चुनावी भिन्नता के भंवर

Sep 14th, 2012 12:15 am

चुनाव की चाटुकारिता में सियासत का सुकून और नहले पर दहले का असर स्पष्ट है। आफत के टुकड़ों का संघर्ष, गिड़गिड़ाते मुद्दों का घर्षण और राजनीतिक भाषा के लाग लपेट में परिवर्तन का सौहार्द बांटते नेतागण। कुछ आसान निशाने, कहीं सख्त रवैया और हर पल मतदाता के आगे बीन बजाते नेता। कांग्रेस की बेडि़यां, अपनी ही पार्टी को बातूनी बनाती हैं और नेताओं के धर्म यदा-कदा बदल जाते हैं। कौल सिंह का सिंहनाद पार्टी में द्वितीय पंक्ति का बचाव करता है तो पार्टी की कमान थामे वीरभद्र सिंह ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’ के उद्घोष पर चयन और चंगुल की चींची का हिसाब जोड़ रहे हैं। कहीं आन-बान, कहीं आन-तान और कहीं बाग-बाग होते इरादे, क्योंकि घमासान में तितलियों के रंग-भंवरों का संग एक साथ देखा जा रहा है। राजनीति को रंग भरते अरमान कई नए राजनीतिक दलों का सफर है तो तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, सपा या बसपा जैसे दल भी लंगर खोलकर राजनीतिक जड़ाऊं बांट रहे हैं। हर सीट के अनेक कयास और समीकरणों के ढोल पीटती कई उम्मीदवारों की फरियाद। द्वंद्व से दुविधा और दुराग्रह से दुश्चिंतन का गठजोड़ ऐसा कि बड़े नेता फकीर और छुटभैयों की जमात के पर निकल आए हैं। यह चुनाव पार्टी बनाम पार्टी के अलावा पार्टी विरुद्ध पार्टी भी होगा यानी अपनी ही कोख दगा देगी। अपने लोग विरोधी हवा देंगे तो तारों की छांव में चांदनी भी गुनहगार होगी। चुनाव के इंतजार में सरकार को सक्रियता और मंत्रिमंडल के पैगाम काफी आगे लांघ चुके हैं। आगे बढ़ने की ताक में हिमाचल के कई मुद्दों का उछाल देखा जाएगा। इसलिए केंद्र बनाम हिमाचल के पेंच में कांग्रेस की जवाबदेही बढ़ रही है। मुख्यमंत्री सीधे वीरभद्र सिंह को बहस की चुनौती देते हैं और धारा 118 के मुखौटे बिखर जाते हैं। आम जनता को मालूम तक नहीं कि हिमाचली चरित्र को किसने बेचा, लेकिन सत्य की लकीरों पर प्रदेश की नीलामी का सबब सामने है। राजनीति की बिगड़ी सूरत में कौन धनवान, कौन बलवान, यह फैसला चुनाव की मुनादी में होगा। इसलिए निशानों की खेप में हर कोई बिंधा है। कहीं विवेकानंद ट्रस्ट अस्पताल के नींव के पत्थर, अगर शांता कुमार सरीखे नेता के खिलाफ देखे जा रहे हैं तो राजनीतिक लड़ाई का मसाला गर्म हो रहा है। यहां प्रश्न कौल बनाम वीरभद्र सिंह रहा है और इसी की बुनियाद पर टिकटों की मंजिल तक संघर्ष तो होगा ही। पहली बार चुनाव की दहलीज पर वरिष्ठ नेताओं के कदम ठिठक रहे हैं, क्योंकि प्रदेश की सियासत में ताजा आक्सीजन का प्रभाव है। यह चुनाव नए उम्मीदवारों की पैरवी कर रहा है। विजन की पड़ताल कर रहा है, इसलिए हिलोपा जैसे मोर्चा ने अपनी इबारत खोज डाली। विजन डाक्यूमेंट लिखकर हिलोपा ने कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर सियासत का रुख मोड़ा है। बहस के अनेक विषयों के बीच प्रदेश की जनता को मुकम्मल अधोसंरचना, नागरिक सुविधाओं और रोजगार अवसरों का इंतजार रहेगा। किसान-बागबान को बंदर राज से खेत को बचाना है। जनता के अहम मुद्दे सुशासन की तिजोरी में बंद हैं, जो कदम इस दिशा में उठेंगे मतदाता की निष्ठा स्वाभाविक तौर पर अनुसरण करेगी। देखना यह है कि पार्टियां चुनाव की प्रासंगिकता में सियासत को किस रंग में रंगती हैं। सत्ता का विरोध या सत्ता का सफर  किस करवट बैठता है, इससे पहले चुनाव की बिसात पर आमजन का दांव कौन खेल रहा है। सियासत के बदनाम मोहरे या मोहरों की बदनामी के पीछे कितना विष बहेगा, कोई नहीं जानता, लेकिन चुनाव की अहमियत अब हर घर के आंगन में मापी जाएगी। लोक सूरत और सीरत के पैमाने बदल चुके हैं, सुझाव और साक्षात्कार के प्रश्न बदल चुके हैं। कलई खुलते नेताओं के जमघट में, बेतरतीब सियासत के बीचोंबीच, कहीं सीधी रेखा पर राजनीति की परीक्षा होगी। जाग रहे मंतव्यों और सो रहे इतिहास के सामने राजनीतिक परिदृश्य की अनुगूंज तो सुन रहे हैं, बस चीखनेवालों पर भरोसा कैसे करें।

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