दुआओं के दौर में धूमल सरकार

अब दुआओं का दौर धूमल सरकार को बुजुर्गों के करीब खड़ा कर रहा है, जबकि राष्ट्रव्यापी बंद से तपा हिमाचल भी केंद्रीय नीतियों के खिलाफ अपनी दुरुस्ती चाहता है। संगत का संगीत अगर भाजपा के कुनबे को मधुर बना रहा है तो कहीं सदमे में कांग्रेस की रीत देखी जा रही है। पेंशनभोगियों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करके प्रेम कुमार धूमल ने बुजुर्ग वंदना की है। लगातार हिमाचल की बस्तियों, वादियों और वसुंधरा पर बोलचाल के पैमाने बदले और यह सब सियासत ने सरकार के दम पर किया। जाहिर तौर पर धूमल सरकार ने सियासत की भाषा बदली, लेकिन केंद्र की भाषा ने राज्य में कांग्रेस की आशा को चोट पहंुचाई है। अपने शीशे के महल के खिलाफ कांग्रेस सरकार ने जो कंकड़ उछाले हैं, उनका हर्जाना पार्टी को चुकाना पड़ेगा। बहरहाल हिमाचल में धूमल सरकार का हर कदम राजनीतिक चुनौती बन रहा है। कुछ वर्गों की महत्त्वाकांक्षा को हमेशा राजनीति तराशती रही है और हिमाचल में सबसे अधिक लाभ कमाने वाला वर्ग, कर्मचारी सियासत का सदस्य रहा है। कहना न होगा कि मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने कर्मचारी तोहफों के चक्रव्यूह में प्रमुख विपक्षी दल को घुमा दिया है। यही वर्ग सरकार विरोधी हवाओं का पक्षधर रहा है। कमोबेश हर चुनाव में कर्मचारी मूड की वजह से राजनीति के आलेख बदल गए, लेकिन इस बार चुनावी आहट से कर्मचारी सौगात के दर्शन हुए। देखना यह होगा कि धूमल का सौहार्द किस हद तक कर्मचारी हृदय का स्पर्श कर पाएगा या सरकारी तिजौरी से हक पाने की उम्मीदें कितना कर्ज उतारती हैं। मिशन रिपीट को नारे से बढ़ाकर नाव बनाने में, जो रणनीति धूमल सरकार की रही है, उसे देखते हुए कांग्रेस के अवतार भी खामोश प्रतीत हो रहे हैं। हैरानी यह कि सरकार विरोधी तापमान में कांग्रेस न जाने क्यों ठिठुर रही है। एक ओर जादुई कलम से सरकार के फैसले, चुनावी तकरार को ढांप रहे हैं और दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर नेताओं की जुदाई का क्रम एक दूसरे को अनावृत कर रहा है। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कक्ष में बैठी पार्टी को अपने सिंहासन के लिए शीर्षासन करना पड़ेगा। बुजुर्ग कर्मचारियों के आशीर्वाद का पात्र बनी हिमाचल सरकार, विरोध की गलियों की सफाई कर रही है, लेकिन कांग्रेसी मंसूबों के ढेर लावारिस पड़े हैं। कहना न होगा कि सरकार ने अपने अंदाज से भाजपा को जीत के अनेक बहाने तैयार करके दिए, जबकि जीत के अधिकार को खोने में विरोधी पक्ष के हालात गुमसुम हैं। इस स्थिति को बदलने की परीक्षा कांग्रेस तो नहीं दे रही, अलबत्ता वीरभद्र सिंह ने धूमल सरकार के खिलाफ खम ठोंकने के हर अवसर का इस्तेमाल किया। प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को कब्र से निकालकर वीरभद्र  ने कर्मचारी हित में उछाल दिया और इसके सामने बचाव करने की बारी सत्तारूढ़ दल की रहेगी। हो सकता है कि कल वीरभद्र सिंह चुन-चुन कर सत्ता के इरादों को पटकनी दें या धूमल सरकार की चाशनी को सियासी जहर में डुबो दें, फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न केेंद्र सरकार की विफल होती नीतियों से जुड़ा रहेगा। आज घर से बाजार तक, सड़क से साहूकार तक, मजदूर से मीनार तक और व्यापार तक केंद्र सरकार के खिलाफ सभी आग बबूला हैं। महंगाई से त्रस्त जीवन किससे फरियाद करे। लोग देश के सामने फकीर होते वजूद पर विचलित हैं, लेकिन केंद्र सरकार के हाथ से आम आदमी का गला दब रहा है। ऐसे अभिशप्त माहौल के बीच कांग्रेस के जनाधार को जगाने के लिए धूमल सरकार के खिलाफ कड़ा संघर्ष करना होगा। उदारता के जिस तालाब में धूमल सरकार नहा रही है, उसमें कांग्रेस किस तरह गोता लगाएगी। क्या खोज कर बाहर लाएगी, ऐसे सामर्थ्य  की खोज भी चुनाव करेंगे। केंद्र की सत्ता के पक्ष में और धूमल सरकार के विरोध में कांग्रेस के तर्क और भाषा, फिलहाल कमजोर है।

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