चीन से सैन्य सहयोग

भारत की यात्रा पर आए चीनी रक्षामंत्री लियांग गुंआंगली तथा भारत के रक्षामंत्री एके एंटनी के मध्य हुई बातचीत  के फलस्वरूप दोनों देश साझे सैन्य अभ्यास को जल्द बहाल करने पर ही क्यों न सहमत हुए हों, इससे उनके बीच पारंपरिक विश्वास बढ़ाने का रास्ता तैयार हो सकता है। इसी प्रकार भारत और चीन के बीच सीमा पर शांति बढ़ाने का फैसला भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ कुछ ऐसे प्रश्न जुड़े हैं, जिनका जवाब चीन को देना होगा, तभी कोई बात बन पाएगी। इससे पूर्व भी भारत व चीन के बीच साझे सैन्य अभ्यास पर सहमति बन पाई थी, लेकिन 2010 में वीजा विवाद के बाद इसे स्थगित कर दिया गया था। इस दौरान केवल वीजा विवाद ही नहीं, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चीनी सैनिकों की मौजूदगी चिंता का कारण बनी थी। इसका कोई संतोषजनक जवाब भारत को नहीं मिल पाया। वैसे भी दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती  हुई मौजूदगी एक सवालिया निशान बनती रही है। यह बढ़ती हुई मौजूदगी भारत और अमरीका दोनों को खटकती रही है। इसके भी कुछ जायज कारण रहे हैं। चीन भारत से अपने संबंध मजबूत बनाने तथा विश्वास की मजबूती के लिए कितने भी पलक पांवड़े क्यों न बिछा दे, उसका अब तक का आचरण भारत के लिए सुखद नहीं रहा है। इस तरह की पृष्ठभूमि के रहते यदि चीनी रक्षामंत्री संबंधों में सुधार की कोई नई तदबीर लिखा पाते हैं तो उसका स्वागत किया जाएगा। पिछले आठ वर्षों में वह भारत की यात्रा पर आए पहले चीनी रक्षामंत्री हैं। यदि ताजा विचार-विमर्श के फलस्वरूप सीमावर्ती इलाकों में संबंधों और दक्षिण एशिया व दक्षिण प्रशांत क्षेत्र की स्थिति में सुधार हो पाता तो उसका लाभ दोेनों को ही मिल पाएगा। वैसे भी चीनी रक्षा मंत्री की भारत यात्रा उस मौके पर हो पाई है, जबकि दक्षिण चीन सागर में चीन पर दादागिरी के आरोप लगते रहे हैं और सीमा क्षेत्रों में चीन की गतिविधियां संदेहास्पद रही हैं। इसका एकमात्र उपाय सीमा पर सैनिकों के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ाना हो सकता है। अभी लोग भूले नहीं हैं कि चीन जहां एक ओर भारत से संबंध सुधारने की रट लगाता रहा है, वहीं चीन में कश्मीर के लोगों को नत्थी वीजा जारी कर तथा अरुणाचल के एक हिस्से पर अपना दावा कर ऐसे रिश्तों की जड़ों को खोखला करता रहा है। इसी प्रकार चीन ने सिक्किम में वर्ष 2010 की पहली छमाही में सिक्किम से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा का 65 बार उल्लंघन कर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की कुचेष्टा की। दूसरी ओर आक्साईचीन जैसे निर्जन इलाके पर चीन कब्जा जमाए बैठा है। जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र का यह इलाका भारत के अधिकार क्षेत्र में आता है। 1962 में भारत से विश्वासघात कर उस पर किया गया हमला भारत-चीन संबंधों में आज भी कहीं न कहीं दरार पैदा किए हुई है। सामरिक व रणनीति दृष्टि से भारत-चीन संबंधों को बेहतर बनाना समय की एक बड़ी मांग है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रीय हितों का होम नहीं किया जाना चाहिए। भारत के मुकाबले चीन की सैन्य क्षमता काफी अधिक क्यों न हो, उस दृष्टि से भारत भी कम मजबूत नहीं है। वैसे भी चीन का झुकाव भारत के मुकाबले पाकिस्तान के प्रति अधिक रहा है। ऐसे में यह भी जरूरी हो जाता है कि चीन इस तरह के भंवरजाल से उबर कर भारत से आपसी संबंधों को मजबूत बनाने की पहल करे। इसके लिए उसे अतीत के कटु अनुभवों को भी सामने रखकर कोई निर्णय करना होगा।

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