जैविक बनाम जहरीली कृषि

Sep 8th, 2012 12:15 am

(लेखक, एस. धनोतिया जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय इंदौर से सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं)

बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं सरकार की एक बड़ी साजिश के तहत ही किसान भ्रमित  हैं और कर्ज लेकर तथाकथित आधुनिक कृषि एवं अब जैविक कृषि के भंवर जाल में फंसता जा रहा है। जैविक कृषि के लिए किसान को न तो कर्ज की आवश्यकता है और न ही नशेड़ी लत की तरह किसी प्रकार की सबसिडी की…

मनुष्य के जीवन का मूल आधार कृषि है। जैसे-जैसे जनसंख्या की वृद्धि होती गई, वैसे-वैसे खाद्यान्नों की जरूरतें भी बढ़ती गईं। पारंपरिक कृषि के मूल तत्त्वों को न समझ पाने और नई-नई वैज्ञानिक खोजों के फलस्वरूप कृषि में नवपरिवर्तन की बयार सी चल पड़ी। प्रकाश संश्लेषण एवं नत्रजन चक्र की खोज ने कृषि की दिशा परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई। पश्चिम के प्रसिद्ध वैज्ञानिक लिबिग के प्रयोगों को आधुनिक कृषि का आधार माना जाता रहा है। हमारे यहां महर्षि पराशर को भारतीय कृषि का मनीषी माना जाता है, परंतु दोनों में मूलभूत अंतर है, जिसे आधुनिक भारतीय समाज ने नजरअंदाज कर दिया और लिबिग महोदय भारतीय कृषि या रासायनिक कृषि दिखने करने में सरल प्रतीत होने का भ्रम पैदा करती है। जब-जब विश्व में खाद्यान्नों की कमी महसूस की गई, तब-तब कई प्रकार के नव आयामों ने कृषि में जन्म लिया और आज कृषि आधुनिक/रासायनिक कृषि से आगे दौड़कर हाईटेक एवं जीएम तकनीक आधारित कृषि तक जा पहुंची है, परंतु विभिन्न प्रयोग करने वालांे ने मिट्टी को निर्जीव समझकर उसके दर्द को कभी महसूस नहीं किया और अंधाधुंध प्रयोग करते हुए उसे जहर पिलाते गए। परिणाम हमारे सामने है। मिट्टी न केवल जहरीली और अनुपजाऊ बनती जा रही है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर निरंतर खतरा भी बढ़ता जा रहा है। हम विचार करें कि रासायनिक कृषि जैसी घातक विधा का नाम क्या विकल्प है? उन्हीं पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने जिन्होंने रासायनिक कृषि को जन्म दिया था, अब इसके विकल्प भी सुझाना प्रारंभ कर दिए हैं। जैविक खेती की आधुनिक अवधारणा ने इस भ्रम के साथ जन्म लिया कि यह कठिन ही नहीं महंगी भी है तथा इससे उत्पादन घट जाता है। अतः जैविक उत्पाद महंगे ही बिकना चाहिए। भारतीय किसान भी इसी अवधारणा एवं षड्यंत्र का शिकार हो गया। इसके लिए हमारी सरकार सबसे ज्यादा दोषी है। जैविक खेती की अवधारणा के दौर में गैर विश्वविद्यालयीन भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने भी कई प्रकार से महर्षि पराशर का अनुसरण करते हुए अपनी-अपनी अवधारणाएं प्रस्तुत ही नहीं की, बल्कि कुछ क्षेत्रों में वे निरंतर बिना किसी शासकीय आर्थिक मदद के उत्कृष्ट अनुसंधान कर चमत्कारिक परिणाम प्राप्त कर रहे हैं। लगभग सभी ने महर्षि पराशर के श्लोक जीवों जीवस्य जीवनम को आत्मसात किया है। एक गणितज्ञ प्रोफेसर श्रीपाद अच्युत दाभोलकर ने अपने घर की छत पर कई