा कांग्रेस की जीत का सारा दारोमदार वीरभद्र सिंह पर निर्भर करेगा। तीसरे दल के रूप में उभरा हिलोपा भी कुछ विधानसभा क्षेत्र में भाजपा-कांग्रेस के समीकरण बिगाड सकता है। गरली-परागपुर से हिलोपा के संभावित प्रत्याशी नवीन धीमान दोनों ही दलांे को यहां कांटे की टक्कर देने की फिराक में हंै। इसी बीच दूलो राम के हिलोपा का दामन थामने से वह भी कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव छोड़ सकते हैं।

बेरोजगारी घुमाएगी राजनीति

जिला में बेरोजगारांे की फौज चुनावी नतीजे तय करेगी। डिग्रियां लेने के बाद बेकार घूम रहे युवाआंे के लिए यह चुनाव सबसे अहम माना जा रहा है। इसके अलावा कर्मचारी वर्ग भी कांगड़ा की राजनीती में अपनी अहम भूमिका निभाएगा। जातीय समीकरणांे से केंद्रित जिला कांगड़ा में यह फैक्टर भी अहम रहेगा। खासकर ओबीसी वर्ग जिला की राजनीति में चुनावी नतीजांे को पूरी तरह प्रभावित करेगा। इसके अलावा राजपूत, ब्राह्मण तथा गद्दी समुदाय भी चुनावांे के राजनीतिक समीकरण बनाएंगे और बिगाडें़गे। इसके लिए टिकट आबंटन तथा प्रत्याशियांे का चयन जातीय समीकरणों का आधार बन सकता है। जिला का किसान भी मौजूदा विस चुनावांे में टे्रंड सेंटर बन सकता है।

भाजपा के पास विकास, कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार का मुद्दा

विधानसभा चुनाव में भाजपा का विकास तथा कांगे्रस का भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा होगा। इसी बीच जनता में केंद्रीय विश्वविद्यालय, टांडा अस्पताल की दुर्दशा तथा जिला की पटरी से उतरी शिक्षा, स्वास्थ्य तथा खस्ताहाल सड़कों के अलावा बेरोजगारी आम जनता के मुद्दे होंगे। नूरपुर क्षेत्र में आम तथा नींबू की अनदेखी चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। देहरा उपमंडल में चंदन तस्करी तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना का चुनावी मुद्दा बन सकता है। पालमपुर उपमंडल में विधायकांे की उपेक्षा तथा एक-दूसरे के हस्तक्षेप से प्रभावित हुए निर्माण कार्य जनता की आवाज बनेंगे। धर्मशाला तथा शाहपुर में भी केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा जिलांे के गठन के गड़े मुर्दे निकल सकते हैं। जवाली क्षेत्र में भी आपसी खुन्नस के चलते प्रभावित हुए विकास कार्य जनता के गुस्से का कारण बनेंगे। बहरहाल, भाजपा इस जिला में यूपीए की नाकामियांे के चलते प्रदेश की अनदेखी को चुनावी मुद्दा बनाएगी। इसके साथ ही धूमल सरकार की लोकप्रियता पर जिला में सत्तारूढ़ दल वोट मांगेगा।

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