तानाशाह होती राजनीति…

(हेमंत  भार्गव,  अर्की)

राजनीति शब्द आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है। हमारे राजनीतिज्ञों ने आज राजनीति को इतना रुचिकर विषय जो बना दिया है। आज पढे़ लिख क्या अनपढ़ कहा जाने वाला तबका भी गहरी राजनीतिक समझ रखता है, इसलिए नहीं कि हमारे राजनेता बहुुत अच्छे हैं, पर इसलिए की ये नित्य अपनी लड़ाइयों में आम जनता को पीसते हैं। नित्य के घोटालों से परेशान जनता शांतिपूर्वक आंदोलन कर रही हो सरकार के विरुद्ध तो हमारे नेता जनता के रक्षकों द्वारा जनता के ऊपर ही लाठियां बरसाते हैं। जनता अपना दर्द कहे भी तो किससे आखिर भगवान से प्रार्थना करते हैं कि भगवान बस एक बार यह सरकार चली जाए या गिर जाए, पर दूसरी सरकार भी उन्हें कहां शांति से रहने देती है। पिछले वर्षों में तो घोटालों की हद ही हो गई। आदर्श सोसायटी, कामनबैल्थ जिसकी वजह से हम पूरी दुनिया के सामने बदनाम होने से बाल-बाल बचे । 2जी स्पेक्ट्रम उन सब घोटालों के अपराधियों ने जेलों में भी मौज की। जनता उनको भूल गई और अब सामने आया है कोल आबंटन घोटाला। जनता डंडे के डर से चुप है पर विपक्ष हंगामा कर रहा है। इतने दिनों से संसद नहीं चलने दी। शायद विपक्ष नाराज है, आखिर इतने वर्षों से उसके नेताओं का पेट भी तो खाली है। जनता काले धन को वापस लाना चाहती है पर जो लोग वापस लाएंगे, वे तो ताजे घोटाले के बाद और काले हो गए हैं। आखिर सरकार अब छोटे बच्चे की तरह जिद्दी हो गई है। हर घोटाले के बाद एक आवाज आती है। विपक्ष की चाल है जनता को भी भ्रम हो जाता है। पर सरकार के खिलाफ  आंदोलन कोई करे तो सरकार उसे कुचलने को बेकरार है। आखिरकार लोकतंत्र की तानाशाही सरकार है कोई क्या बोल सकता है।

 

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