प्रयोग किए एवं विश्व पुष्ट ग्रामें अस्मिन् अनातूरम को संपूर्ण विश्व के लिए वरदान स्वरूप आगे बढ़ाते हुए कृषि में नेच्यूको कल्चर जैसे वैज्ञानिक शब्द गढ़ते हुए प्रोज्यूमर सोसायटी बनाने पर जोर दिया, ताकि ग्रामीण विकास सही दिशा प्राप्त कर सके एवं किसानों को उनके उत्पाद को केवल सही मूल्य ही प्राप्त न हो, बल्कि उपभोक्तओं को भी बिचौलियों की मार से बचाया जा सके। नेच्यूको कल्चर एक ऐसी विद्या है, जिसके द्वारा किसान प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर प्रयोग करें तो उसे बिना किसी बाहरी उपदानों उपकरणों, रासायनों एवं कीटनाशकों के अधिकतम रिकार्ड उत्पादन प्राप्त हो सकता है। नेच्यूको कल्चर के प्रमुख तत्व हैं- सूर्य, प्रकाश, पानी, सजीव मिट्टी एवं शुद्ध बीज तथा कृषि का वैज्ञानिक ज्ञान, परंतु सूर्य प्रकाश का अधिकतम उपयोग हम तभी कर सकते हंै जब सौर ऊर्जा को ग्रहण करने वाला तत्त्व हरी पत्तियां पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ अवस्था में उपलब्ध हांे और इसके लिए सजीव मिट्टी का होना आवश्यक है। ‘नेच्यूको कल्चर’ मात्र एक विधा नहीं है। हमारे देश में महर्षि पराशर के उपरोक्त श्लोक के आधार पर देश काल और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए कई और कृषि विशेषज्ञों ने आमूलचूल योगदान दिया है और दे भी रहे हैं। सुभाष पालेकर ने तो चमत्कारिक कार्य करते हुए ‘जीरो बजट’ कृषि की अवधारणाा को जन्म देकर इस देश के किसानों को एक दैवीय उपहार प्रदान किया है। आवश्यकता इस बात ही है कि किसान इस विधा पर विश्वास करें और पूर्ण आस्था के साथ अपनाएं तथा अपनी आशंका एवं भय दूर करें कि जैविक कृषि में उत्पादन घट जाता है। वे जैविक कृषि के मूल तत्त्वों को सही स्वरूप में समझें तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं सरकार के साझा धोखों से बचें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं सरकार की एक बड़ी साजिश के तहत ही किसान भ्रमित  हैं और कर्ज लेकर तथाकथित आधुनिक कृषि एवं अब जैविक कृषि के भंवर जाल में फंसता जा रहा है। जैविक कृषि के लिए किसान को न तो कर्ज की आवश्यकता है और न ही नशेड़ी लत की तरह किसी प्रकार की सबसिडी की। सबसिडी एक धीमा जहर है, जिसकी आदत न केवल कृषि के मूल दर्शन से किसान को भटकाती है, बल्कि उसे आत्मग्लानि के दंश से नित्य डसती है, क्योंकि हवा में 78 प्रतिशत नत्रजन है , वहां भला पौधों को इसी नत्रजन को अतिरिक्त  ऊर्जा देकर यूरिया में बदलकर देने की क्या आवश्यकता है, जबकि पौधों द्वारा नत्रजन उसी विकध से ग्रहण की जाती है, जिस विधि से वायुमंडल की नत्रजन ग्रहण किया जाता है। जैविक कृषि की कई और विधाएं भी प्रचलन में हैं, जैसे नेचुरल फार्मिंग (प्राकृतिक कृषि), बायोडायनेमिक फार्मिंग आदि। किंतु आवश्यकता है कृषि के मूल तत्त्वों को वैज्ञानिक रीति से समझकर अपनाने की। यद्यपि शासनतंत्र से इन भारतीय विधाओं के प्रोत्साहन की उम्मीद नहीं की जाती, क्योंकि आज अर्थतंत्र की हवा जो बह रही है।

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