कानून की कसौटी पर कसाब

(सुरेश कुमार, योल)

अगर कसाब भारत न आता तो  हमें पता ही नहीं चलता कि भारत में लोकतंत्र है। भारत में लोकतंत्र है तभी तो मुंबई हमले का एकमात्र जिंदा आरोपी और 166 लोगों का हत्यारा कसाब अभी तक जिंदा है और अभी और जिंदा रहेगा। फांसी का अभी ऐलान हुआ है तामील होने के लिए अभी वक्त लगेगा। कानूनी प्रक्रिया के पेंच ही ऐसे हैं कि सच सामने है, सबूत सारे हैं फिर भी फांसी नहीं दे सकते, क्योंकि लोकतंत्र है। सियासत की स्याही से सराबोर कसाब का केस कब क्या मोड़ लेगा कहा नहीं जा सकता। लोग तो यही कह रहे हैं कि अभी फांसी पर लटका दो, पर ऐसे तो तालिबानी फरमान हो जाएगा। हल तो यही था कि जहां नौ आतंकवादी मारे गए थे, इसे भी तभी एनकाउंटर में मार देते, ताकि कम से कम सरकार के 48 करोड़ रुपए बचते, जो केंद्र सरकार ने कसाब की सुरक्षा पर खर्च किए। मेरा भारत महान उग्रवादियों को भी डर-डर कर सजा देता है और एक अमरीका है, जो दूसरे देश में अपने दुश्मन को ढूंढ-ढूंढ कर मारता है। कसाब से पहले अफजल गुरु पकड़ा गया वह भी अभी जेल की रोटियां तोड़ रहा है। सरकार तो कोयले की दलाली में अपना मुंह नहीं बचा पा रही है, तो अफजल और कसाब की किसे पड़ी है। अब एक और आतंकी सरकारी दामाद बन गया है अबु जुंदाल। अब सरकार उसकी सेवा में लगी है। यह सिलसिला शायद खत्म नहीं होगा, क्योंकि नेताओं की राजनीति चलती ही अपराध और आतंक से है। अगर इन्हें फांसी दे दी तो वोट के लिए मुद्दा नहीं मिलेगा। अगर सरकार को चलाना है तो इन आतंकियों को जिंदा रखना होगा, चाहे देश के लोग मरते रहें। कसाब जिंदा रहना चाहिए, ताकि एहसास होता रहे कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां एक कसाब 166 जानें ले सकता है, पर सवा अरब लोग कसाब का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

 

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