दिल्ली से आगे शिमला

By: Sep 17th, 2012 12:15 am

शिमला के माथे पर साक्षरता का तिलक प्रदेश में शिक्षा के प्रति दिखाई गई प्रतिबद्धता का कमाल है। यहां चूल्हे-चौके के मसले और खेती के सवाल किसी को स्कूल जाने से नहीं रोकते। इसीलिए जब राष्ट्रीय आकलन होता है, तो दिल्ली, मुंबई और चेन्नई से आगे शिमला की पाठशाला का रुतबा कायम होता है। यहां समाज और सरकार के बीच कुछ पाने का मकसद एक साथ चल रहा है और इसी कारण साक्षर होते हिमाचल ने देश के सामने खुद को पुष्ट किया। यह दीगर है कि शिमला की साक्षरता दर का सामाजिक पक्ष आज भी शहरी आवरण में अपने भविष्य को खोज रहा है। इसके व्यावहारिक, व्यावसायिक व आर्थिक पहलुओं पर गौर करें तो शिमला बनाम दिल्ली के बीच कई खाइयां पाटनी अभी बाकी हैं। साक्षरता के पैमानों से शिक्षा का मूल्य तय नहीं होता और इसी कसौटी पर हिमाचल की क्षमता का आकलन निराश करता है। बेशक सामाजिक सुरक्षा के प्रदर्शन में हिमाचल ने अपनी बेडि़यां खोली हैं, लेकिन नसीब जगाने का रास्ता अभी अधूरा है। वास्तव में स्कूल, कालेज या विश्वविद्यालय स्तर की साक्षरता में हिमाचल को अभी कई मंजिलें तय करनी होंगी। प्रदेश की प्रतिभा को संवारने में शैक्षणिक माहौल का जैसा समर्थन चाहिए, अभी पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। बिना उद्देश्य की पढ़ाई या उद्देश्यपूर्ण पढ़ाई में अंतर है। साक्षरता के मायने अब सामान्य नागरिक को भी कड़ी परीक्षा में डालते हैं। केवल अखबार पढ़ने या रसीद देखने तक ही साक्षरता नहीं, बल्कि इसे गुणवत्ता के लिहाज से परखने की आवश्यकता है। यहां महात्मा गांधी के शब्दों का स्मरण करें तो साक्षरता अपने आप में शिक्षा नहीं है। ऐसे में साक्षरता दर को शिक्षा की उपलब्धियों से जोड़ने के सेतु बनाने पड़ेंगे। सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि हम शिक्षा पद्धति को किस तरह साक्षरता से आगे वास्तविक लक्ष्यों तक ले जाते हैं। इसका यह अर्थ भी नहीं कि शिक्षा केवल विद्वान बनाने की परिपाटी बने, बल्कि भारतीय भविष्य का निर्माण इसके तहत देखा जाएगा। अगर हिमाचल में शिक्षा का प्रसार अच्छे प्रशासक, इंजीनियर, डाक्टर, लेखक, पत्रकार या प्रोफेशनल पैदा नहीं कर रहा है, तो आंकड़ों की जुगाली किस काम की। साक्षरता दर के प्रभावशाली पक्ष को उबारने के लिए जीवन भर सीखने के अवसर तथा हुनर बढ़ाने का समर्थन बढ़ाना पड़ेगा। जरूरी यह भी है कि शिक्षा के साथ नागरिक मूल्यों में किस तरह विकास होगा तथा वैयक्तिक उपलब्धियों, अनुभवों और जरूरतों के अनुरूप, समाज किस तरह अपनी मनोवृत्ति तथा व्यवहार का प्रदर्शन करता है। जाहिर तौर पर इन मामलों में हिमाचली समाज ने समानता, समरूपता, मानवाधिकारों तथा विकास के विविध पहलुओं के माध्यम से खुद को साबित किया है। खासतौर पर राजनीतिक जागरूकता के विषय व संबोधन, हमेशा परिवेश की मिलकीयत बनते रहे हैं। यह दीगर है कि शिक्षा के माध्यम से सीखने का आधार बढ़ाने की गुंजाइश महसूस की जाती है। वैज्ञानिक सोच, गणित की चुस्ती, प्रबंधकीय विषय और भाषा एवं संवाद के दायरों में हिमाचल को अपना स्तर बढ़ाना पड़ेगा। प्रकृति और समाज शास्त्र के संदर्भ और विकसित करने पड़ेंगे, जबकि शिक्षा में रोजगार ढूंढते इरादों को सफल बनाने का स्पर्श चाहिए। रोजगार व कार्य संस्कृति को शिक्षा से जोड़ने का संकल्प ही वास्तव में शिक्षा को उद्देश्यपूर्ण बनाएगा। कहना न होगा कि हिमाचल में मीडिया साक्षरता की दर पिछले एक दशक में तीव्र रफ्तार से बढ़ी है। हिमाचल में मोबाइल व इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ने के साथ संवाद व सूचना का क्षेत्र बढ़ा है। साक्षरता दर अब ज्ञान के हर द्वार पर दस्तक दे रही है। आज अगर शिमला का आकलन देश के प्रमुख शहरों की कतार में हो रहा है, तो यह सरकारों के सतत प्रयास और सामाजिक उत्कंठा के कारण है। शिमला के अलावा हिमाचल के दुरूह इलाकों में भी साक्षरता की सीढि़यों के ऊपर हिमाचली क्षमता के दर्पण में शिक्षा मुस्करा रही है, लेकिन वक्त के संबोधन कड़ी मेहनत की दरकार करते हैं।

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