कार्टून नहीं है देशद्रोह

कार्टून किसी भी आधार पर या कोण से देशद्रोह नहीं माना जा सकता। यह एक रचनात्मक और सामाजिक अभिव्यक्ति है, जिसका भारतीय संविधान ने हमें अधिकार दिया है। हमें बोलने, लिखने और कहने या देश की सत्ता की घोर आलोचना करने का मौलिक अधिकार है, क्योंकि भारत एक गणतांत्रिक देश है। उस अभिव्यक्ति की परिधियां, बंदिशें और पहरे तय नहीं किए जा सकते, क्योंकि अभिव्यक्ति गलत और राजद्रोह सरीखी है, यह कौन तय करेगा? जो जमात कोयला तक गटक जाए, भ्रष्टाचार को ही नमन करे और हत्याओं के आरोपों तक से दागी हो, क्या वह किसी नागरिक को, उसके खिलाफ  अभिव्यक्ति करने पर, देशद्रोही करार दे सकती है? कदापि नहीं, क्योंकि यह कोई तानाशाह देश नहीं है। देशद्रोह में जेल भेजे गए कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का महज यह कसूर हो सकता है कि उन्होंने अशोक स्तंभ जैसे राष्ट्रीय प्रतीक का चेहरा भेडि़ए सरीखा बना दिया। उसके सम्मान और अपमान की दलीलों को छोड़ दीजिए, उसके कार्टून की लाक्षणिक व्यंजना को समझिए। यानी इस चित्र के पीछे उसका भाव क्या था? क्या कार्टून के स्पष्ट अर्थों के आधार पर ही असीम को देशद्रोही करार देना उचित है? दरअसल जब अन्ना हजारे का सामाजिक करिश्मा चरमोत्कर्ष पर था और देश की एक जमात उनके पीछे पागलपन और जुनून के स्तर पर लामबंद हो रही थी, तब याद कीजिए कि राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगे’ का कैसा अपमान किया गया था। अन्ना के वाहन पर तिरंगा लपेटा गया था। प्रदर्शनकारी युवाओं की भीड़ मोटरसाइकिलों और अपनी कमर पर तिरंगे को उलटे-सीधे लपेटे हुए थी। कई हाथों में तिरंगा फटा हुआ था। यानी तिरंगा एक राष्ट्रीय प्रतीक तो था, लेकिन भीड़ उसकी आचार संहिता से अज्ञात थी और न ही उससे कोई हिंसा भड़की थी, जो देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा साबित होती। क्या तिरंगे के दुरुपयोग को ही राजद्रोह मान लिया गया? उत्तर प्रदेश के मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने तिरंगे पर जन्मदिन का केक काटा था। यह तिरंगे का सरासर अपमान था। एक अंग्रेजी अखबार में कार्टून छपा था कि कांग्रेस-भाजपा के सांसद कुश्ती लड़ते हुए संसद के प्रवेश द्वार से अंदर जा रहे हैं और लड़ते हुए ही संसद के अगले दरवाजे से बाहर आ रहे हैं, जिस पर लिखा है-शीतकाल सत्र। यदि कार्टूनिस्ट ने संसद को अखाड़ा दिखाया है, तो यह प्रकट रूप से संसद का घोर अपमान है, लेकिन उसमें निहित अभिव्यक्ति का सच तो सटीक है न…। इसी तरह असीम के कार्टूनों की व्याख्या की जा सकती है। उनके कार्टून अति उत्साह, बचकानापन या अति उत्तेजना की अभिव्यक्ति हो सकते हैं। संविधान की पुस्तक पर चार पैरों वाला कोई जीव और उसका चेहरा आतंकी कसाब का हो और वह जीव संविधान पर पेशाब कर रहा हो अथवा राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का चेहरा भेडि़ए जैसा दिखाया जाए, असीम के ऐसे कार्टून वीभत्स अभिव्यक्ति के उदाहरण हो सकते हैं, उनसे असहमत भी हुआ जा सकता है, लेकिन यह किसी भी तरह देशद्रोह का मामला नहीं बनता। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू की दलील है कि जिन्होंने असीम को गिरफ्तार किया है, अपराध उन्होंने किया है, उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। दरअसल करीब 150 साल पुराना देशद्रोह का यह कानून औपनिवेशिक तानाशाही का प्रतीक है। अंग्रेजों के शासनकाल में ब्रिटिश महारानी या साम्राज्य की आलोचना करना ही देशद्रोह था। चूंकि आज हम लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं, तो सत्ता की आलोचना करना और व्यवस्था परिवर्तन के लिए आंदोलन चलाना आदि हमारे संवैधानिक अधिकार हैं। इस संदर्भ में 1962 का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला गौरतलब है कि नफरत फैलाने और देश को अस्थिर करने या पलट देने की कोई कोशिश सामूहिक तौर पर हिंसक हो जाती है, तब वह मामला देशद्रोह का बन सकता है। सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभिव्यक्ति, राजनीतिक जमात पर व्यंग्य करती कोई अभिव्यक्ति, सत्ता को गालियां देती, कोसती, आरोपित करती किसी भी रचनात्मकता को देशद्रोह करार नहीं दिया जा सकता। असीम के खिलाफ जो हुआ है, वह हमारी व्यवस्था की बढ़ती असहिष्णुता भी है। लोकतंत्र में यह स्वीकार्य नहीं हो सकती। कभी सहिष्णुता हमारे संस्कारों की खूबी मानी जाती थी। दरअसल यह तो कार्टूनों का मामला है, जिसमें व्यंग्य निहित होता है। उस पर तो हंसते हुए, फिर गंभीर होना चाहिए, वह देशद्रोह कैसे हो सकता है? बहरहाल जिस तरह फांसी की सजा को समाप्त करने के लिए दुनिया भर में अभियान जारी हैं, उसी तरह देशद्रोह कानून की भी समीक्षा होनी चाहिए। दरअसल लोकतांत्रिक देशों में इस कानून की जरूरत और प्रासंगिकता भी क्या है?

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